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डिटेक्टिव | Detective Story In Hindi

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Detective Story In Hindi

Detective Story In Hindi- जलधर के मामा पुलिस में नौकरी करते थे और उसके फूफा जासुसी उपन्यास लिखते थे। इसीलिए जलधर को भरोसा था कि चोर डाकूओं, धोखेबाज़ों को क़ाबू में करने का हर प्रकार का तरीका यह जितना जानता था, उतना उसके मामा और फूफा को छोड़कर किसी को नहीं पता था। किसी के घर में चोरी आदि होने पर जलधर सबसे पहले वहाँ पहुँच जाता और किसने चोरी किया, कैसे चोरी हुआ, वह रहता तो ऐसी हालत में क्या करता, इन सबके बारे में किसी अनुभवी की तरह बातें करता था।

योगेश बाबू के घर से जब वर्तन चोरी हुए, तब जलधर ने उनसे कहा, “आप लोग जरा भी सावधान रहना नहीं जानते, चोरी तो होगी ही अब देखिए, आपके भण्डार घर के बगल में ही अँधेरी गली है, इधर खिड़की में सींखचे भी नहीं हैं। किसी भी चतुर आदमी को यहाँ से बर्तन लेकर भागने में कितना समय लगेगा।

Detective Story In Hindi

हमारे घर में ऐसा होना सम्भव नहीं। मैंने रामदीन से कह रखा है कि खिड़की की दीवार से बर्तनों को इस तरह सटाकर रखे कि खिड़की खोलते ही सारे बर्तन झन झन करते हुए जमीन पर गिर पड़ें। चोर को पकड़ने के लिए ये सब तरीके जानने पड़ते हैं।” यह सुनकर हम सभी ने जलघर की बुद्धि की बड़ी प्रशंसा की।

लेकिन दूसरे ही दिन जब सुना कि उसी रात को जलधर के घर में बहुत बड़ी चोरी हो गयी है, तब लगा कि उसका एक दिन पहले ही अपने बारे में इतना हाँकना ठीक नहीं था। मगर जलधर इस बात से जरा भी परेशान नहीं था। उसने कहा, “इस अक़्ल के अन्धे रामदीन की बेवक़ूफ़ी से सब मिट्टी में मिल गया। खैर, मेरा सामान चोरी करके वह हजम नहीं कर सकता। ज़रा दो-चार दिन बीतने दो।

दो महीने बीते, चार महीने बीते, मगर चोर पकड़ में नहीं आया। चोर के उपद्रव की बात सभी भूल ही चुके थे, ऐसे समय हमारे स्कूल में फिर से चोरी का हंगामा शुरू हो गया। छात्रों में काफ़ी लड़के अपना टिफ़िन लाया करते थे, उसमें से खाना चोरी होने लगा। पहले दिन रामपद का खाना चोरी हो गया।

वह बेंच पर रबड़ी और पूड़ी रखकर हाथ धोने गया था, इसी बीच न जाने कौन आकर पूड़ी वगैरह खाकर सटक गया। इसके बाद कक्षा में और भी दो-चार लड़कों का खाना चोरी चला गया। तब हम लोगों ने जलधर को पकड़ा, “क्यों जी डिटेक्टिव ! ऐसे मौके पर तुम्हारी चोर पकड़ने की बुद्धि नहीं खुल रही है? इसका क्या मतलब है, जरा बताओ तो? जलधर ने कहा, “मैं क्या अपनी बुद्धि नहीं लड़ा रहा हूँ? जरा सब करो।” तब उसने बड़ी सतर्कता से हमारे कान में कहा कि स्कूल में जो नया छोकरा चपरासी आया है, उसका सन्देह उसी पर है, क्योंकि उसी के आने के बाद से चोरी शुरू हुई है।

हम सभी उस दिन से उसपर नजर रखने लगे। लेकिन दो दिन बीतते-बीतते ही फिर चोरी शुरू हो गयी। बेचारे पगला दासू ने घर से कबाब लाकर टिफ़िनवाले कमरे की बेंच पर नीचे उसे छिपाकर रख दिया था, मगर न जानें कौन आकर उसका आधा हिस्सा हड़पकर बाक़ी धूल में फेंककर बर्बाद कर गया था। पगला ने तब मारे गुस्से के चीखते-चिल्लाते गालियाँ देते हुए पूरे स्कूल को सिर पर उठा लिया। हम सभी ने उससे कहा, “अरे चुप कर चुप, इतना शोर मत मचा। वरना चोर पकड़ा कैसे जाएगा?

मगर पगला भला इतनी आसानी से शान्त हो जाता! तब जलधर ने ही उसे समझाया, “बस, दो दिन और धैर्य रख। इस नये छोकरे को तो मैं रंगे हाथों पकड़वा दूंगा, यह सब उसी की कारस्तानी है। “यह सुनकर दासू ने कहा, “तुम्हारी भी कैसी बुद्धि है! ये सब हिन्दी भाषी इलाके के ब्राह्मण लोग हैं।

ये लोग भला गोश्त खाएंगे? जरा दरवान जी से पूछकर देख लो। ”वाक्रई, हम लोगों के ध्यान में तो यह बात आयी ही नहीं थी। छोकरा तो कई दिनों से अपने हाथ से रोटी पकाकर खा रहा था, मगर एक दिन भी उसे मांस-मच्छी खाते नहीं देखा। दासू चाहे पगला हो या कुछ और हो, उसकी यह बात सभी को माननी पड़ी।

