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तेते पांव पसारिए, जेती लांबी सोर | Tete Pav Pasariye, Jeti Lambi Sor Story In Hindi

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Tete Pav Pasariye, Jeti Lambi Sor Story In Hindi

Tete Pav Pasariye, Jeti Lambi Sor Story In Hindi- अकबर बादशाह वीरबल की तेज बुद्धि और समझदारी से बहुत प्रभावित थे। वे बीरबल को मित्रवत मानते थे और लगभग हर तरह के मामलों में बीरबल से राय लेते रहते थे। दोनों में इतना खुलापन या कि आपस में किए गए व्यंग्यों का बुरा नहीं मानते थे। वीरबल कभी-कभी रूठ भी जाते थे, लेकिन अकबर बादशाह होकर भी मना लेते थे।

Tete Pav Pasariye, Jeti Lambi Sor Story In Hindi

अकबर के साथ बीरबल के इतने गहरे संबंधों को दरवार के विद्वान लोग सहन नहीं कर पा रहे थे। यहां तक कि दरबार के नवरत्नों के विद्वान भी बीरबल के बढ़ते कद को देख नहीं पा रहे थे। वे अकसर अकबर से कहा करते थे कि आप बीरबल को जरूरत से ज्यादा तरजीह देते हैं। जबकि हम लोग भी बुद्धिमानी में बीरबल से कम नहीं हैं।

विद्वानों की बातें सुनते-सुनते एक दिन अकबर ने कहा, “हमारे लिए तो सभी समान हैं। आप लोग भी बीरबल जैसे गुणी बनिए। आपको भी सराहा जाएगा। यदि आप लोगों में कोई बीरबल से अधिक सूझ-बू वाला और समझदार है, तो वह बीरबल की जगह ले सकता है।

आए दिन ऐसे अवसर आते रहते हैं, जब आप अपनी प्रतिभा और समझदारी का परिचय दे सकते हैं। अकबर के दिमाग में हमेशा यही बात गंजती रहती थी कि आप बीरबल को अधिक तरजीह देते हैं, इसलिए एक दिन अकबर ने एक निश्चित तारीख को दरवार में हाजिर रहने के लिए कहा।

उस निश्चित तारीख को अकबर ने तीन फुट लंबी और दो फुट चौड़ी एक चादर मंगवाई। सिंहासन से अकबर ने उस चादर को दिखाकर कहा, “देखिए, यह एक चादर है। मैं यहां लेट रहा हूँ। यह चादर मुझे इस प्रकार ओढ़ाना है कि सिर से पैर तक मेरा पूरा शरीर ढक जाए। अब एक-एक करके आते जाइए” अकबर इतना कहकर वहीं एक तरफ लेट गया। एक-एक करके लोग आते गए और उस चादर को अकबर को ओढ़ा-ओढ़ा कर चलते गए। इस बीच सब लोग समझ गए थे कि अकबर बादशाह सबकी परीक्षा से रहे हैं।

बादशाह अकबर लगभग सामान्य लंबाई के थे। जब कोई चादर को सिर पर खींचकर लाता था तो पैर करीब घुटनों तक उघड़ जाते थे। जब पैर को ढकने के लिए चादर खींचते तो सिर सीने तक उपह जाता था। इसी प्रकार दरबार के लोग आजमाइश कर-करके अपने स्थान पर बैठते रहे।

कुछ देर तक कोई नहीं आया, तो अकबर ने उठकर पूछा कि कोई चादर ओढ़ाने के लिए रह तो नहीं गया, लेकिन कहीं से भी हाथ उठता दिखाई नहीं दिया। फिर बादशाह ने कहा, “अब बीरबल को भी आजमाइश के लिए बुलाते हैं। देखते हैं कि ये क्या करते हैं?” अकबर ने बीरबल को चादर ओढ़ाने के लिए कहा और लेट गए।

बीरबल ने पहुंचकर चादर उठाकर गौर से देखी। इसी बीच बीरबल ने इसका हल सोच लिया। अकबर बादशाह की ओर मुखातिब होकर बीरबल ने बेझिझक कहा, “उतने पैर पसारिए, जितनी लंबी सौर।” अर्थात चादर के अनुसार अकबर बादशाह से पैर सिकोड़ने के लिए कहा।

पूरा दरवार बीरबल की बात सुनकर दंग रह गया। विद्वान लोग समझ तो गए, लेकिन अब होता क्या है, यह देखने के लिए सबकी निगाहें वहीं गड़ी थीं। अकबर बादशाह वीरवल की बात समझ गए और मन-ही-मन मुस्कराकर अपने पैर इतने सिकोड़ लिए कि शरीर चादर से बाहर न रहे।

