राजा की बीमारी | Raja Ki Bimari Story In Hindi

Raja Ki Bimari Story In Hindi- एक था राजा। वह बेहद बीमार था। डॉक्टर, वैद्य, हकीम जाने कितने आए, पर सब निराश होकर लौट गए। न वे राजा की बीमारी पकड़ पा रहे थे, न इलाज कर पा रहे थे। इलाज करते भी कैसे बीमारी तो थी ही नहीं। बस राजा को लगता कि वे बेहद बीमार हैं। मगर वह बीमारी है कहाँ, इसे कोई समझ नहीं पाता था।

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राजा ने न जाने कितनी तरह की दवाओं का सेवन किया, मगर उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। उनके सिर पर बर्फ रखी गई। पेट सेंका गया पर बीमारी वैसी की वैसी ही रही। अब राजा को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, “भगा दो, इन नालायक्रों को इनके पोथी-पत्रों को छीनकर उनमें आग लगा दो।” इलाज करनेवाले मुँह लटकाकर लौट आए।

Raja Ki Bimari Story In Hindi

लोगों ने डर के मारे राजा के महल की ओर जाना छोड़ दिया। राजमहल के लोग चिन्ता में पड़ गए कि राजा कहीं बिना दवा के ही न मर जाएँ। ऐसे समय न जाने कहाँ से एक संन्यासी का आगमन हुआ। उन्होंने कहा, “राजा को स्वस्थ करने का उपाय में जानता हूँ। लेकिन यह बहुत कठिन है। क्या तुम लोग वैसा कर पाओगे ?” मन्त्री, कोतवाल, सेनापति, राजा के निकट के सभी लोगों ने कहा, “क्यों नहीं कर पाएँगे?

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अगर इसमें जान भी जाए तो मंजूर है।” यह सुनकर संन्यासी ने कहा, “पहले एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करो, जिसके मन में कोई चिन्ता न हो, जो हर हाल में खुश रहता हो।” लोगों ने पूछा, “उसके बाद? “संन्यासी बोले, “उसके बाद उस व्यक्ति के कपड़े अगर एक दिन के लिए राजा पहन लें और उस व्यक्ति के गद्दे पर रात भर सो लें, तब देखना उनकी बीमारी दूर हो जाएगी। यह एकदम ठीक हो जाएँगे।

यह सुनकर सभी ने कहा, “यह तो बड़ी अच्छी बात है।” फटाफट यह ख़बर राजा तक पहुँच गई। उन्होंने कहा, “अरे इतना आसान उपाय रहते ये सारे लोग अब तक क्या कर रहे थे? इतनी-सी बात किसी के दिमाग में क्यों नहीं आई? जाओ, उस हँसनेवाले आदमी को तुरन्त ढूंढकर उसका कुर्ता और गद्दा ले आओ।” लोग उस आदमी की तलाश में निकल पड़े। पूरे राज्य में ‘ढूँढो ढूँढो’ का शोर मच गया। लेकिन उस आदमी का पता नहीं चला।

हर आदमी निराश लौटकर कहता, “ऐसा आदमी तो कहीं मिला ही नहीं, जिसे कोई दुःख नहीं है, चिन्ता नहीं है। जो हमेशा हँसता रहता है, खुश रहता है, ऐसा आदमी तो कहीं मिला ही नहीं। तलाश में निकले सभी लोग लौटकर यही कहते। मन्त्री नाराज होकर बोले, “ये किसी काम लायक़ नहीं हैं। इन मूर्खो को पता नहीं कि तलाश कैसे की जाती है?” अब मन्त्री खुद ही कमर कस के निकल पड़े।

बाजार पहुंचकर उन्होंने देखा, एक बड़े-से आँगन में काफ़ी भीड़ थी एक बूढ़ा सेठ बड़ी खुशी से लोगों को चावल, दाल और पैसा दान कर रहा था। मन्त्री ने सोचा, वाह यह आदमी तो बड़ा खुश नजर आ रहा है। इसके पास लगता है, रुपये-पैसे भी काफ़ी हैं। तब फिर इसे कोई कष्ट नहीं होगा, न कोई चिन्ता इसी का एक कुर्ता और गद्दा माँग लिया जाए। तभी उसी समय एक भिखारी सेठ से भीख लेकर बिना उन्हें प्रणाम किए वहाँ से जाने लगा। बस, सेठ को गुस्सा आ गया। उसने उसे थप्पड़ मार दिया।