मगर जलघर घबरानेवाला लड़का नहीं था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने जानबूझकर तुम सबको गलत कहा था। अरे, चोर जब तक पकड़ा नहीं जाता, तब तक उसके बारे में कभी कुछ कहना चाहिए? कोई भी पक्का जासूस ऐसा नहीं करता। में मन-ही-मन जिसे चोर समझता हूँ, उसे मैं जानता हूँ।

इसके बाद कुछ दिन हम लोग बड़े सावधान थे। आठ-दस दिन चोरी बन्द रही। तब जलघर ने कहा, “तुम लोगों ने हो-हल्ला मचाकर सारा काम बिगाड़ दिया। चोर को पता चल गया कि मैं उसके पीछे लगा हूँ। अब भला उसे चोरी करने का साहस हो सकता है? यह अच्छा हुआ कि मैंने तुम सबको असली नाम बताया नहीं था।

मगर उसी दिन पता चला कि खुद हेडमास्टर साहब के कमरे से उनका टिफ़िन चोरी हो गया। मैंने कहा, “क्यों जी, चोर तो तुम्हारे ही डर से चोरी नहीं कर पा रहा था न। लगता है उसका डर हिरन हो गया है। “इसके बाद दो दिनों तक जलघर के चेहरे पर हँसी नजर नहीं आयी। चोर के बारे में सोचते-सोचते उसकी पढ़ाई ऐसी गड़बड़ा गयी कि एक दिन वह मार खाते-खाते बचा।

दो दिन बाद उसने हम सभी को बुलाकर कहा, उसने चोर पकड़ने का बन्दोबस्त कर लिया है। टिफ़िन के समय कमरे में वह एक ढोंगे में पनीर पकौड़ी, पूड़ी और दमआलू रखकर बाहर चला आएगा। इसके बाद कोई भी उधर नहीं जाएगा…स्कूल के बाहर से छिपकर टिक्रिनवाले कमरे में नजर रखी जा सकती है। हम कुछ लड़के घर जाने का बहाना करके यहीं से छिपकर देखेंगे। कुछ लड़के आँगन के पश्चिमी कोनेवाले कमरे में रहेंगे। इसलिए चोर भले ही किधर से आये, टिफ़िनवाले कमरे में घुसते ही वह पकड़ा जाएगा।

उस दिन टिफिन की सुट्टी न होने तक किसी का भी मन पढ़ाई में नहीं लगा। सभी सोच रहे थे कि जल्दी छुट्टी हो और फटाफट चोर पकड़ा जाए। चोर को पकड़ने के बाद उसका क्या किया जाए, इस पर भी बात होने लगी। इससे मास्टर साहब नाराज हो गये। उन्होंने न सिर्फ़ सभी को डाँटा, बल्कि परेश और विश्वनाथ को बेंच पर खड़े होने की सजा भी दे दी… मगर समय जैसे बीत ही नहीं रहा था।

टिफिन की छुट्टी होते ही जलचर अपने खाने का ढोंगा टिफ्रिनवाले कमरे में रख आया। जलधर, मैं और दस-बारह लोग आँगन के कोनेवाले कमरे में चले गये और कुछ लड़के बाहर जिमनास्टिकवाले कमरे में छिप गये। जलधर ने कहा, “देखो यह चोर बेहद सयाना है और हिम्मती भी, उससे मारपीट करना ठीक नहीं होगा।

वह काफ़ी हट्टा-कट्टा भी होगा। मेरा कहना है कि वह अगर इधर आये तो सभी मिलकर उसपर स्याही फेंक दें और शोर करें। इससे दरबान वगैरह सभी भागते हुए आ जाएंगे। और, वह आदमी अगर भागे भी तो स्याही के चिह्न से पकड़ा जाएगा।” रामपद ने पूछा, “वह चोर खूब तगड़ा होगा, यह कैसे कहा जा सकता है? वह राक्षस की तरह खूब खाता है, ऐसा तो नहीं लगता। वह जो कुछ भी चुराता है, वह थोड़ा-सा ही होता है।

जलधर बोला, “तुम्हारी भी कैसी बुद्धि है राक्षस की तरह देर-सा खाने से ही क्या आदमी तगड़ा हो जाता है? तब तो हमारे श्यामादास को ही सबसे तगड़ा कहना होगा। घोष के यहाँ दावत में उसे खाते हुए देखा था न भैया, मैं जो भी कहता हूँ, उसे काटने की जरूरत नहीं और अगर 1 तुममें वाकई हिम्मत हो तो जाकर चोर से भिड़ जाओ। हम लोग इसमें आपत्ति नहीं करेंगे। मुझे पता है, यह किसी मामूली चोर का काम नहीं है बल्कि मुझे तो यकीन है कि जिस व्यक्ति ने मेरे घर में चोरी की है, वह भी उसी की करामात है।

तभी अचानक टिफ्रिनवाले कमरे की बायीं ओर की खिड़की घोड़ी-सी खुल गयी, जैसे उसे कोई भीतर से ठेल रहा हो। उसके बाद सफ़ेद जैसी कोई चीज अप से आँगन में कूदी। हमने आंखें फाड़कर देखा, वह एक मोटा ताजा बिल्ला था उसके मुँह में जलधर की मिठाई थी। उस समय अगर जलघर के चेहरे पर किसी की नज़र पड़ी होती। वह मुँह बाए आँगन की ओर देख रहा था।

हम लोगों ने उससे पूछा, “क्यों भैया डिटेक्टिव क्या इस मुस्टण्डे चोर ने ही तुम्हारे यहाँ चोरी की थी? कहो तो इसे पकड़कर पुलिस को दे दें।

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यज्ञदास के मामा | Yagyadas Ke Mama Story In Hindi

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Yagyadas Ke Mama Story In Hindi

