Nach Na Jane Angan Tedha – लड़के की शादी थी। दो दिन बाद बरात जानी थी। दो दिन से शाम को गीत और नाच नियमित हो रहे थे। आज तीसरा दिन था। रिश्तेदार, घर-कुनबा और आस-पड़ोस की महिलाएं गीत में शामिल दी। कुनबे की एक बुआ थी। सुंदर भी थी और कपड़े भी अच्छे पहने थी। जब कोई नाचता था तो वह कुछ-न-कुछ बोल देती थी।
कभी कह देती, “अरे ये तो देखने की है। नाचनो ढंग से ना आए।” कभी कहती, “अभी नई-नई दीखे सीख जाएगी नाचनो थोड़े दिनन में। “कभी कहती, “मजा नाएं आयो।” लेकिन जब कोई अच्छा नाचती और सब उसकी तारीफ करती तो वह भी कह देती, “देखो, ये है नाचवो तो “मोहल्ले और कुनबे वालों की बुआ होने के नाते लड़कियां और बहुएं उनकी बातों को मजाक में तेजी थीं।
आज तो लड़के की मां, बहनें, भाभियां और तमाम बहू-बेटियां नाचीं। आज बुजा ने कुछ ऐसी बातें कहीं कि जिसमें व्यंग्य थे। जैसे “अरे, ये छोरी नाचवोई न जाने बिना नाच के कहूँ गीत पूरे होएं।” “ऐ तो बस खावे की है। जापे कछु न आये।” आखिरी दिन के गीत गाए जाने वाले थे सब बहुओं और लड़कियों ने मिलकर सोचा- दुआ सबकी मीन-मेख निकालती है।
आज बुआ को नचवाते हैं। फिर देखना, कैसी-कैसी बातें बुआ को सुनने को मिलती. हैं। सब बहुएं और लड़कियां औरतों के इकट्ठे होने का इंतजार करने लगीं। आज सभी दिल खोलकर गीत गा रही थीं और नाच रही थीं। बुआ की तो कुछ-न-कुछ कहने की आदत थी ही, सो कहती रहीं।
बहुओं और लड़कियों ने एक-दूसरे को इशारा किया कि बुआ से नाचने की कहो। एक ने कहा, “आज बुआ नाचेंगी। खड़ी हो जाओ बुआ।” इतना कहना था कि दो-तीन बहुओं और लड़कियों ने मिलकर बुआ की जबरदस्ती खड़ी कर दिया। पहले बुआ ने कहा कि मेरे पैर में थोड़ा दर्द है में नाच नहीं पाऊंगी, लेकिन बहुओं और लड़कियों की जिद के आगे मजबूरी में तैयार हो गई।
बुआ न तो नाचना जानती थी और न कभी नाचा ही था। कहने-सुनने पर बुआ ने ऐसे ही तीन घूमे लिए और बैठ गई। बुआ के घूमों पर बहुएं और लड़कियां ताली दे-देकर खूब हंसी। एक बहू ने कहा, “बुआ, नाच थोड़े ही रही थीं, कुदक रही थीं।” एक औरत बुआ की भाभी लगती थी। वह बोली, “यह उंटनी नाच है।
जाए हरेक कोई नांव नाच सके।” एक बार फिर हंसी के फव्वारे छूटे। बहुएं और लड़कियां बोली, “दुआ थोड़ा और नाचो, बैठ कैसे गई? तुम्हारा पैर तो ठीक है।” बुआ कुछ मुंह बनाकर कहने लगी, “यहां नाचवे की जगह नॉय आंगन कुछ टेढ़ा-टेढ़ा-सा है। इसी से हम नाच नांय पा रहे हैं।” उसी भीड़ में से एक बुढ़िया ने गाली दी और फिर बोली ‘नाच न जाने, आंगन टेढ़ा।’
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Ek To Karela, Dusra Nim Chadha Story In Hindi – एक व्यक्ति को मधुमेह की बीमारी थी। वैद्य का कहना था कि करेले की सब्जी और करेले का रस > मधुमेह के रोगी के लिए बहुत लाभदायक होता है। वैद्य ने उससे करेला खाने के लिए कहा तो बिदक गया। करेले से ही नहीं बल्कि हर कड़बी चीज से उसे एक तरह से नफरत थी।
यहां तक कि यदि खोरा थोड़ा भी कड़वा निकल आता, तो उसके मुंह का जायका खराब हो जाता था। लोगों के कहने-सुनने के बाद उसने करेले की सब्जी खानी स्वीकार कर ली, लेकिन उसकी शर्त थो कि करेले की सब्जी में कड़वापन नहीं होना चाहिए। उसके परिवारवाले करेले को काटकर और उसमें नमक मिलाकर दो-तीन घंटे के लिए रख देते थे।
तब उसको धोकर उसकी सब्जी बनाकर देते थे, लेकिन वैद्य, का कहना था कि थोड़ा कड़वापन बना रहे तो वह बहुत लाभदायक होता है। किसी तरह वह करेले में रह जाने वाले कड़वेपन को सहन करने लगा। उसकी मधुमेह की बीमारी बहुत कम रह गई। वह चाहता था कि बिल्कुल ठीक हो जाए, लेकिन पूर्ण रूप से ठीक होना तो संभव नहीं था, फिर भी अधिक-से-अधिक ठीक हुआ जा सकता था।
उसके लिए वह कड़वेपन से दूर भागता था। एक दिन किसी ने उसको समझाया कि कड़वी जितनी भी चीजें हैं, वे सभी लाभदायक हैं। नीम, गिलोय, करेला आदि तमाम बीमारियों की दवाएं हैं। मधुमेह बीमारी के लोग कच्चे करेले के छिलकों का रस पीते हैं और एक तुम हो।
कड़वे के नाम पर उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई। एक दिन किसी ने उसे सलाह दी कि नीम पर चढ़ी हुई लता के करेले खाने से मधुमेह जड़ से ठीक हो जाता है। वह सुनते ही बिदक गया और बोला- “क्या! एक तो करेला, दूसरा नीम चढ़ा’ ना भाई, नहीं खाना मुझे।”