बीरबल ने चादर फैलाई और अकबर की ओढ़ा दी। सब देखकर दंग रह गए। अकबर का शरीर, सिर से पैर तक पूरा ढका था। बीरबल अपनी जगह आकर बैठ गए थे। अकबर भी उठकर अपनी जगह बैठ गए थे। बीरबल अपनी आजमाइश में सफल हो गए थे। इस पर अकबर बादशाह ने दरवार को संबोधित करते हुए कहा, “देखा आप लोगों ने बीरबल की समझदारी को। बिना किसी संकोच के कहा कि चादर के अनुसार अपने पैर सिकोड़ लीजिए। मुझे पैर सिकोड़ने पड़े।

और उसी चादर से मेरा पूरा शरीर ढक गया। शायद कुछ लोगों के समझ में न आया हो, जो बीरबल ने कहा था- ‘तेते पांव पसारिए, जेती लांबी सीर’। दरबार में बैठे सभी लोगों के मुंह लटक गए। इसके बावजूद कुछ लोग मन-ही-मन बीरबल से ईर्ष्या करते रहे।

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आब आब कर मर गए, रहा सिरहाने पानी | Aab Aab Kar Mar Gaye, Raha Sirhane Pani Story In Hindi

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Aab Aab Kar Mar Gaye, Raha Sirhane Pani Story In Hindi

Aab Aab Kar Mar Gaye, Raha Sirhane Pani Story In Hindi- एक बनिया व्यापार करने काबुल गया काबुल में फारसी बोली जाती थी और बनिया फारसी जानत नहीं था इसलिए उसे लोगों को अपनी बात समझाने और दूसरों की बात समझने में बहुत दिक्कत होने लगी। बनिया पढ़ा तो था ही, उसने थोड़े ही दिनों में फारसी भाषा सीख ली। वहां वह फारसी भाषा में बातें करता और फारसी में ही व्यापार का हिसाब-किताब रखता।

Aab Aab Kar Mar Gaye, Raha Sirhane Pani Story In Hindi

जब वह वापस आया, तो उसने फारसी भाषा में बात करना छोड़ा नहीं। देशी-विदेशी व्यापारियों और राज्य के कर्मचारियों के बीच फारसी भाषा बोलकर उसने अपना रुतबा जमा लिया था। अपने घर तथा आस-पड़ोस में भी कभी-कभी थोड़ा-बहुत फारसी बोलता था। जबकि फारसी न तो घर के समझते थे और न पड़ोस के।

गर्मी के दिन थे। लू चल रही थी। इसी मौसम में बनिया बीमार पड़ गया। बाहर वाले कमरे में तल बिछा हुआ था। उसी पर उसका बिस्तर लगा दिया गया। सिर की ओर घड़े में पानी भरा रहता और फल भी रखे रहते। तबीयत बिगड़ती चली गई। एक दिन तेज बुखार आया और बनिया बेहोश रहने लगा।

बनिये को जोर की प्यास लगी, तो ‘आब-आब’ कहकर चिल्लाता रहा। वहां घर और पड़ोस के लोग इकट्ठे थे। कोई भी नहीं जानता था कि आब को पानी कहते हैं। हालत बिगड़ती रही और वह आव-आब कहता रहा। अंततः उसके प्राण-पखेरू प्यासे ही उड़ गए।

बनिये के मरने की खबर सुनकर बिरादरी, पड़ोसी, व्यापारी आदि तमाम वर्ग के लोग इकट्ठे हुए। बनिये के बारे में तरह-तरह की बातें लोग कर रहे थे। एक ने कहा- “लाला काबिल आदमी थे, लेकिन दिखावे की जिंदगी जीने लगे थे जब देखो तब फारसी बोलते रहते थे।” दूसरे व्यक्ति ने कहा- “इसी दिखावे का ही खामियाजा भुगतना पड़ा लाला को, वरना पानी का घड़ा तो सिरहाने रखा हुआ था, लेकिन घर में कोई नहीं जानता था कि जब पानी को कहते हैं।

“वहां आए तमाम लोगों में से ही किसी ने फकीराना अंदाज में कहा ‘काबुल गए मुगल वन आए, बोलन लागे बानी। आव आब कर मर गए, रहा सिरहाने पानी ॥

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या अल्लाह, गौड़ में भी गौड़ | Ya Allah God Me Bhi God Story In Hindi

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Ya Allah God Me Bhi God Story In Hindi