Yagyadas Ke Mama Story In Hindi– उसका असली नाम यज्ञदास था। वह जिस दिन पहली बार हमारी कक्षा में आया, पण्डितजी ने उसका नाम सुनते ही आहे सिकोड़कर कहा, “यज्ञ का भी भला दास होता है? यशेश्वर होता तब भी कोई बात थी।” उसने कहा, “जी, अपना नाम मैंने तो नहीं रखा है, यह नाम ताऊजी का दिया हुआ है।

यह सुनकर मुझे जरा हँसी आ गयी, जिससे पण्डितजी ने मेरी ओर देखकर कहा, “यज्ञदास के हिज्जे बता।” मैंने थोड़ा घबराते हुए कहा, “वर्गी का ज…” पण्डितजी बोले, “तू खड़ा हो जाए इसके बाद जब एक लड़के ने सही जवाब दिया तो उन्होंने एक और लड़के से कहा, “समास कर।” उसने अपनी संस्कृत विद्या दर्शाते हुए कहा, “योग्यश्चेति दासश्चासो ।

Yagyadas Ke Mama Story In Hindi

पण्डितजी उसका कान पकड़कर बोले, “बेंच पर खड़ा हो जा! दो दिन बीतते-बीतते पता चल गया कि यज्ञदास को और कोई विद्या आये या न आये, उसमें अजीबोगरीब कहानियाँ कहने की असाधारण क्षमता थी। एक दिन वह देर से स्कूल में आया। कारण पूछने पर उसने कहा, “आते वक़्त रास्ते में पच्चीस कुत्ते मुँह फाड़कर मेरे पीछे पड़ गये थे।

मैं भागकर हाँफते हाँफते उस कुण्डू के घर तक चला गया था।” हम लोगों ने तो पच्चीस कौन कहे, दस कुत्ते भी कभी एक साथ नहीं देखे थे, इसलिए मास्टर साहब को भी यकीन नहीं हुआ। उन्होंने पूछा, “ऐसी झूठी बातें बनाना किससे सीखा?” यज्ञदास ने बताया, “जी, अपने मामा से।” उस दिन हेडमास्टर के कमरे में यज्ञदास की पेशी हुई थी। वहाँ क्या हुआ, हमें पता नहीं। मगर यज्ञदास खुश नहीं था, यह बात समझ में आ गयी।

मगर सच हो या झूठ, क़िस्सा कहने में वह उस्ताद था। वह जब अपनी आँखें फाड़-फाड़ कर बड़े गम्भीर गले से अपने मामा के यहाँ डाकू पकड़े जाने का किस्सा सुनाता, तब यकीन आये चाहे न आये, हमारे मुँह अचरज से खुल जाते यज्ञदास के मामा का वर्णन तो हमें बेहद आश्चर्यजनक 1 लगता। उनके शरीर में जैसा बल था, वैसी ही उनकी असाधारण बुद्धि थी।

वे जब अपने नौकर रामभजन को पुकारते थे, तब पूरा मकान बरबराकर काँप उठता। चाहे कुश्ती हो या लाठी भाजना या क्रिकेट, सभी में वे बेजोड़ थे। पहले तो हम लोगों को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ था। लेकिन एक दिन उसने हमें अपने मामा का फ़ोटो दिखाया।

हमने देखा, वाक़ई पहलवानों जैसा उनका चेहरा था। स्कूल में जब भी छुट्टी होती, यज्ञदास अपने मामा के यहाँ चला जाता। वहाँ से लौटकर वह जो-जो क्रिस्से हमें सुनाता, ये अखबार में छपने लायक होते। एक दिन यज्ञदास से स्टेशन पर मेरी भेंट हो गयी। मैंने देखा, गाड़ी में सिर पर पगड़ी बाँधे लम्बी-चौड़ी कद-काठीवाले कोई देहाती सज्जन बैठे थे।

मैंने स्कूल आते वक़्त यज्ञदास से पूछा “क्या तुम्हारी भी उस पगड़ीवाले भारी-भरकम व्यक्ति पर नजर पड़ी?” यज्ञदास ने कहा, “वह तो मेरे मामा थे।” मैंने कहा, “तस्वीर में तो ये काले नजर आ रहे थे।” यज्ञदास बोला, “वे इस बार शिमला जाकर गोरे हो गये हैं। मैंने स्कूल पहुँचकर सभी को बताया कि मैंने आज यज्ञदास के मामा को देखा है।

यज्ञदास ने भी सीना फुलाकर अपना चेहरा गम्भीर करके कहा, “तुम लोग तो मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते। ठीक है, बीच-बीच में मैं एकाध गप्प सुना देता हूँ। ऐसा नहीं कि सभी बातें मेरी गढ़ी हुई होती हैं। मेरे जीते-जागते मामा को भी तुम लोग नकार देना चाहते हो।” इस बात पर कइयों को शर्म भी महसूस हुई। वे कहने लगे, “नहीं भाई, हमें शुरू से ही तुम्हारी बातों पर भरोसा था।

इसके बाद से यज्ञदास के मामा का रुतबा और ज़्यादा बढ़ गया। मामा के बारे में जानने के लिए हम लोग उत्सुक रहते। किसी दिन सुनते उसके मामा हाथी, गेण्डे, बाघ के शिकार को गये हैं, किसी दिन सुनते, उन्होंने अकेले ही पाँच काबुलीवालों को पीटकर दुरुस्त कर दिया है। ऐसे किस्से हम अक्सर सुनते।