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Garib Ki Joru Sabki Bhabi Story In Hindi – एक मोहल्ले में एक गरीब परिवार था। उस मोहल्ले में कुछ अमीर थे और ऐसे परिवार अधिक थे जो न अमीर थे और न गरीब थे। गरीब परिवार का दीनू सबको राम-राम करता था। वह सब लोगों के काम भी आता रहता था। उस मोहल्ले में विभिन्न समाज और बिरादरी के लोग थे।
दीनू के पड़ोस में एक परिवार ठाकुर का था वह बात-बात में दीनू की जोरू को भाभी कहता और कभी-कभी मजाक भी कर लेता था, हालांकि ठाकुर दीनू से उम्र में बड़ा था। इसी प्रकार दीनू के दूसरे पड़ोसी ब्राह्मण देवता थे। एक दिन उसकी पत्नी को दीनू ने बहनजी क दिया, तो ब्राह्मण देवता ने दीनू को साला ही बना लिया। एक दिन दीनू की पत्नी ने ब्राह्मण देवता से भाई साहब कहा तो ब्राह्मण देवता कहने लगा,
“तेरा आदमी तो मेरी पत्नी को बहनजी कहता है और तू मुझे भाई साहब कहती हो। यह कैसा रिश्ता? तेरा आदमी तो मेरा साला हुआ।” उस दिन से ब्राह्मण देवता दोनू और उसकी जोर से साले सलहज का रिश्ता बनाकर बात करता और मौका मिलते ही इसी रिश्ते के अनुसार मजाक करता रहता।
अहीर बिरादरी के लोग दीनू की जोरू से भाभी कहते और मजाक करते रहते उम्र में जो छोटा होता 1 वह भाभी कहता और जो उम्र में बड़ा होता, वह भी भाभी कहता था।
कभी ऐसे भी मौके आते थे कि आपस में काफी कहा-सुनी, तू-तू मैं-मैं और झगड़ा तक हो जाता । गाली-गलौज होती, लेकिन कुछ दिन में सब सामान्य हो जाता और फिर दीनू की जोरू से भाभी कहना शुरू कर देते। कुछ लोग दीनू की बहन से भी मजाक करते रहते थे और जब कभी दीनू के मुंह से उनकी बहन के लिए मजाक निकल जाता तो उसे गाली समझकर वे लोग बेकाबू हो जाते।
कभी-कभी झगड़ा भी कर लेते और वे लोग जब दीनू को गाली देते तो ब्राह्मण देवता आदि कह देते, “क्या है, दीनू तो मेरा साला लगता है। इसी प्रकार जब लोग दीनू की जोरू से मजाक करते तो कह देते, “मेरी तो भाभी लगती है।” जबकि वे लोग दीनू से उम्र में बड़े होते थे।
एक बार दीनू के यहां उसकी बिरादरी का एक बुजुर्ग आया। थोड़ी देर वह उसके दरवाजे पर बैठा रहा और लोगों को दीनू की जोरू से मजाक करता देखता रहा। उसे बहुत बुरा लगा। छोटा है यह भी भाभी कह रहा है, बड़ा है वह भी भाभी कह रहा है। बिरादरी का है वह भी भाभी कह रहा है और जो गैर बिरादरी का है वह भी भाभी कह रहा है। बुडुर्ग जब चलने को हुआ तो बोला, भवा ‘गरीब की जोरु, सबकी भाभी’।
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Ajgar Kare Na Chakari, Panchi Kare Na Kam Story In Hindi- एक दिन मलूकदास को न जाने क्या सूझा कि हठ कर बैठे कि ईश्वर सबको खिलाता है। में देखता ईश्वर मुझे कैसे खिलाता है? ऐसा सोचकर वे एक जंगल में चले गए। जंगल में उन्हें एक छायादार वृक्ष मिला। मलूकदास उसी वृक्ष के नीचे लेटकर सुस्ताने लगे। थोड़ी देर बाद वे उसी पेड़ पर चढ़कर बैठ गए।
एक आदमी आया और उसी पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा। थोड़ी देर बाद उस व्यक्ति ने पोटली खोली और खाना निकालकर रख लिया। उसने अंगोछा बिछाया और उसी पर रोटियां, सब्जी आदि सब अलग अलग करके रखता गया। जैसे ही वह खाना खाने को तैयार हुआ कि उसे घोड़ों के टापों की आवाज सुनाई दी।
उस व्यक्ति के पास धन भी था। उसने सोचा कि चोर हुए तो सब धन छीन लेंगे। इसलिए यह तुरंत पोटली लेकर भाग खड़ा हुआ वह झाड़ियों में छिपता हुआ निकल गया। थोड़ी ही देर में चोरों का गिरोह उस पेड़ के पास से निकला। पेड़ के नीचे खाना रखा हुआ देखकर गिरोह रुक गया। खाना खाने योग्य ताजा था।
सरदार ने अपने साथियों से कहा, “लगता है, जरूर कोई जासूस यहां आस-पास छिपा है। हम लोगों को पकड़वाने के लिए आया होगा।” चोरों ने इधर-उधर खोजा लेकिन किसी को कोई नहीं मिला। एक की नजर पेड़ के ऊपर चली गई। वह चिल्ला उठा, “सरदार, देखो, यो पेड़ पर एक आदमी बैठा है।
यह निश्चित रूप से जासूस है। लगता है इस भोजन में जहर मिला है। यह भोजन नीचे रखकर पेड़ पर बैठ गया है। इसने सोचा होगा कि हम लोग इस जहर मिले भोजन को खाएंगे one मर जाएंगे या बेहोश हो जाएंगे तो यह पकड़वा देगा।” मलूकदास को जबरन चोरों ने नीचे उतार लिया। मलूकदास ने चोरों से कहा कि में कोई जासूस नहीं हूँ।