फिर उसे दी गई दान सामग्री उससे छीनकर उसे जूते से पीटकर भगा दिया। यह तमाशा देखकर मन्त्री मुँह बनाकर आगे बढ़ गए। फिर नदी किनारे एक जगह उन्होंने देखा कि एक आदमी मजाक्रिया गाने गाकर लोगों को हँसा रहा है। कोई आदमी ऐसी अदाओं से हँसा भी सकता है, मन्त्री को यह पता ही नहीं था। वे भी उसके हाव-भाव से ठठाकर हँसने लगे।

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उन्होंने सोचा, ऐसे हंसोड़ आदमी के रहते हमारे लोग खाली हाथ क्यों लौट आए। उन्होंने अपने क़रीब खड़े एक व्यक्ति से पूछा, “यह आदमी कौन है?” उसने कहा, “यह अपना गोवरा नशेड़ी है। अभी आप इसे देख रहे हैं कि यह कितना खुशमिजाज है मगर शाम को शराब पीने के बाद इसका हुल्लड़ और उत्पात शुरू हो जाता है।

इसकी हरकतों से मुहल्लेवालों का जीना मुहाल हो गया है।” यह सुनकर मन्त्री बहुत निराश हुए। वे फिर से हर तरह से योग्य व्यक्ति की खोज में चल पड़े। दिनभर की तलाश के बाद मन्त्री थककर घर लौट आए। वह प्रतिदिन उस व्यक्ति को ढूँढ़ने निकलते और शाम को निराश होकर घर लौट आते। वे लगभग निराश हो चुके थे।

अचानक अगले दिन उन्होंने एक पेड़ के नीचे एक बूढ़े को ठहाके लगाते देखा। उस आदमी के बाल बढ़ गए थे। चेहरे की दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी। उसका पूरा शरीर सूखकर रस्सी की तरह ऐंठ गया था। मन्त्री ने पूछा, “तुम इस तरह हँस क्यों रहे हो? उसने कहा, “क्यों नहीं हैं? यह दुनिया लगातार घूम रही है, पेड़ के पत्ते झड़ते जा रहे हैं, मैदान छास से भरते जा रहे हैं, धूप निकल रही है, पानी भी बरसने लगता है, चिड़िया आकर पेड़ों पर बसेरा लेती हैं, फिर सब उड़ भी जाती हैं।

यह सब आँखों के सामने दीखता रहता है, इसलिए हंसी भी आ जाती है। मन्त्री ने कहा, “खैर, यह सब तो समझ गया, लेकिन सिर्फ इस तरह बैठकर हँसते रहने से तो काम नहीं चलता। तुम क्या कोई काम-धाम नहीं करते फ़क़ीर बोला, “क्यों नहीं करता? सुबह नदी की ओर जाता हूँ, वहाँ नहा-धोकर लोगों को आते-जाते देखता हूँ, उनकी बातें सुनता हूँ, यह सब तमाशा देखकर फिर अपने इस पेड़ के नीचे आकर बैठ जाता हूँ।

इसके बाद जिस दिन खाना मिल जाता है, खा लेता हूँ। जिस दिन नहीं मिलता, भूखा रह जाता हूँ। जब घूमने की इच्छा करती है, घूमने चल पड़ता हूँ, जब सोने की इच्छा होती है, सो जाता हूँ कोई चिन्ता-भावना, उठा पटक, किसी से कोई मतलब नहीं बड़ा मजा है।

मन्त्री सिर खुजलाते हुए बोले, “जिस दिन खाने को नहीं मिलता, उस दिन क्या करते हो?” फ़क्क़ीर बोला, “उस दिन तो कोई झंझट ही नहीं। चुपचाप बैठा-बैठा दुनिया का तमाशा देखता रहता हूँ। बल्कि जिस दिन खाने को मिल जाता है उस दिन ज़्यादा झमेला करना पड़ता है। भात सानो, उसका कौर बनाओ, उसे मुँह में डालो, चवाओ, निगलो…इसके बाद पानी पियो, कुल्ला करो, हाथ-मुँह पोंछो, कितना कुछ करना पड़ता है।” मन्त्री ने देखा कि इतने दिनों बाद जाकर अब सही व्यक्ति मिला है।