एक दिन जब हम सभी टिफ़िन के समय बैठकर बातें कर रहे थे, तब हेडमास्टर साहब ने कक्षा में आकर कहा, “यज्ञदास, तुम्हारे मामा आये हैं।” अचानक यज्ञदास का चेहरा आम की खटाई की तरह सिकुड़ गया। वह बड़े संकोच से कुछ कहने को हुआ, पर कह नहीं पाया। वह एक भले लड़के की तरह चुपचाप हेडमास्टर साहब के साथ चला गया। हम लोगों ने कहा, “बेचारा घबराएगा नहीं? जानते तो हो ही, कैसे मामा हैं।

हम सभी उसके मामा को देखने के लिए उतावले हो गये। मगर वहाँ जाकर देखा तो पाया कि एक दुबले-पतले काले रंग के छोकरे जैसे महानुभाव चश्मा चढ़ाए गोवर गणेश की तरह बैठे। हुए थे। यज्ञदास ने उन्हें जाकर प्रणाम किया। उस दिन सचमुच हमें बेहद गुस्सा आया था। ऐसा धोखा! हमें एक झूठमूठ के मामा के बारे में बताता रहा? उस दिन हम लोगों की खिंचाई से यज्ञदास के आँसू निकल आये। उसने मान लिया कि वह फ़ोटो वास्तव में किसी पुरबिया पहलवान की थी।

उस दिन उसने गाड़ी में बैठे जिस व्यक्ति को अपना मामा बताया था, उसे वह खुद भी नहीं जानता था। उसके बाद से किसी अजीबोगरीब चीज़ की चर्चा होते ही हमारे मुँह से निकल जाता, क्या यज्ञदास के मामा की तरह?

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पेटू | Petu Story In Hindi

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Petu Story In Hindi

Petu Story In Hindi- हरिपद की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। सभी मिलकर उसे जोर-जोर से पुकार रहे थे, मगर हरिपद मौन था। क्यों, हरिपद क्या बहरा था? उसे कम सुनाई पड़ता था? नहीं, वह कम क्यों सुनेगा? वह तो हर बात साफ़ सुन लेता था। तो क्या हरिपद घर में नहीं था? ऐसा भी नहीं था।

हरिपद के मुँह में रबड़ी का लड़ दूंसा हुआ था न उसे फेंकते बन रहा था न निगलते। वह जवाब कैसे देता? साथ ही वह लोगों की पुकार सुनकर फटाफट आ भी नहीं सकता था … पकड़े जाने का डर था। इसीलिए यह जल्दी-जल्दी लहू पानी के सहारे निगलने की कोशिश कर रहा था। मगर निगलने की जितनी कोशिश करता, उतना ही लड्डू उसके गले में आटे की तरह चिपकता जा रहा था, बस खाँसी का दौरा पड़ना बाक़ी था।

Petu Story In Hindi

हरिपद की यह बड़ी बुरी आदत थी। इसके लिए उसे कितनी डाँट पड़ी थी, सजा भुगतनी पड़ी थी, मगर उसे अक्ल नहीं आयी। वह चोरी-छिपे पेटुओं की तरह खाता ही रहता। जैसा हरिपद था, वैसा ही उसका छोटा भाई भी था। हालाँकि उसे कुछ भी हजम नहीं होता था, दो-चार दिन बाद ही उसे पेट की बीमारी हो जाती थी, मगर लोभ नहीं कम होता था।

जिस दिन उसे ज़्यादा तकलीफ़ हो जाती, उसके बाद कुछ दिनों तक वह ऐसा काम न करने की प्रतिज्ञा करता। देर-सवेर के अखाद्य खाने-पीने से रात में जब उसका पेट दुखता तब वह रोते हुए कहता, “अब और नहीं, यही आखिरी बार था।” मगर दो दिन बीतते-न-बीतते फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता।

अभी कुछ दिन पहले ही बुआजी के कमरे में दही खाते हुए यह पकड़ा गया था। काफ़ी भुगतना भी पड़ा। मगर उसे शर्म नहीं आयी। हरिपद के छोटे भाई श्यामापद ने आकर उससे कहा, “दादा, जल्दी चलो। बुआजी ने अभी-अभी हाण्डी भर दही अपने खाट के नीचे छिपाकर रखा है।” उसे बड़े भैया को इतनी उतावली के साथ ख़बर देने की जरूरत इसलिए पड़ी थी, क्योंकि बुआजी के कमरे के दरवाजे की सकल तक उसका हाथ नहीं पहुँच पाता था।

इसीलिए उसे बड़े भैया की सहायता की जरूरत पड़ी थी। बड़े भैया ने धीरे से सॉकल खोलकर झपटकर पहले ही खाट के नीचे रखी दही की हाण्डी से मुट्टीभर दही निकालकर मुँह में भर लिया और दूसरे ही क्षण वह चीखने लगा-जैसा कि बोलचाल में लोग कहते हैं-साँड की तरह चिल्लाना। लेकिन हरिपद उससे भी ज़्यादा भयावह रूप से चीख रहा था। उसकी चीख सुनकर माँ-मौसी, दीदी-बुआ जो जहाँ थीं, भागकर वहाँ पहुँची श्यामापद चालाक था।

वह बड़े भैया की चीख का नमूना सुनते ही वहाँ से भागकर घोष मुहल्ले में चला गया। वहाँ पहुँचकर भले लड़के की तरह अपने दोस्त शान्ति घोष से पढ़ाई का पाठ समझने लगा। इधर हरिपद की हालत देखकर बुआजी समझ गयी कि हरिपद ने दही के धोखे से उनकी चूने की हण्डिया से चूना चख लिया है। उस बार हरिपद को जबर्दस्त सजा मिली।