मैं यूं ही यहां आकर बैठ गया था में साबु हूँ। मलूकदास की बात सुनकर सरदार उसका मारकर one one और one, “जासूस भी इसी तरह की वेशभूषा में होते हैं और इसी तरह की यात करते हैं। “सरदार ने मलूकदास के सीने पर भाते की नोंक रखते हुए कहा, “इस खाने में जहर नहीं मिला है तो इसे तू खा। अगर नहीं खाया तो जान से मार दूंगा।
“मरता क्या न करता। मलूकदास ने खाना खाना शुरू कर दिया। मलूकदास खाना खाते जा रहे थे, सोचते जा रहे थे मैंने तो सोचा था कि आज खाना नहीं खाऊंगा। इसीलिए में जंगल में चला आया था। सोचा था कि देखते हैं ईश्वर कैसे मुझे खाना खिलाता है? मेरे न चाहने पर भी खाना पड़ रहा है। सरदार और सभी बदमाश मलूकदास को खाना खाते देखते रहे।
खाना खाकर मलूकदास बोले ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए. सबके दाता राम ॥ ‘मलूकदास की बात सुनकर चोरों को लगा कि यह तो वाकई में साधु लगता है। जब देखा कि खाना खाकर भी मलूकदास को कुछ नहीं हुआ तो सभी चोर मलूकदास को प्रणाम करके चले गए।
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दोस्तों अगर आप भी किसी दूसरे व्यक्ति के फेसबुक अकाउंट को देखना चाहते हो कि उस व्यक्ति ने अपने फेसबुक अकाउंट से क्या क्या पोस्ट किया हुआ है और जैसे ही आप उस व्यक्ति के प्रोफाइल पर क्लिक करते हो तो आपको पता चलता है कि वह तो एक locked प्रोफाइल है जो कि उस व्यक्ति के द्वारा लॉक की हुई है तो आज हम आपकी इसी समस्या का समाधान करने वाले हैं।
तो आज हम आपको बताने वाले हैं कि आप किस तरह से फेसबुक की किसी भी locked प्रोफाइल को कैसे देख सकते हैं और आप उस व्यक्ति की फ्रेंड लिस्ट को भी किस तरह से देख सकते हैं तो इन्हीं सब चीजों के बारे में विस्तार से जानने के लिए इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें ताकि आप इसके बारे में पूरी जानकारी ले सकें।
Facebook Locked Profile कैसे देखे?
फेसबुक locked प्रोफाइल को किस तरह से देखते हैं यह जानने से पहले हम यह बात कर लेते हैं कि फेसबुक में locked प्रोफाइल होता क्या है।
तो अगर हम आपको लॉक्ड प्रोफाइल के बारे में साधारण भाषा में बताएं तो अगर कोई व्यक्ति अपनी निजी जानकारियों या उस व्यक्ति के द्वारा पोस्ट किए गए फोटोस और वीडियोस को वह सभी लोगों के साथ साझा नहीं करना चाहता वह उन्हें केवल अपने जानने वाले लोगों के साथ साझा करना चाहता है तो यह कार्य फेसबुक के इस लॉक्ड प्रोफाइल फीचर की मदद से उस व्यक्ति के द्वारा किया जा सकता है।
अगर साधारण भाषा में कहे तो इस फीचर का मकसद फेसबुक के यूजर्स की प्राइवेसी और उनके जरूरी डेटा को सुरक्षित रखना है ।
किसी भी दूसरे व्यक्ति की फेसबुक पर locked की हुई प्रोफाइल को देखने के लिए सबसे पहले आपको उस व्यक्ति की प्रोफाइल पर जाकर उसको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजनी होगी।
किसी भी यूजर की फेसबुक पर locked प्रोफाइल को देखने का एकमात्र तरीका यह है कि आप सबसे पहले उस व्यक्ति को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजें और जब वह व्यक्ति आपकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लेगा तो आप तब उस व्यक्ति की लॉक प्रोफाइल को आसानी से देख सकते हैं और आप उसकी फ्रेंड लिस्ट भी देख सकते हैं और इसके साथ साथ उस व्यक्ति ने उस प्रोफाइल पर क्या क्या पोस्ट किया है यह भी देख सकते हैं।
वैसे तो आपको बहुत सारे ऐसे थर्ड पार्टी एप्स और वेबसाइट देखने को मिल जाएंगे जो कि यह दावा करते हैं कि आप उनको कुछ पैसे देकर किसी भी दूसरे व्यक्ति की फेसबुक पर लॉक्ड की हुई आईडी को आसानी से देख सकते हैं।
लेकिन हम आपको बता दें कि ऐसा वे थर्ड पार्टी एप्स दवा तो करते हैं लेकिन जब आप उनको पैसे दे देते हैं तो आप उनके चंगुल में फंस जाते हैं और जैसे ही आप अपनी फेसबुक आईडी को ऐसे एप्स पर लॉगिन करते हैं तो आपका सारा डाटा उन थर्ड पार्टी एप्स के पास चला जाता है और ऐसे थर्ड पार्टी एप्स आपके उस डाटा का गलत इस्तेमाल करते हैं।
तो हमारी सलाह यही है कि आप ऐसे थर्ड पार्टी ऐप या कोई भी ऐसी वेबसाइट जो कि किसी भी यूजर की फेसबुक पर लॉक्ड की हुई प्रोफाइल को दिखाने का दावा करती है तो भूल कर भी आप ऐसे एप्स और वेबसाइट के चक्कर में ना पड़े जिससे कि आपको भविष्य में कोई भी परेशानी का सामना ना करना पड़े।
फेसबुक प्रोफाइल लॉक करने से क्या होता है?