Ya Allah God Me Bhi God Story In Hindi- प्रयाग में एक ब्राह्मण और एक फकीर पास-पास रहते थे। दोनों में बहुत अच्छी मित्रता थी। दोनों ही • भीख मांगकर गुजारा करते थे। नगर में आए दिन ब्रह्मभोज होते रहते थे, इसलिए ब्राह्मण लगभग 12 दिन ब्रह्मभोज की दावतें उड़ाता था और शेष दिन भीख मांगकर गुजारा करता था।

इस तरह पूरा महीना निकल जाता था, लेकिन फकीर का गुजारा पूरे महीने बड़ी मुश्किल से होता था। एक दिन ब्राह्मण और फकीर, दोनों एक साथ बैठे हुए थे। फकीर ने ब्राह्मण के सामने अपना गुजारा न होने की समस्या रखी। दोनों बैठे-बैठे बड़ी देर तक विचार करते रहे। एक विचार ब्राह्मण की समझ में आया।

Ya Allah God Me Bhi God Story In Hindi

उसने फकीर से कहा कि तुम ब्राह्मण का वेश बना लो और मेरे साथ ब्रह्ममोजों में चला करो। जद कोई पूछे कि कौन से ब्राह्मण हो? तो बता दिया करना कि मैं गौड़ हूँ।” फकीर बोला, “नहीं यार, तुम मरवाओगे मुझे? यह ठीक नहीं है।” लेकिन ब्राह्मण के अधिक कहने पर फकीर मान गया। सिर पर केवल मोटी चोटी के लिए केश छोड़कर बाकी सारे बाल कटवा दिए।

दाढ़ी-मूंछें बनवा लीं। एक मोटा-सा जनेऊ ब्राह्मण ने लाकर दे दिया। अब तो दोनों ब्रह्मभोजों में साथ-साथ दावतें उड़ाने लगे। फकीर ब्राह्मण के साथ तो बेफिक्र होकर दावतें उड़ाता था, लेकिन जब कभी उसे अकेले जाना पड़ता था, तो हमेशा डरा-डरा रहता था। अब ब्रह्मभोजों में वह दावत करते समय किसी से बोलता नहीं था और दावत समाप्त होते ही वहां से जल्दी ही निकल आता था।

एक दिन वह अन्य दिनों की तरह ब्रह्मभोज की दावत में बैठा हुआ खाना खा रहा था। तभी पूरी परोसने वाला पूरियां परोसते-परोसते जब ब्राह्मण बने फकीर के पास आया, तो पूरी लेने के लिए पूछा। उसने कुछ कहा नहीं बल्कि हाथ से पूरी रखने के लिए इशारा किया। पूरी परोसने वाले को कुछ शक हुआ तो पूछ बैठा, “आप कौन से ब्राह्मण हैं?

“फकीर ने रटा-रटाया उत्तर दिया, “गौड़ ब्राह्मण हूँ।” पूरी परोसने वाले को जब तसल्ली नहीं हुई, तो उसने उससे फिर पूछ लिया, “कौन से गौड़? “अब तो ब्राह्मण बना फकीर सकते में आ गया। उसके साथी ब्राह्मण ने यह तो बताया नहीं था कि गौड़ कितने प्रकार के होते हैं? वह बहुत घबरा गया और उसके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘या अल्लाह, गोड़ में भी गोड़?

“फिर क्या था, लोगों को पता चलने पर ब्रह्मभोज में अफरातफरी मच गई। लोग इकट्ठे हो गए और ब्राह्मण बने फकीर की खूब फजीहत हुई।

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अंधों का हाथी | Andhe Ka Hathi Story In Hindi

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Andhe Ka Hathi Story In Hindi

Andhe Ka Hathi Story In Hindi- एक गांव में चार अंधे थे। यह भी बात ध्यान देने वाली थी कि चारों के चारों उसी गांव में पैदा ये जब ये एक साथ बैठसे, तो अपने दुख-सुख की बातें करते थे लोगों की सुनी-सुनाई बातों पर चर्चा करते थे। उन्हें ऐसी तमाम चीजों और प्राणियों के बारे में जानने की इच्छा थी, जिनके बारे में गांव के लोगों से सुन रखा था।

हुए एक दिन उस गांव में एक बारात आई। उस बारात में एक हाथी आया। हाथी के आने की खबर अंघों को भी मिली। इससे पहले गांव में हाथी नहीं आया था। अब तो अंधों के मन में हाथी के बारे में और अधिक जानने की इच्छा जाग उठी। गाँव के लोग हाथी देखने गए, तो अंधे भी वहां पहुंच गए।