सप्ताह भर तक न उससे कुछ खाते और न निगलते बना। उसके लोभ से ही उसकी ऐसी आफ़त आयी थी। इसके बावजूद वह लज्जित नहीं हुआ। आज फिर वह छिपकर लड़ खा रहा था। उधर उसके मामा उसे हाँक लगा-लगाकर परेशान हो रहे थे।’ घोड़ी देर बाद अपना मुँह धो-पोंछकर हरिपद सुशील बालक की तरह हाजिर हो गया।

हरिपद के बड़े मामा बोले, “अरे, अभी तक कहाँ था?” हरिपद ने जवाब दिया, “यहीं ऊपर तो था।” “तो फिर हम लोग इतना पुकार रहे थे, तूने जवाब क्यों नहीं दिया?” हरिपद ने सिर खुजलाकर कहा, “जी, पानी पी रहा था।” “सिफ़ जल? या कुछ स्थल भी था ?”

हरिपद ऐसे हँसा, जैसे उससे कोई तगड़ा मज़ाक़ किया गया हो। तभी उसके मँझले मामा बेहद गम्भीर होकर वहाँ उपस्थित हुए। उन्हें भीतर से ख़बर मिली थी कि हरिपद कुछ देर पहले भण्डार घर में घुसा था और उसके बाद से ही दस-बारह रबड़ी के लड्डू कम हो गये थे। वे आते ही हरिपद के मामा से अंग्रेजी में फुसफुसाकर कुछ बोले।

इसके बाद सबको सुनाते हुए उन्होंने गम्भीरता से कहा, “घर में चूहों का जैसा उत्पात शुरू हुआ है, उससे लगता है कि चूहों को मारने का कोई वन्दोवस्त किये बिना काम नहीं चलनेवाला। चारों तरफ़ प्लेग की महामारी और बीमारी भी फैली हुई है। इस मुहल्ले के चूहों को ख़त्म किये बिना जान नहीं बचनेवाली।” बड़े मामा बोले, “हाँ, इसका इन्तजाम भी कर लिया गया है।

दीदी से मैंने ज़हर के बनाने के लिए कहा है उन्हें एक बार चारों तरफ़ रख देने से ही चूहों का समूल विनाश हो जाएगा।” हरिपद ने पूछा, “लड कब बनाए जाएँगे?” बड़े मामा वोले, “अब तक वे बन गये होंगे। सुबह ही मैंने देखा कि टेंपो थाली भर रबड़ी लेकर दीदी के साथ लहू बना रही थी।

हरिपद का चेहरा आम की खटाई की तरह सिकुड़ गया। उसने लौर निगलकर पूछा, “धतूरे का जहर खाने से क्या होता है बड़े मामा ?” “क्या होगा! सारे चूहे मर जाएँगे, यही होगा।” “और अगर कोई आदमी ऐसे लड़ खा ले?” “एक आध अगर खा ले तो शायद न मरे…मगर गले में जलन होगी, चक्कर आने लगेंगे, उल्टी होने लगेगी, शायद हाथ-पैरों में ऐंठन भी होने लगे “और अगर वह एक साथ ग्यारह लड्डू खा ले ?

कहते हुए हरिपद ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। यह देखकर बड़े मामा किसी तरह अपनी हँसी दबाकर बड़ी गम्भीरता से बोले, “यह क्या कह रहा है। क्या तूने खाये हैं?” हरिषद ने रोते हुए कहा, “हाँ बड़े मामा, उनमें पाँच तो काफी बड़े लड़ थे। तुम जल्दी डॉक्टर बुलाओ बड़े मामा, मुझे जाने कैसी हरारत लग रही है और उल्टी भी हो रही है।”

मँझले मामा झटपट जाकर अपने दोस्त रमेश डॉक्टर को पड़ोस से बुला जाए। उन्होंने पहले एक बेहद कड़वी दवा हरिपद को खिलाई। उसके बाद उसे न जाने क्या सूँघने को दिया। वह इतनी तेज थी कि बेचारे की दोनों आँखों से खूब पानी निकलने लगा। इसके बाद सभी ने उसे रजाई कम्बल ओढ़ाकर उसे पसीने के मारे बेचैन कर दिया। उसके बाद उसे एक न जाने कैसी दवा पिलाई गयी। वह इतनी बेस्वाद और बदबूदार थी कि उसे पीते ही हरिपद उल्टी करने लगा।

इसके बाद डॉक्टर साहब जाते-जाते उसके पथ्य के बारे में बता गये, “तीन दिन तक वह चुपचाप बिस्तर पर लेटा रहे चिरेता का पानी और साबूदाना छोड़कर उसे कुछ न दिया जाए ।” हरिपद ने कहा, “मैं ऊपर माँ के पास जाऊँगा?” डॉक्टर ने कहा, “नहीं, जब तक बचने की उम्मीद है, तब तक जरा भी हिलना-डुलना मना है। वह यहीं पर आप लोगों के पास ही रहे।” बड़े मामा ने कहा, “हाँ हाँ, माँ के पास जाओगे या और कुछ! माँ को चिन्तित करके क्या लाभ? उन्हें इस वक्त ख़बर देने की कोई जरूरत नहीं है।

तीन दिन बाद जब उसे रिहाई मिली, तब वह पहलेवाला हरिपद नहीं रह गया था। वह एकदम बदल गया था। उसके घर के सभी लोगों को तो यही पता था कि हरिपद बेहद बीमार हो गया था। उसकी माँ से भी यही कहा गया था कि ज़्यादा लड्डू खाने से उसका पेट खराब हो गया था। हरिपद समझ रहा था कि ज़हर खाकर मरने से वह बाल-बाल बच गया था। लेकिन असली बात तो हरिपद के बड़े और मंझले मामा तथा रमेश डॉक्टर को ही पता थी और अब इस कहानी को पढ़कर तुम सब भी जान चुके हो।