अगर हम साधारण भाषा में इसके बारे में बताएं तो अगर आप फेसबुक पर अपनी प्रोफाइल को लॉक करते हैं तो आपने अपने फेसबुक अकाउंट पर जो कुछ भी आज तक पोस्ट किया होगा उसे केवल वह लोग देख सकते हैं जो कि आपके फेसबुक पर मित्र हैं।
फेसबुक के इस फीचर का इस्तेमाल अपनी सभी जानकारियों को प्राइवेट करने के लिए किया जाता है। ताकि आपकी फेसबुक प्रोफाइल को कोई अनजान व्यक्ति ना देख पाए आपकी फेसबुक प्रोफाइल को इस फीचर की मदद से वह लोग ही देख सकते हैं जिनको आप दिखाना चाहते हैं।
अगर आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जो कि अपनी निजी जानकारियां या आपके द्वारा फेसबुक पर डाले गए फोटोस और वीडियोस को सभी के साथ साझा नहीं करना चाहते तो आपके लिए यह फीचर बेहद ही काम का होने वाला है क्योंकि फेसबुक का यह फीचर आपको इसी सुविधा को देता है।
फेसबुक पर म्यूच्यूअल फ्रेंड का मतलब क्या होता है?
अगर आप फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं तो आपने म्यूच्यूअल फ्रेंड नाम का ऑप्शन तो कभी ना कभी जरूर देखा ही होगा। बहुत सारे लोग इसके बारे में ही नहीं जानते कि म्युचुअल फ्रेंड्स क्या होता है अगर आप को भी नहीं पता है कि म्युचुअल फ्रेंड्स क्या होता है तो चलिए हम आपको बताते हैं।
Mutual friends का हिंदी में मतलब ” आपसी मित्र ” होता है। म्यूच्यूअल फ्रेंड कोई लेबल नहीं है जिसे आप किसी दूसरे पर खुद अप्लाई कर सकते हैं यह फेसबुक की ऐसी टर्म होती है जो कि आपको यह दर्शाती है कि आप किसी और के साथ अपने मित्रों को ‘ साझा ‘ करते हैं या शेयर करते हैं।
Conclusion
सबसे पहले तो अगर आप इस आर्टिकल को यहां तक पढ़ चुके हैं तो आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। दोस्तों आज हमने आपको इस आर्टिकल के माध्यम से यह बताया कि आप किस तरह से किसी दूसरे की locked प्रोफाइल को देख सकते हैं और इसी के साथ-साथ आज हमने आपको यह भी बताया की फेसबुक आईडी लॉक करने से क्या होता है और फेसबुक पर म्यूच्यूअल फ्रेंड क्या होते हैं।
तो दोस्तों अब हमें उम्मीद है कि आप इन सभी चीजों के बारे में विस्तार से जान गए होंगे अगर आपको हमारी यह जानकारी पसंद आई हो तो इस जानकारी को अपने मित्रों के साथ जरूर शेयर करें ताकि वह ऐसे थर्ड पार्टी एप्स और वेबसाइट्स के चक्कर में ना पड़े जो कि यह दावा करते हैं कि वह किसी भी व्यक्ति की locked प्रोफाइल को दिखा सकते हैं।
आपको हमारी यह जानकारी कैसी लगी नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। और ऐसी ही जानकारियों को देखने के लिए जुड़े रहिए techyatri.com के साथ।
Chati Ka Jamun, Mere Muh Me Dal Do Story In Hindi- सड़क के किनारे एक बाग था। उस बाग में दो-तीन जामुन के पेड़ थे। जामुन के पेड़ के नीचे दो आदमी सो रहे थे। इधर-उधर तमाम जामुनें टपकी पड़ी थीं। एक जामुन एक आलसी के सीने पर पड़ी हुई थी। आंख खुलते ही उस आलसी को लगा कि छाती पर कुछ पड़ा है।
उसने थोड़ा सिर उठाकर देखा, तो सीने पर एक जामुन दिखी। अब तो जामुन की गंध उस आलसी को बेचैन करने लगी। सीने पर पड़ी हुई जामुन को खाने का उसका बड़ा मन कर रहा था। पास में ही दूसरा आलसी लेटा था और जाग रहा था। उसने उससे कहा, “भैया, एक काम कर दोगे।
“उसने पूछा, “क्या है?” उसने फिर कहा, “छाती का जामुन, मेरे मुंह में डाल दो।” दूसरे आलसी के मुंह को कुत्ता चाट रहा था। उसने उत्तर दिया, “यार, मैं कैसे डालूं ? कुत्ता तो मेरा मुंह चाट रहा है। तुम पहले कुत्ते को हटा दो, तो में जामुन तेरे मुंह में डाल दूंगा।” दोपहर का समय था। कोई सड़क पर आता-जाता दिखाई नहीं दे रहा था।