Andhe Ka Hathi Story In Hindi

भीड़ में एक साथ खड़े-खड़े शोरगुल सुनते रहे। चारों ने आपस में कुछ कानाफूसी की और भीड़ को हटाते हुए हाथी के पास पहुंच गए। जब हाथी के पास आ गए, तो एक अंधा बोला, “महावत भैया, हम लोग हाथी को टटोलकर देखना चाहते हैं। देख लें?” महावत पहले तो असमंजस में पड़ गया। फिर सोचने लगा, ये बेचारे आंखों से तो देख नहीं सकते।

इसी तरह की इनकी हाथी देखने की इच्छा पूरी हो जाएगी। महावत बोला, “देख लो सूरदास लोगों। “महावत भैया, हाथी को जरा संभाले रखना।” इतना कहकर चारों अंधे हाथी को टटोल-टटोलकर देखने लगे। पहले अंधे के हाथों में हाथी का पांव आया टटोलकर बोला, “अरे! हाथी तो बिल्कुल खंभा जैसा है।

“दूसरे अंधे के हाथ कान पर पहुंचे। वह बोला, “अरे नहीं, हाथी तो सूप की तरह है।” तीसरे के हाथ पेट पर लगे। वह अच्छी तरह टटोलकर बोला, “तुम दोनों झूठ बोल रहे हो। हाथी मशक जैसा है। “चौथे अंधे के हाथों में सूंड आई। तीन अंधे अलग-अलग तरह का हाथी बता चुके थे। इसलिए उसने बड़े इत्मीनान से सूंड को ऊपर-नीचे टटोला, फिर कड़क कर बोला, “तुम सब बेकार की हांक रहे हो।

हाथी तो रस्सा जैसा है।” अब तो चारों अंधे अपनी-अपनी बात पर अड़ गए। सब अपनी-अपनी बात पर जोर दे रहे थे। दूसरों की बात कोई भी सुनने को तैयार नहीं था। उनकी आपस में तकरार हुई और नौबत झगड़ने तक आते-आते रह गई।

सब लोग अंधों को बातों पर हंस रहे थे। कुछ लोगों ने अंधों को समझाया कि तुम सबने हाथी का एक-एक अंग टटोला है, पूरा हाथी नहीं, लेकिन अंधों ने सबकी बातों को एक तरफ रख दिया। भीड़ में से किसी ने व्यंग्य करते हुए कहा, “यह ‘अंघों का हावी है भाई।” सब लोग खिल-खिलाकर हंस पड़े।

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अंधी पीसे, कुत्ता खाए | Andhi Pise, Kutta Khaye

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Andhi Pise, Kutta Khaye

Andhi Pise, Kutta Khaye – एक गांव में एक अंधी थी। उसकी दो लड़कियां थीं, जो बाल-बच्चे वाली थीं और अपनी-अपनी ससुरा में रह रही थीं। अंधी का पति मर चुका था। खेती-बाड़ी या और कोई जरिया नहीं था, जिससे वह अंधी दो जून की रोटी खा सके। वह इतनी खुद्दार थी कि दान के रूप में रोटियां खाकर वह जीन नहीं चाहती थी।

पति के मरने के थोड़े दिन बाद ही उसे लाला के यहां से गेहूं पीसने का काम मिल गया। अंधी एक दिन में दस सेर गेहूं पीस पाती थी। सुबह चार बजे चक्की चलाने बैठ जाती थी। जब सुबह अधिक हो जाती, तो घर के कामों से निपटकर आराम करती। फिर उसके बाद बैठती तो पूरे गेहूं पीसकर ही उठती थी।

Andhi Pise, Kutta Khaye

गेहूं पीसते हुए लगभग शाम के पांच बज जाते थे। इसके बाद वह टोकरे में आटा लेकर लाला के यहां पहुंचती थी। उसी टोकरे में पीसने के लिए गेहूं लेकर आती थी। इस तरह उसका काम चलता रहा और अंधी को दाल-रोटी मिलती रही। कुछ दिन बाद आटे का टोकरा कुछ खाली जाने लगा। लाला कहता कि मालूम पड़ता है तू आटा निकाल लेती है।

अब टोकरा खाली आता है। अंधी कहती, “लाला में अकेली हूं। आटा किसके लिए निकालूंगी? मेरा तो इस मजदूरी में ही गुजारा हो जाता है।”

लाला को वैसे अंधी पर पूरा विश्वास था, फिर भी वह गेहूं पीसने के लिए देता रहा। अंधी पीस पीसकर आटा देती रही। एक दिन लाला अंधी के घर के पास से निकल रहा था। उसे चक्की की आवाज सुनाई पड़ी। उसका