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एक साल का राजा | Ek Sal Ka Raja Story In Hindi

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Ek Sal Ka Raja Story In Hindi

Ek Sal Ka Raja Story In Hindi- एक था सौदागर, जिसके एक मामूली गुलाम ने उसके इकलौते बेटे को डूबने से बचाया था। सौदागर ने खुश होकर उसे आजाद तो किया ही, इसके अलावा जहाज़ भरकर व्यापार की विभिन्न चीजें बख़्शीश में देकर कहा, “समुद्र पार करके विदेश जाओ, इन सामानों को बेचकर जो तुम कमाओगे, वह तुम्हारा होगा।” वह गुलाम अपने मालिक से विदा लेकर जहाज़ से व्यापार करने रवाना हो गया।

मगर व्यापार करना सम्भव नहीं हुआ। बीच समुद्र में उठे भयंकर तूफ़ान ने जहाज को चकनाचूर करके उसमें लदे माल और लोगों को इस तरह डुबो दिया कि किसी का कुछ पता ही नहीं चला। वह गुलाम बड़े कष्टों से डूबता उतराता आखिरकार एक द्वीप पर पहुँचा। तट पर पहुँचकर उसने चारों तरफ़ नज़र फेरी तो उसके जहाज़ का कोई चिह्न भी उसे नज़र नहीं आया।

Ek Sal Ka Raja Story In Hindi

न उसका कोई आदमी ही दिखाई पड़ा। तब वह हताश होकर समुद्र किनारे की रेत पर बैठ गया। जब शाम हो गयी, तब वह उठकर द्वीप के भीतर की ओर चल पड़ा। वहाँ पहले उसे खूब बड़े-बड़े पेड़ों का जंगल मिला, फिर काफ़ी बड़ा मैदान और उसके ठीक बीचोंबीच एक खूबसूरत शहर नज़र आया। शहर के फाटक से हाथों में मशाल लिये काफ़ी लोग बाहर आ रहे थे।

उसे देखते ही वे सभी चीखने लगे, “महाराज का शुभागमन हो। महाराज दीर्घजीवी हों।” इसके बाद सब उसकी ख़ातिर करके आँखों को चौंधियानेवाली गाड़ी में उसे बिठाकर एक बहुत बड़े महल में ले गये। वहाँ के नौकरों ने फटाफट राजकीय वस्त्र लाकर उसे सज्जित कर दिया।

सभी लोग उसे ‘महाराज’ कहकर ही सम्बोधित कर रहे थे। उसका हुक्म पाते ही झटपट वह काम कर देते। यह सब देखकर तो वह बेचारा हैरान रह गया। उसे लगा यह शायद कोई सपना है या उसका दिमाग़ ख़राब हो गया है, जिससे ऐसा लग रहा है। लेकिन धीरे-धीरे उसकी समझ में आ गया कि वह जगा हुआ ही है और पूरी तरह होश में है, और जो कुछ घट रहा है वह सब सत्य ही है। तब उसने लोगों से कहा, “यह क्या माजरा है, जरा मुझे बताओ तो! मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।

तुम लोग आखिर क्यों मुझे महाराज कह रहे हो और क्यों ऐसा सम्मान जता रहे हो?” तब उनमें से एक ने उठकर कहा, “महाराज, हम लोग मनुष्य नहीं हैं। हम सभी प्रेत-गन्धर्व हैं, हालाँकि हम देखने में ठीक मनुष्यों जैसे ही हैं। काफ़ी दिन पहले हम सभी लोगों ने ‘मनुष्य राजा’ पाने के लिए प्रार्थना की थी, क्योंकि मनुष्यों से बढ़कर बुद्धिमान और कौन हो सकता है ! तब से लेकर आज तक हमें मनुष्य राजाओं की कमी नहीं हुई। हर साल एक मनुष्य ही आता है और उसे हम लोग सालभर के लिए राजा बना देते हैं। उसका राजकाज सिर्फ़ सालभर के लिए ही होता है। साल ख़त्म होते ही, उसे सब कुछ छोड़ना पड़ता है।

उसे जहाज़ से एक रेगिस्तानी देश में पहुँचा आते हैं, जहाँ थोड़े बहुत फलों को छोड़कर और कुछ नहीं पैदा होता और दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करके रेत न खोदने पर एक लोटा पानी भी नहीं मिलता। इसके बाद फिर नया राजा आता है… इसी तरह साल-दर-साल हम लोगों का काम चल रहा है।

यह सुनकर गुलाम राजा ने कहा, “अच्छा, जरा बताओ, इसके पहले के तुम्हारे राजाओं का स्वभाव कैसा था?” बड़े ने कहा, “वे सभी लापरवाह और झक्की थे। वे सभी मौज-मस्ती और विलासिता में पूरा साल बिता देते थे। साल के अन्त में क्या होगा, इसका उन्हें ध्यान ही नहीं रहता था।

नये राजा ने बड़े ध्यान से सब कुछ सुना। साल के अन्त में उसका क्या होगा, यह सोचकर उसे कई दिनों तक नींद नहीं आयी। इसके बाद उस देश के सर्वाधिक ज्ञानी और पण्डितों को बुलवाया गया। राजा ने उनसे विनयपूर्वक कहा, “आप लोग मुझे उपदेश दीजिए, जिससे साल के अन्त में उस सर्वनाशी दिन के लिए मैं खुद को तैयार कर सकूँ।” तब, उनमें जो सबसे ज़्यादा वृद्ध था, उसने कहा, “महाराज आप खाली हाथ आये थे, खाली हाथ ही फिर आपको उस देश में जाना पड़ेगा…लेकिन इस एक साल में आप हमसे जो भी चाहे काम करवा सकते हैं।