थोड़ी देर में उसे एक ऊंट लाते हुए उटवरिया आता दिखाई दिया। जब वह करीब आया, तो उसने लेटे-लेटे टेढ़ा मुंह करके आवाज़ दी, “ओ ऊंटवाले भैया, जरा एक बात सुनना। “उंटवरिया ने समझा, कोई बेचारा आवाज लगा रहा है, चलो देखते हैं क्या परेशानी है? उसने ऊंट से उतरकर ऊंट की डोरी एक पेड़ से बांधी और उस व्यक्ति की और चल दिया।
पास आकर उसने पूछा, “क्या परेशानी है भाई?” वह लेटे-लेटे ही बोला, “छाती का जामुन, मेरे मुंह में डाल दो।” इतना सुनकर उटवरिया को बहुत गुस्सा आया। उसने कहा, “तेरे जैसा आदमी तो इस दुनिया में कहीं नहीं होगा। तुझे तो चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए।
सीने पर पड़ी हुई जामुन खुद उठाकर नहीं खा सकता? बेमतलब परेशान किया। “वह जालसी बोला, “उटेवरिया भैया, सच बोलना। मेरे से ज्यादा तुम आलसी नहीं हो क्या? यहाँ से यहां आकर भी तुम छाती का जामुन, मेरे मुंह में नहीं डाल सके।
“उंटवरिया बोला, “लेटा रह, तेरी किस्मत में नहीं वदा जामुन खाना।” इतना कहकर उसने वहीं से दो-तीन साफ-सी जामुन ली और मुंह में डालकर चबाता चला गया। वह आलसी लेटा लेटा उंटवरिया को जामुन खाते देखता रहा और चूक के घूंट लीलता रहा। रास्ते भर उटवरिया सोचता रहा कि ऐसे भी आलसी है इस दुनिया में, जो दूसरे से कहें ‘छाती का जामुन, मेरे मुंह में डाल दो।
Ghar Ka Aaya Nag Na Puje, Bambi Pujan Jaye Story In Hindi- बिना ना बताए जब कोई मेहमान आता था, तो बड़ी खुशी होती थी। आए हुए मेहमान का आदर-सत्कार करते थे। जब यह पता रहता था कि अमुक मेहमान अमुक तिथि को आ रहा है, तो प्रसन्नता तो होती थी, लेकिन इतनी नहीं होती थी, जितनी बिना बताए आने वाले मेहमान के आने पर होती थी।
देवता लोग तो न बिना बताए आते थे और न बताकर ही आते थे। वरना उनके आने पर तो बहुत प्रसन्नता होती। फिर भी एक नाग देवता हैं जो अधिकतर बिना बताए घरों में आ जाते हैं। किसी के घर में नाग आ जाता था, तो घर के लोग डर के मारे बाहर निकल आते थे।
फिर किसी नाग पकड़ने वाले को बुलाकर लाते थे। घर में आए नाग देवता को पकड़वाकर जंगल या गांव के बाहर गांव से बहुत दूर छुड़वा देते थे। कुछ लोग मिलकर लाठियों से नाग देवता को मार देते थे। कुछ लोग हाथ जोड़ लेते थे और नाग देवता इधर-उधर चले जाते थे। कहने का मतलब यह है कि घर पर आए हुए नाग को कोई पूजता नहीं था।
न कोई दूध पिलाता था, बल्कि उसे मार देते थे या भगा देते थे। जब नाग का पूजन करना होता तो गांव के बाहर खेत की मेड़ों पर जाते थे। वहां नाग की वांबिया होती थीं, लेकिन नाग नहीं होते थे। वहां दूध से भरे मिट्टी के सकीरे छोड़ आते थे।
गांव के एक बुजुर्ग यह सब देखा करते थे। एक दिन गांव की औरतें मिलकर ‘नाग पंचमी के दिन गांव के बाहर बांचियां पूजने जा रही थीं। हाथ में दूध के भरे सकोरे और पके चावल लिए थीं। उन्हें देखकर एक बुजुर्ग बोल उठा ‘घर का आया नाग न पूजें, बांबी पूजन जाएं।’
Jo Hal Jote Kheti Baki, Aur Nahi To Jaki Taki– तालाब के किनारे एक मंदिर था। एक जमींदार मंदिर के चबूतरे पर बैठा-बैठा कुछ सोच रहा था। आमदनी घटती जा रही थी। सभी खेत आय-बटाई पर दे रखे थे। बिना हाथ-पैर चलाए लगभग आधी फसल का अनाज मिल जाता था। उसने खुद तो कभी हल की मूं तक नहीं पकड़ी थी।
खेत वर्षों से आप बटाई पर चले आ रहे थे, लेकिन इधर चार-पांच महीने से वह अपने खेत आप-यय पर दूसरों को देना नहीं चाहता था इस बात को लेकर काफी कहा-सुनी हुई फौजदारी होते-होते बची।
अतः यह मसला मुखिया के पास जा पहुंचा मुखिया ने पंचायत बैठाने का फैसला किया।
एक दिन पंचायत बैठी। पंचायत मुखिया की चौपाल में जुटी। क्या फैसला होता है, यह जानने के लिए गांव के तमाम लोग इकट्ठे हुए पथों ने दोनों ओर की बात सुनने के बाद, दोनों और के लोगों से कुछ बातें पूछी, “जमींदारजी, आपको आधा अनाज मिल जाता है, फिर क्यों इनसे काम नहीं कराना चाहते हैं? उस जमीन का आप क्या करेंगे?