उन्होंने कहा, “अपने पहनने का एक आघ कपड़ा दे सकते हो? इसके लिए तुम जितने पैसे चाहो में दे सकता हूँ।” 1 यह सुनकर वह व्यक्ति थड़े जोर से हंसा बोला, “कपड़े ?… अभी उस दिन एक आदमी ने मुझे एक चादर दी थी, उसे एक भिखारी को दे दिया। कपड़े- वपड़े के चक्कर में मैं कभी पड़ता नहीं।” मन्त्री ने कहा, “तुमने तो मुझे मुश्किल में डाल दिया।

किसी तरह एक आदमी मिला भी तो उसके बदन पर कपड़ा नहीं। खैर, कोई बात नहीं। तुम अपना गद्दा ही मुझे दे दो। इसके लिए जितने पैसे तुम चाहो मुझसे ले लो। फकीर हँसते-हँसते लोटपोट हो गया। काफ़ी देर तक हंसने के बाद वह बोला, “चालीस साल से मैंने बिस्तर के बारे में जाना ही नहीं, और तुम मुझसे गद्दा माँगते हो?” मन्त्री बड़े आश्चर्य से बोले, “तुम भी खूब हो।

न कपड़ा पहनते हो, न रजाई, कम्बल, विस्तार रखते हो। तुम बीमार वीर नहीं पड़ते।” फ़क़ीर बोला, “बीमारी क्या चीज होती है? जो लोग बीमारी के बारे में सोचते रहते हैं, ये ही बीमार पड़ते हैं। बीमारी उन्हें ही दबोचती है।” यह कहकर उसने पेड़ से टेक लगाई और पैर फैलाकर फिर से हँसने लगा। मन्त्री हताश होकर वापस लौट आए। उनके आने की खबर राजा तक पहुँची। राजा ने मन्त्री को बुला भेजा। मन्त्री ने पास जाकर सारी कहानी सुना दी। सब सुनकर राजा ने मन्त्री से कहा, “ठीक है, अब आप घर जाएँ।

राजमहल में लोग फिर से चिन्ता में डूब गए। अब क्या किया जाए? इलाज से कोई फ़ायदा हुआ नहीं। बड़ी मुश्किल से जो एक उपाय हाथ लगा, वह भी निकल गया।। सभी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे, फिर गहरी साँस लेकर बोले, “अब राजा को बचाने की कोई सूरत नजर नहीं आती।

उधर राजा भी बैठे-बैठे सोच रहे थे, “मैं राजा हूँ। कितने सुख से रहता हूँ। अच्छा से अच्छा खाना खाता हूँ। किसी चीज़ की कमी नहीं। लोग हर समय मेरा खयाल रखते हैं। इस पर भी मुझे बीमारी लग गई। और इस फ़क़ीर को देखो, जिसका न कोई आगे है न पीछे, जिसके बदन पर कपड़े नहीं, सोने के लिए बिस्तर नहीं, सिर्फ़ पेड़ के नीचे पड़ा रहता है, जो मिल जाता है, खा लेता है-ऐसा आदमी कहता है कि भला बीमारी क्या चीज है?

यह फ़क़ीर होकर बीमारी की परवाह नहीं करता और मैं राजा होकर बीमारी से डरता हूँ। छिः दूसरे ही दिन राजा ने सुबह उठने के बाद अपने खास दरबारियों को बुलाकर कहा, “तुम सब के सब बेवकूफ़ और निकम्मे हो। तुम लोगों से कुछ करते नहीं बना। लेकिन देखो, अपनी बीमारी मैंने खुद ही ठीक कर ली है। आज से मैं फिर से पहले की तरह दरबार में बैठूंगा, और जो जरा भी बेअदबी करेगा, उसकी गर्दन उड़ा दूँगा।

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