मेरा सुझाव है, आप इस समय इस राज्य के उस्ताद लोगों को उस देश में भेजकर वहाँ घर-बार बनवाकर, खेती-बाड़ी की व्यवस्था करके चारों तरफ़ मनोरम वातावरण बनवा लें। तब तक फल-फूल से वह देश भर जाएगा। वहाँ लोगों का आना-जाना शुरू हो जाएगा। तब यहाँ का राजपाट ख़त्म होने के बाद आप वहाँ जाकर सुख से वहाँ का राजपाट भोग सकेंगे। साल तो देखते-देखते बीत जाएगा, मगर अब आपको काफ़ी काम करवाना है। इसलिए मेरी राय है कि इस वक़्त आराम न करके अपना भविष्य बना लीजिए।

राजा ने तभी हुक्म देकर लोग लश्कर, मास-अरवाब, वृक्षों के पौधे, फलों के बीज तथा भारी-भारी कल-पुर्जे भेजकर पहले से ही उस रेगिस्तान को सुसज्जित करवा दिया। उसके बाद साल जब ख़त्म होने को आया, तब वहाँ की प्रजा ने उसका छत्र राजमुकुट, राजदण्ड आदि सब वापस ले लिया।

उसकी राजसी पोशाक उतरवाकर सालभर पहले के वही मामूली कपड़े पहनाकर उसे जहाज में चढ़ाकर उस रेगिस्तानी देश में भेज दिया। लेकिन अब वहाँ रेगिस्तान कहाँ था? चारों तरफ़ घर-बार, राह-घाट, ताल और बगीचे नजर आ रहे थे। वहाँ अब काफ़ी आबादी भी बस गयी थी। वहाँ के लोगों ने बड़े उत्साह से शंख-घण्टा बजाकर उसकी अगवानी करके उसे ले जाकर सिंहासन पर बिठा दिया। एक साल के राजा ने वहाँ जीवनभर के लिए राजसुख भोगना शुरू कर दिया।

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मेंढक राजा | Mendhak Raja Story In Hindi

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Mendhak Raja Story In Hindi

Mendhak Raja Story In Hindi- राजमहल में जाने का जो रास्ता था, उसी रास्ते के किनारे बहुत बड़ी दीवार थी, उस दीवार के एक तरफ मेंढकों का तालाब था सोना मेंढक, मोटा मेंढक, गाछी मेंढक, मैदानी मेंढक-सभी का घर उसी तालाब के किनारे था। मेंढकों का सरदार जो बूढ़ा मेंढक था, वह दीवार के किनारे पर पुराने वृक्ष की दरार में रहता था, जो सुबह होते ही सभी को आवाज देकर जगाता था-“आ-आ-आ गेंक-गेंक-गेंक-देख-देख-देख – बेंगू-बेंगू-बेंगू-बेंगाची।

यह कहकर वह घमण्ड से गाल फुलाकर पानी में कूद पड़ता और तभी सारे मेंढक ‘आया आया आया थाक् थाक्-थाक’ कहकर नींद से 1 उठकर, मुँह धोकर, दाँत माँजकर तालाब के किनारे की सभा में बैठ जाते थे। एक दिन क्या हुआ कि सरदार मेंढक मारे फूर्ती के ऐसा उछला कि एकदम दीवार लाँचकर राजपथ के ठीक बीच में जाकर गिरा। राजा उस वक्त सभा की ओर प्रस्थान कर रहे थे।

Mendhak Raja Story In Hindi

उनके साथ सिपाही सन्तरी लाव-लश्कर, दल-बल सभी चले रहे थे। सभी के पैरों में मोटे-मोटे नागरा जूते थे वे सभी खट-खट, मच-मच, घेंच-बेंच करके कभी उसके अगल-बगल, दाएँ-बाएँ आगे-पीछे इस तरह से गुजर रहे थे कि बूढ़े मेंढक को लगा कि अब वह बचनेवाला नहीं। अचानक उसे न जाने कहाँ से किसी की लाठी या छाता या धक्का धाँय से लगा कि वह दर्द से दोहरा होकर रास्ते के किनारे पास पर चित्त होकर गिरा।

बूढ़े मेंढक को काफी चोट लगी थी, मगर उसके हाथ-पैर टूटे नहीं थे वह धीरे-धीरे उठकर बैठ गया, फिर चारों तरफ़ ताककर दीवार में बनी एक सूराख देखकर झटपट उसमें घुस गया। वहाँ से बड़ी सावधानी से गर्दन निकालकर उसने देखा, सिर पर मुकुट और रंगीन पोशाक पहने राजा, रोशनी से दमकते चार कहारों की पालकी में बैठकर राजसभा की ओर जा रहे थे।

सभी ‘लोग ‘राजा-राजा’ कहकर उन्हें प्रणाम कर रहे थे, नाच-गा रहे थे और आगे-पीछे दौड़ रहे थे। उसे लगा राजा एकबार उसकी ओर देखकर फिक् से हँसे भी। बूढ़े मेंढक ने तभी दुःख से गहरी साँस सेकर सोचा, काश हमारा भी कोई राजा होता। इसके बाद जब घूमते-भटकते रास्ता तलाशते हुए वह वापस घर लौटा, तब शाम ढलने लगी थी।

उसे देखकर सभी पूछने लगे, “बड़े सरदार, बूढ़े सरदार तुम दिनभर कहीं रहे? हम लोगों ने तुम्हें कितना पुकारा, कितना ढूंढा मगर तुमने जवाब तक नहीं दिया।” सरदार ने कहा, “चुप चुप चुप रहो। मैं राजा देखने चला गया था।” यह सुनकर सभी मेंढक एक साथ चिल्लाने लगे, “यह राजा कौन है भैया?