आप तो खुद जीतेंगे नहीं, क्योंकि आपने खेती कभी की ही नहीं” जमींदार ने उत्तर दिया, “खेती मेरी है। मैं अपनी खेती का कुछ भी करूं। किसी से भी काम कराऊं।” इसके बाद पंचों ने दूसरे पक्ष से पूछा, “तुम लोग क्या कहते हो?” खेतिहर किसान बोले, “हे पंचो वर्षों से हम खेती करते आ रहे हैं।
इसी से अपने परिवारों का पालन-पोषण कर रहे हैं। ईमानदारी से आपा अनाज इनको दे रहे हैं। हमारे पास अलग से जमीन नहीं है और यहां पर काम नहीं है। हम लोग तो
भूखों मर जाएंगे।” पंचों ने आपस में विचार-विमर्श करने के बाद जमींदार से कहा, “देखिए जमींदारजी, यह तो निश्चित है कि आप खुद तो खेती करोगे नहीं। किसी दूसरे से ही करवाओगे। इससे अच्छा है, इनसे ही खेती करवाते
रहिए, वरना इन लोगों को जीविका का भीषण संकट आ जाएगा।” जमींदार ने पंचों की बात नहीं मानी। पंचों ने जमींदार को फिर एक बार समझाया। जब जमींदार नहीं माना तो पंचों ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा
Birbal Ki Khichadi Story In Hindi – पौष के महीने में शाम के समय कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। पक्षियों के झुंड के झुंड अपने-अपने बसेरों की ओर उड़ते जा रहे थे। अकबर बादशाह छत पर खड़े-खड़े यह सब देख रहे थे। आज उनके साथ वीरवल भी मौजूद थे। यमुना की लहरों को छूते हुए हवाओं के ठंडे झोंके आते और दोनों को ठंडा करते हुए निकल जाते।
दोनों ही नगर की जनता के हालात के बारे में चर्चा कर रहे थे। दिन डूबते ही लोग गलियों और सड़कों पर दिखाई नहीं देते थे। पाला पड़ रहा था। नगर की जनता और पशु-पक्षियों का बुरा हाल था। अरहर और मटर की फसलों पर पाला पड़ गया था। इन गंभीर बातों के बाद वे साधारण बातों पर उतर आए। यमुना नदी की ओर देखते हुए अकबर बोले, “बीरबल, ऐसा भी हो सकता है कि कोई व्यक्ति गले तक डूबा हुआ पूरी रात यमुना के पानी में वीरवन की बात सुनकर अकबर आश्चर्यचकित रह गए। अकबर ने कहा, “तो ठीक है।
कल एक ऐसा व्यक्ति तलाश कर लाओ “पूरे दिन चीरवत यमुना नदी के आस-पास के धीवरों से मिलते रहे। आखिर में बीरबल ने एक ऐसा व्यक्ति तलाश लिया। शाम होते ही बीरबल उस व्यक्ति को लेकर अकबर के पास पहुंचे। अकबर के सामने ही वह व्यक्ति गरदन तक यमुना के पानी में उतर गया। कुछ देर अकबर देखते रहे। उसके बाद अकबर ने कई कारिंद तैनात कर दिए कि इस आदमी की देखभाल करते रहें।
सुबह होते ही बादशाह छत पर आए देखा तो यह आदमी उसी तरह पानी में खड़ा हुआ था। अकबर ने कारिंदा से कहा कि अब इसे बाहर आने को कहो और दरबार में लेकर आओ। कारिंदा उस धीवर को लेकर अकबर के दरबार में पहुंचा। अकबर ने उस धीवर से पूछा कि पूरी रात तुम पानी में कैसे खड़े रहे? अकबर की बात सुनकर धीवर ने कहा, “जहांपनाह में तो रात भर ईश्वर का नाम लेता रहा। कभी-कभी यमुना के उस पार जलते हुए दीपक को देखता रहा।
इससे मन लगा रहा इतनी बात सुनते ही अकबर बोल पड़े, “अच्छा तो पूरी रात पानी में खड़े रहने का यह राज है। दीये की लौ से गर्मी लेते रहे और मैं यही सोचता रहा कि इतनी तेज सदी में कोई पूरी रात कैसे खड़ा रह सकता है? अकबर की बात सुनकर वीरवत को अजीब सा लगा। बीरबल कुछ कहना चाह रहे थे, लेकिन बोले नहीं।
अपमान का घूंट पीकर रह गए। धीवर बेचारा सोच रहा था कि इनाम मिलेगा, लेकिन उसे झिड़की सुनने को मिली। शाम को बीरबल पीवर के पास गए। उसे कुछ रुपए अपने पास से दिए और कहा कि चिंता मत करना। तुम्हें इनाम अवश्य मिलेगा। बीरबल रात भर धीवर की समस्या को लेकर उपेड़-बुन में लगे रहे।