मन हुआ कि चलो अंधी से मिलता चलूं। लाला मकान की दहलीज पर पैर रखकर आवाज देने वाला ही था कि अंधी गेहूं पीसते दिखाई दे गई। एक तरफ उसने गेहूं का टोकरा रखा था। दूसरी ओर परात में पिसा हुआ आटा रखा था। आटे की परात में कुत्ता चुपचाप आटा खा रहा था। अंधी गीत गुनगुनाते हुए गेहूं पीसती जा रही थी। लाला ने देखकर अपना माथा पीट लिया और उलटे पैर लौट आया। लाला रास्ते में सोचता जा रहा था, ‘अंधी पीसे, कुत्ता खाए’।

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अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियां चुग गई खेत | Ab Pachtaye Hot Kya, Jab Chidiya Chug Gai Khet Story In Hindi

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Ab Pachtaye Hot Kya, Jab Chidiya Chug Gai Khet Story In Hindi

Ab Pachtaye Hot Kya, Jab Chidiya Chug Gai Khet Story In Hindi- एक किसान परिवार था। थोड़ी खेती थी। किसानिन बहुत मेहनतिन थी। किसान बहुत आलसी था। जैसे किसानिन ने कह-सुनकर किसान से खेत जुतवा लिए थे। जब खेत में फसल के अंकुर फूटे और खेत में से छांट-छांटकर घास काटने का समय आया, तो किसान नदारद रहने लगा।

Ab Pachtaye Hot Kya, Jab Chidiya Chug Gai Khet Story In Hindi

वह गांव के कुछ निकम्मे लोगों की सोहबत में पड़ गया। किसानिन ने पूरे-पूरे दिन लगकर खेतों की घास को काटकर निराई की। घर में किसान की बूढ़ी मां थी, जो केवल घर में झाड़ू लगा लेती थी और इधर-उधर पड़ी हुई को सही जगह रख देती थी। किसानिन ही सुबह-शाम खाना बनाती थी वर्तन मांजना, कपड़े धोना और पानी भरना अकेली किलानिन को ही करना पड़ता था।

थोड़ा-बहुत कहने-सुनने पर कभी-कभी किसान थोड़ पानी भरवा देता था। जब खेत के पौधे बड़े होने लगे, तो खेत में चार वल्लियां गाड़कर एक मचान बना दिया। उस पर किसान बैठा-बैठा खेतों को देखता रहता और उसी पर लेटा रहता। किसानिन भी समय-समय पर देखभाल करती रहती।

कुछ दिन बाद खेत में बालियां आने लगीं। बालियों में दाने बनने लगे और देखते-देखते बालियों के दाने पकने लगे। शुरू के दिनों में किसानिन ने बहुत मेहनत की थी। अब किसान की बारी थी। किसानिन ने खेत के मचान पर एक कनस्तर टांग दिया था। उसे बजाने के लिए एक डंडा भी यहां रख दिया था।

किसान खेत की रखवाली के लिए घर से जाते समय पहले रामू की चौपाल पर ताश खेलने बैठ जाता था। एक-दो घंटे बैठने के बाद वह खेतों पर जाता और मचान पर जाकर लेट जाता। लेटते ही नींद आ जाती जब आंख खुलती, तो थोड़ा कनस्तर बजाता जिससे खेत में बैठी हुई चिड़ियां उड़ जाती।

जैसे ही खेत पकने की स्थिति में आया, वैसे-वैसे वह चौपाल में ताश खेलने में अधिक समय लगाने लगा। उसके खेत पर चारों तरफ की उड़ाई हुई चिड़ियां आकर बैठने लगी और दानों को चुन-चुनकर खाने इस बीच किसानन गर्भावस्था की उस स्थिति में पहुंच गई थी कि खेतों पर जाना, ऊंची-नीची जगहों पर चलना, सब कुछ बंद हो गया था।

अब फसल की रखवाली पूरी तरह से किसान के ऊपर आ पड़ी थी। उधर चिड़ियां फसल के दानों को जमकर चुगती रहतीं। दिन चट्टे उठता, तो खेतों की ओर घूमता हुआ चला आता जब फसल कटने का समय आया, तो किसानिन के कहने पर गांव के दो आदमियों को लेकर किसान फसल काटने पहुंचा।

साथ में गए आदमियों ने फसल देखी और सोच में पड़ गए। उसमें से एक ने कहा, “भैया, इन बालियों में दाना एक भी नहीं है। इस फसल में कुछ नहीं निकलने वाला। तुमको हमारी मजदूरी और देनी पड़ेगी। नहीं तो बाद में कहोगे कि मैं कहां से दूं। इसमें तो कुछ निकलेगा ही नहीं।

“दाय चलाने के बाद मूसा ही मिलेगा। घर में पूछ लेना। सोच-विचार कर लेना हम चलते हैं।” इतना कहकर दोनों आदमी चले आए। उस किसान का चेहरा फक्क-सा रह गया। सूखा-सूखा-सा मुंह लटकाए पर की ओर चल दिया। वह रोता-सा मुंह बनाए किसानिन के पास जा पहुंचा।

वहां पहुंचकर उसने रोना शुरू कर दिया। किसानिन साहसी औरत थी। जो उससे मजदूर आदमियों ने कहा था, उसने अपनी पत्नी को सब कुछ बता दिया था और किसान रो-रोकर अपनी गलतियों की क्षमा मांगता रहा, पछताता रहा। किसानन बहुत गंभीर होकर अपने पति के आंसू पोंछते हुए बोली ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।’

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धोबी का कुता, घर का न घाट का | Dhobi Ka Kutta, Ghar Ka Na Ghat Ka Story In Hindi

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Dhobi Ka Kutta, Ghar Ka Na Ghat Ka Story In Hindi

Dhobi Ka Kutta, Ghar Ka Na Ghat Ka Story In Hindi – एक धोबी परिवार था। उसमें पति-पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। जब धोबी गधों पर कपड़े लादकर घाट पर जाता, तो साथ बच्चों को भी ले जाता और दरवाजे पर ताला लगा जाता। धोबी का कुत्ता कभी घर पर रह जाता था और कभी धोबी के साथ चला जाता था। धोबी परिवार सहित अच्छी तरह से रहता था।

Dhobi Ka Kutta, Ghar Ka Na Ghat Ka Story In Hindi

बहुत से लोग उनकी खुशहाली से जलते थे। वे अकसर धोबी का बुरा चाहते रहते थे। नुकसान करने के लिए किसी-न-किसी मौके की तलाश में रहते थे। एक बार गर्मी के दिन थे। दोपहर को गतियों में सन्नाटा छाया रहता था। एक दिन दोपहर में किसी ने धोबी के घर का ताला तोड़कर चोरी कर ली। चोर उसके कुछ रुपए और गहने चुराकर ले गए।

जब धोबी काम से वापस आया, तो उसे घर का ताला टूटा मिला। घर में इधर-उधर कपड़े बिखरे पड़े थे। धोबिन ने रोना-पीटना शुरू कर दिया, “हाय, में तो लुट गई। कुछ भी नहीं छोड़ा नासपीटों ने पैसा और जेवर सब ले गए।” तमाम अनाप-शनाप धोबिन बकती रही और गालियां देती रही चोरों को।

धोबी ने कोतवाली में इत्तला की, तो वहां से दरोगा और सिपाही आ गए। उन्होंने परिवार वालों तथा पड़ोसियों से पूछ-ताछ की। लोगों ने बताया कि सब लोग अपने-अपने काम पर गए हैं। औरतें गर्मी की वजह से घर से निकलती नहीं हैं। इसीलिए किसी को चोरी का पता ही नहीं चल पाया।

धोबी ने कोतवाली में इत्तला की, तो वहां से दरोगा और सिपाही आ गए। उन्होंने परिवार वालों तथा पड़ोसियों से पूछ-ताछ की। लोगों ने बताया कि सब लोग अपने-अपने काम पर गए हैं। औरतें गर्मी की वजह से घर से निकलती नहीं हैं। इसीलिए किसी को चोरी का पता ही नहीं चल पाया।

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थोथा चना, बाजे घना | Totha Chana, Baje Ghana Story In Hindi

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Totha Chana, Baje Ghana Story In Hindi

Totha Chana, Baje Ghana Story In Hindi- चलते-चलते ये खलिहानों में पहुंचे दो खलिहान एक ही खेत में पास-पास थे। अकबर ने एक खलिहान से कुछ पौधे लिए और हिलाए अकबर ने कहा, “बीरबल, तुम भी हिलाकर देखो।” बीरबल ने अकबर के हाथ के पौधे लेकर हिलाए, फिर अकबर ने कहा, “आओ।” और दूसरे खलिहान के पास पहुंच गए।

Totha Chana, Baje Ghana Story In Hindi

उस खलिहान से भी कुछ पौधे लेकर अकबर ने हिलाए, फिर बीरबल को देते हुए कहा, “इनको भी हिलाओ।” वीरवल ने अकबर के हाथ से चने के पौधे लेकर हिलाए।