इस घटना से वीरबल का भी अपमान हुआ था और उसके प्रति तो बिल्कुल नाइंसाफी हुई थी। नींद के आते-आते बीरबल के दिमाग में इस समस्या का तरीका आ गया था। दूसरे दिन जब दौरवत समय से दरबार में नहीं पहुंचे, तो बादशाह ने हरकारा भेजा और वीरवत को आने के लिए कहलवा भेजा। जब बीरबल के पास हरकारा पहुंचा, तब ये खिचड़ी पका रहे थे। बीरबल ने हरकारे से कहा कि बादशाह से कहना कि बीरबल खिचड़ी बना रहे हैं। एक घंटे में पहुंचते हैं।
हरकारे ने जाकर बीरबल की कही बात को बादशाह से कह दिया। दो घंटे बीत गए, लेकिन धीरबल दरवार नहीं पहुंचे। अकबर ने फिर हरकारा भेजा। राजय वीरबल के पास पहुंचा, तो बीरबल ने हरकारे से कार कि बादशाह से कहना कि खिचड़ी अभी पक्की नहीं है। एक घंटे बाद आ रहे हैं। दो घंटे और बीत गए तो तीसरी बार अकबर ने फिर हरकारा भेजा।
तीसरी बार भी हरकारा, वही उत्तर लेकर लोटा कि खिचड़ी पकने में अभी एक घंटा और लगेगा। दरबार का समय खत्म होने को आया, लेकिन बीरबल दरबार में नहीं पहुंचे। दरबार खत्म करने के बाद अकबर बादशाह सीधे बीरबल के पास पहुंचे। उन्होंने देखा कि बीरबल खिचड़ी पका रहे हैं। वीर ने एक लंबा वांस जमीन में गाड़ रखा था और उसके ऊपर, चोटी पर एक हांडी लटका रखी थी।
बीरबल ने बांस के नीचे जमीन पर चूल्हा जता रखा था। यह देखकर अकबर बादशाह आश्चर्यचकित रह गए। बीरबल बैठे चूल्हा जला रहे थे। कब वीरवत के पास आकर अकबर खड़े हो गए, बीरबल को मालूम नहीं पड़ा जब अकबर ने आवाज दी, तो वीरवल ने देखा और खड़े हो गए। बीरबल बोले, “जहांपनाह आप आपने क्यों कष्ट किया? खिचड़ी पकाने में लगा हुआ हैं। एक ही नहीं रही है। में सुबह से बैठा-बैठा पका रहा हूँ।
“अकबर मुस्कराते हुए बोले, “तुम्हारी खिचड़ी कभी नहीं एक पाएगी। “क्यों नहीं जहांपनाह, इसकी गर्मी हांड़ी तक अवश्य पहुंच रही है। आप ही सोचिए, उस धीवर को यमुना पार जलते दीये से गर्मी मिलती रही और उसी की गरमाहट से वह पूरी रात पानी में खड़ा रहा। “अकबर ने बीरबल को गले लगा लिया और कहा, “उस धीवर को कल दरबार में हाजिर होने के लिए बुलावा भेज देना। आप भी समय पर आ जाना यहीं खिचड़ी मत पकाते रहना।” इतना कहकर अकबर बादशाह चले गए।
दरबार लगा हुआ था। बीरबल धीवर को लेकर समय पर पहुंच गए। अकबर बादशाह ने अपनी मूल को सुधारते हुए धीवर को सम्मानित किया और सम्मान के साथ ही अच्छा इनाम भी दिया। दरबारियों ने आपस में कानाफूसी करते हुए आपस में कहा- “यह सब ‘बीरबल की खिचड़ी’ का कमाल है।
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Man Changa To Kathoti Mein Ganga – दास जूते गांठकर अपनी जीविका कमाते थे। सड़क पर जगह बना ली थी, जहां पर बैठकर रोजाना जूते ‘गांठा करते थे। काशी जाने वाले लोग इसी सड़क से होकर जाया करते थे। साधु संत आदि जो भी लोग गंगास्नान के लिए जाते थे, इधर से होकर ही निकलते थे। रैदास को उनका दर्शन लाभ होता था और उनके जूते गांठकर सेवा करने का अवसर मिलता था।
एक दिन की बात है। उस दिन कोई पर्व था। उनके एक साथी पडित गंगास्नान को जा रहे थे। उन्होंने सोचा, चलो रैदास से मिलते चलते हैं और जूता भी गंठवा लेंगे। रैदास के पास पहुंचे, तो जूता गठवाने के लिए उतार दिया और रैदास से बोले, “गंगास्नान के लिए नहीं चलोगे?”