अकबर बादशाह बीरबल से बोले, “दोनों जगह के चनों में कुछ फर्क नजर आया।” बीरबल बोले, “जी हुजूर, बिल्कुल फर्क नजर आया। उस जगह के पौधों में चनों की आवाज नहीं थी। इन पौधों में तेज आवाज हो रही है।”

फिर बादशाह ने कहा, “इसका क्या मतलब हुआ

बीरबल बोले, “एक में बने कमजोर और कम तथा दूसरे में अधिक और बड़े-बड़े हैं।” अकबर बादशाह बोले, “इतना तो हम भी जानते हैं। किसमें अधिक चना है, यह बताओ।” एक खलिहान गांव के प्रधान का था वह और दो किसान बीरबल के पास खड़े थे वीरबल को चुप देखकर प्रधान बोल पड़ा, ‘योया चना, बाजे पना।’

अकबर बोले, “सुना वीरबल, जिसमें मरा हुआ चना होता है, यह छोटा होता है और जोर-जोर से

आवाज करता है जो स्वस्व चना होता है, वह बड़ा होता है और आवाज नहीं करता।

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बगल में छोरा, शहर में डिंडोरा | Bagal Me Chora, Shahar Me Dhindora Story In Hindi

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Bagal Me Chora, Shahar Me Dhindora Story In Hindi

Bagal Me Chora, Shahar Me Dhindora Story In Hindi- सर्दी का मौसम था। आंगन में तीन महिलाएं बैठी थीं। एक महिला लाल मिर्च के डंठल तोड़ रही थी और दो महिलाएं उसके साथ बातें कर रही थीं। मिर्च के डंठल तोड़ने वाली महिला अचानक कहने लगी, “अरी बहना, अभी-अभी मेरा लड़का यहीं खेल रहा था। वह देखो, वस्ता भी यहीं पड़ा है।

मालूम नहीं कहां गया” यह कहते हुए महिलाओं से फिर बतियाने में लग गई। शाम हो गई थी। झुटपुटा होने को हुआ। उसके साथ बैठी महिलाएं चली गई। फिर उसे अपने लड़के की याद आई। कभी कहीं जाता नहीं था। आज मालूम नहीं कहां चला गया था। वह अपने लड़के को देखने पड़ोसियों के यहां गई।

Bagal Me Chora, Shahar Me Dhindora Story In Hindi

पूछती फिरी कि मेरा लड़का तो नहीं खेल रहा है? पड़ोसियों ने कहा कि. मेरे लड़के तो यहीं खेल रहे हैं। आस-पड़ोस में पूछकर वह घर वापस आ गई। पांच साल का लड़का था। वह घर और पड़ोस के अलावा कहीं जाता नहीं था। अब तो उसने रोना शुरू कर दिया।

आस-पड़ोस से औरत और लोग-बाग आ गए। पता चला कि लड़का कहीं चला गया है। परिवार तथा पड़ोस के कई लोग शहर में इधर-उधर ढूंढने निकल पड़े। शहर की कोतवाली में भी इत्तला कर दी और शहर में मुनादी पिटने लगी। घर में सभी परेशान थे। सब एक जगह बैठकर शोक-सा मनाने लगे।

खाना बनाने का समय हो चुका था, लेकिन चूल्हा ऐसा ही पड़ा था। घर के सभी सदस्य मुंह लटकाए बैठे थे। कुछ पड़ोसिने भी उनके पास बैठी थीं। सभी कुछ-न-कुछ बोल रही थीं। कोई कहता कि कोई पकड़कर तो नहीं ले गया या किसी ने कुछ कर तो नहीं दिया।

लड़के की मां के मन में रह-रहकर तरह-तरह के स्थान आ रहे थे। सर्दी कुछ बढ़ गई थी। एकाएक चादर लेने के लिए लड़के की मां कमरे में गई। जैसे ही उसने वहां से चादर उठाई, उसकी नजर लड़के के चेहरे पर पड़ी उसका लड़का सो रहा था। लड़के को लेकर उसकी मां आंगन में आई। लड़का पसीना-पसीना हो रहा था।

कभी वह उसे पुचकारती थी, कभी गोदी में लिए-लिए सीने से लगा लेती थी। अब जो भी सुनता था कि लड़का मिल गया, भागता चला आ रहा था। आंगन में औरतें, बच्चे, मोहल्ले के व्यक्तियों की अच्छी-खासी भीड़ लग गई थी। जो भी पूछता कि लड़का कहां मिला? सबसे कहती कि अंदर कमरे में सो रहा था।

उसके घर से महिलाएं, बच्चे आदि लड़के को देखकर आ रहे थे। एक औरत कह रही थी, देखो तो, ‘बगल में लड़का, शहर में टिंडोरा।

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लालच बुरी बला है | Lalach Buri Bala Hai Story In Hindi

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Lalach Buri Bala Hai Story In Hindi

Lalach Buri Bala Hai Story In Hindi – एक शहर में एक सुनार था। उसकी दुकान बहुत प्रसिद्ध थी। वह अपनी दुकान पर नए-नए डिजाइनो में सोने-चांदी के गहने बनाता था और बेचता था। कुछ लोग अपने पुराने गहने लाते थे और कुछ पैसे देकर नए गहने बनवा ले जाते थे। उसकी नाप-तोल बिल्कुल ठीक होती थी। ईमानदारी में उसका नाम था।

अपनी मेहनत की मजदूरी ठीक-ठीक लेता था। सोने के गहनों में तांबे का टांका कम-से-कम लगाता था। शहर में सबसे अधिक दुकान उसी की चलती थी। चाहे जान-पहचान का हो या अनाड़ी, सबके साथ ईमानदारी से व्यवहार करता था। एक दिन दोपहर का समय था। गर्मियों के दिन थे।

Lalach Buri Bala Hai Story In Hindi

दुकान पर एक भी ग्राहक नहीं था। वहां एक आदमी आया और एक थैले में गहने दिखाकर कुछ कहने लगा। पहले तो सुनार ने बहुत गुस्से में कहा, “मुझे नहीं लेने हैं सस्ते दामों में चोरी के गहने। “चोरों के सरदार ने बड़ी नरमी से कहा, “देख लो, फायदे का सौदा है। बस आप और हम दो ही लोगों के बीच यह बात रहेगी। आनन-फानन में लखपती बन जाओगे।

“जब चोरों के सरदार ने अधिक कहा-सुना, तो वह लालच में आ गया और गहने लेने के लिए तैयार हो गया। वह अंदर थैले को ले गया। गहने तोले और पैसे उसी थैले में रखकर दे दिए। वह सरदार थैला लेकर चला गया। अब चोरों का सरदार बीस-पच्चीस दिन में आता सुनार गहनों का थैला लेता सुनार उसी बैले में पैसे रखता और सरदार को वापस देता।

सरदार थैला लेकर चला जाता। अब सरदार दिन में न आकर झुटपुटे में शाम को आता सरदार पैदल आता था। कभी-कभी वह जब जल्दी में होता तो घोड़ी लेकर आता था। एक दिन सरदार घोड़ी पर सवार होकर जब शहर में आ रहा था, तो उस पर सिपाहियों को शक हो गया। सिपाहियों ने सरदार को घेरकर गिरफ्तार कर लिया।

उस सरदार को दरबार में हाजिर किया गया। उसके थैले की तलाशी ली गई तो किसी रजवाड़े के रत्नजड़ित आभूषण पाए गए। जब राजा ने पूछताछ की तो पता चला कि पड़ोस की रियासत के राजा की लड़की का डोला लूटकर गहने लाए गए हैं।

उस सरदार ने स्वीकार किया कि में चोरों का सरदार हूं और ये गहने एक रियासत में जा रहे एक डोले को लूटकर लाया था। जब राजा ने पूछा कि इन गहनों को कहां ले जा रहे थे? इस पर उसने बताया कि आपके यहां के प्रसिद्ध सुनार के पास बेचने जा रहा था।

में चोरी के सोने के गहने उसी को बेच देता हूँ। वह आधी कीमत पर मेरे गहने खरीद लेता है। उसी समय राजा ने सिपाहियों को भेजकर उस सुनार की दुकान पर छापा डलवाया और सुनार को गिरफ्तार कर कैदखाने भेज दिया। उसकी दुकान से हजारों की संख्या में चोरी के खरीदे हुए गहने मिले।

दूसरे दिन चोरों के सरदार को फांसी और प्रसिद्ध सुनार को आजीवन कारावास दे दिया गया। में के बारे में बातें हो रही थीं। लोग जगह-जगह पर आपस में सुनार की ईमानदारी पूरे शहर सुनार की तारीफ कर रहे थे और चोरी के गहनों की खरीद-फरोख्त के बारे में निंदा कर रहे थे। एक स्थान पर तमाम लोग इकट्ठे थे और सुनार की इस घटना के बारे में चर्चा चल रही थी। उन्हीं के बीच से एक व्यक्ति बोला, भैया, ‘सालच बुरी बलाय’ होती है।

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