रैदास काम करते जा रहे थे और पंडित से बातें करते जा रहे थे, “पंडित जी हम गरीबों को बच्चों के पेट पालने से फुरसत नहीं। गंगास्नान कहां से करें? हम लोग तो रोजी-रोटी में ही फंसे रहते हैं महाराज।” तब तक रैदास ने जूते की सिलाई करके पंडित के आगे रख दिया। पंडितजी जेब से निकालकर पैसे देने लगे, तो रैदास बोला, “आप से मजूरी के पैसे नहीं लूंगा।
आप मेरा एक छोटा-सा काम कर देना पंडित ने पूछा, “क्या काम है?” रैदास ने पांच सुपारी देते हुए कहा, “ये सुपारी मेरी ओर से गंगा मैया को भेंट कर देना, लेकिन गंगा मैया जब हाथ बढ़ाकर में, तभी देना पंडित ने रेदास की सुपारियां लीं और चल दिए, लेकिन पंडित रैदास की बात पर रास्ते भर हंसता रहा, तरह-तरह की बातें सोचता रहा। गंगा घाट पर जाकर पंडित ने स्नान-ध्यान किया।
जैसे ही वे वापस चले, तो रैदास को सुपारियों की याद आ गई। सुपारियों गंगा में फेंकने ही वाले थे कि उसी समय रात की गंगा द्वारा हाथ बढ़ाकर लेने की बात याद आ गई। रैदास का तेवर पंडित को अब भी याद था। पंडित को उसकी बात पर दिल्कुल विश्वास नहीं था, फिर भी रेदास की असलियत जानने के लिए रुक गया। पंडित ने हाथ में सुपारियां तो और गंगा मैया से बोला, “लो, रैदास ने आपके लिए ये सुपारियां भेजी हैं पंडित इतना कहकर चुप हो गए और हाथ निकलने का इंतजार करने लगे।
उसी समय जल में से एक कोमल हाथ निकला और सुपारियां लेकर जल में चला गया। उसी क्षण दूसरा हाथ निकला। उस में रत्नों से जड़ा हुआ सोने का सुंदर कंगन था। साथ ही उसे आवाज सुनाई दी कि यह कंगन प्रसाद के रूप में रैदास को दे देना। रैदास से कहना कि गंगा मैया ने तुम्हारी भेंट स्वीकार कर ली है।
इस घटना से पंडित आश्चर्यचकित रह गया। फिर भी पंडित मन-ही-मन रैदास से ईर्ष्या करने लगा। जब पंडित उसी रास्ते से निकला, तो रैदास की नजर बचाते हुए सीधा बर निकल गया। सोने के कंगन ने पंडित के मन में लोभ पैदा कर दिया था। घर पहुंचते ही पंडित ने आवाज लगाई, “सुनती हो, देखो में क्या लाया हूं? कंगन को देखकर पंडिताइन की खुशी का ठिकाना न रहा। पंडित कंगन से संबंधित पूरी घटना सुनाते रहे और पंडिताइन सोचती रही कि अब घर की दरिद्रता दूर हो जाएगी। यह कंगन रत्नों से जड़ा हुआ सोने का है। इसकी कीमत का अंदाजा लगाना मुश्किल है।
पंडिताइन ने पंडित को सुझाव देते हुए कहा, “इसे बेचने में बड़ी दिक्कत आएगी सुनार सोचेगा। कि यह रत्नों से जड़ा हुआ सोने का कंगन पंडित के पास कहां से आया? इससे अच्छा है आप इसे काशी नरेश को भेंट कर दो। काशी नरेश इतना इनाम देगा कि हमें भीख मांगने से छुटकारा मिल जाएगा। फिर चैन से रहेंगे।
“दूसरे दिन पंडित काशी नरेश के दरबार में पहुंचा। पंडित ने नरेश को जब यह कंगन भेंट किया, तो बहुत प्रसन्न हुए। काशी नरेश ने पंडित को पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपए दिए। पंडित रुपए लेकर अपने घर चला गया। प्रसन्न होकर रानी ने कंगन को पहन लिया। जिसने भी उस कंगन को देखा, सभी ने बहुत सुंदर बताया। सुंदर बताने वालों ने यह भी कहा, “आपका दूसरा हाथ सूना-सूना लगता है जब महारानी ने काशी नरेश से अपने एक हाथ के सूनेपन की बात कही, तो उन्होंने तुरंत पाहिले को बुलवाया।
उससे उस कंगन के जोड़े का दूसरा कंगन लाने के लिए कहा गया। काशी नरेश ने यह भी खबर मिजबाई कि यदि उसने कंगन लाकर नहीं दिया, तो घर जब्त कराकर देश निकाला दे दिया जाएगा। पंडित दबराता हुआ राजा के पास पहुंचा। उसने कंगन प्राप्त करने की पूरी कहानी सुना दी। काशी नरेश ने कहा, “रैदास से जाकर कहो कि गंगाजी से इसके जोड़ का दूसरा कंगन लेकर आए पंडित रोता हुआ रैदास के पास पहुंचा। उसने एक लाख रुपए सामने रखकर पूरी घटना सुनाई और बोता, “रैदासजी मुझे माफ कर दो मेरी जान बचा लो।
गंगाजी से उसके जोड़ का दूसरा कंगन लाकर दे दो। एक लाख रुपए से ले तो एक लाख रुपए उस कंगन के भी मिलेंगे।” रैदास ने विनम्र भाव से कहा, “महाराज, मेरी जीविका तो जूते गांठने में निकल आती है। हमारी सब जरूरतें इसी काम से पूरी हो जाती हैं। इन्हें तो आप ही रखिए, और गंगा जाने को मेरे पास समय नहीं है, फिर भी मेरी इच्छा है कि आपका काम हो जाए।
“पंडित गिड़गिड़ाते हुए बोला, “आप जैसा चाहें, वैसा करें। मुझे राजा के कोप से बचा लीजिए। मेरा घर-बार छीनकर देश निकाला दे देगा ।” रैदास पंडित की स्थिति को समझ गए। रैदास ने सामने रखी चाम को भिगोनेवाली कठौती को अंगोला फैलाकर ढक दिया और बोले, “जो मन चंगा तो कठौती में गंगा।” अंगोछा हटाते ही उसमें पहले की ही तरह का रनों से जड़ा हुआ सोने का कंगन दिखाई दिया। रैदास ने कंगन निकालकर पंडित को दे दिया।
पंडित तेज कदमों से चलते हुए सोचता जा रहा था कि किस प्रकार एक जूते गांटने वाले बमार ने दो लाख रुपए ठुकरा दिए थे। मोर माया से रहित दयावान रेदास उसके अंदर तक उतर गया। उसे बार-बार एक बात याद आ रही थी ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’।
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