यह राजा कौन बूढ़ा मेंढक तब गाल फुलाकर, छाती फुलाकर दोनों आँखें बन्द करके दोनों हाथ उठाकर उछलता हुआ बोला, “राजा इत्ता बड़ा और ऊँचा होता है। बेहद गोरा तथा चमकदार प्रकाश की तरह… और उसे देखते ही सभी मिलकर उसे पुकारते हैं-राजा, राजा, राजा!

यह सुनकर सभी मेंढक कहने लगे, “काश हम लोगों का भी कोई राजा होता!” उनका कोई राजा नहीं था यह सोचते-सोचते उनकी आँख से झर-झर आँसू बहने लगे। बूढ़े मेंढक ने कहा, “मेरे भाई, आओ हम सभी राजा के लिए अर्जी दें।” तभी सब मिलकर गोलाई में बैठकर, आसमान की ओर देखते हुए विभिन्न स्वरों में पुकारने लगे, “राजा, राजा, राजा, राजा राजा, राजा, राजा, राजा-हमें राजा चाहिए, राजा चाहिए, राजा चाहिए, राजा चाहिए।” मेंढक, तालाब के मेंढक देवता, जो बादलोंवाले दिन वर्षा मेघों को झकझोर कर तालाब में पानी उड़ेलते हैं उस वक़्त वे आसमान तले चादर ओढ़कर सो रहे थे।

अचानक मेंढकों की चीख-पुकार से उनकी नींद टूट गयी। उन्होंने चारों तरफ देखते हुए कहा, “इस वक़्त न पानी बरस रहा है, न आसमान में बादल आये हैं, न उनका कहीं कोई चिह्न नजर आ रहा है। बच्चो, तुम सब इतना चिल्ला क्यों रहे हो?” मेंढक बोले, “हमारा कोई राजा नहीं है। हमें राजा चाहिए।

देवता ने कहा, “यह ले राजा!” यह कहकर उन्होंने एक सूखे पेड़ की डाल को तोड़कर उनके सामने फेंक दिया। टूटी डाल तालाब के किनारे टेक लगाकर खड़ी रही उसके सिर पर काफी बड़े-बड़े कुकुरमुत्ते चाँदनी में चमक रहे थे। यह देखकर मेंढकों के उत्साह के क्या कहने! उसके चारों तरफ़ -गोलाई में बैठकर वे मौज में आकर गाने लगे, “राजा, राजा, राजा, राजा-राजा, राजा, राजा, राजा!”

इस तरह दो दिन बीते, दस दिन बीते, आखिरकार एक दिन मेंढक सरदार की पत्नी बोली, “यह कोई राजा है। मेरे पति ने उस दिन जो राजा देखा था, वह इससे बहुत अच्छा था यह राजा न तो हिलता डुलता है, न देखता है, न सुनता है… यह राजा नहीं, खाक है।

तब फिर बूढ़ा मेंढक पेड़ पर चढ़कर बोला, “मेरे भाई लोग, आओ हम सभी निवेदन करें कि हमें एक बढ़िया राजा चाहिए।” सभी मेंढक फिर से गोलाई में बैठकर आसमान की ओर देखते हुए विभिन्न स्वर में पुकारने लगे, “राजा चाहिए, राजा चाहिए… बढ़िया राजा नया राजा यह सुनकर मेंढक देवता जागकर बोले, “अब क्या बात है? अभी तो उस दिन तुम लोगों को राजा दिया, इस बीच अचानक क्या नयी बात हो गयी?

मेंढकों ने कहा, “यह राजा नहीं, खाक है। यह राजा बदसूरत है। यह न हिलता है, न डुलता है-ऐसा राजा नहीं चाहिए, नहीं चाहिए, नहीं चाहिए, नहीं चाहिए।” मेंढक देवता बोले, “अब शोर बन्द करो नया राजा दे रहा हूँ।” यह कहकर एक बगुले को तालाब के किनारे खड़ा करके कहा, “यह लो अपना नया राजा!

यह देखकर सारे मेंढक चकित होकर कहने लगे, “बाप रे बाप कितना बड़ा राजा है फैसा चमकदार गोरा चिट्टा है बढ़िया राजा सुन्दर राजा राजा, राजा, राजा राजा!” बगुले को उस वक्त भूख नहीं थी, मछली खाकर उसका पेट भरा हुआ था। इसलिए उसने कुछ नहीं कहा, सिर्फ़ अपनी आँखें मिचमिचाकर एक बार इधर देखा, एक बार उधर देखा, इसके बाद एक टाँग उठाकर चुपचाप खड़ा हो गया।

यह देखकर सारे मेंढक और ज़्यादा उत्साहित हो गये, ये दिल खोलकर, गला फाड़कर गाने लगे। इस तरह सुबह बीती, दोपहर बीती शाम बीती, साँझ भी ढल गयी…. इसके बाद चारों तरफ़ रात का अँधेरा छा गया। तब जाकर कहीं मेंढकों का गाना थमा। उसके दूसरे दिन सुबह-सुबह उठाकर जैसे ही उन्होंने गाना शुरू किया कि तभी बगुला राजा ने आकर एक मोटे-ताजे मेंढक को अपनी चोंच में लेकर टप्प से निगल लिया।

यह देखकर सभी मेंढक अचानक बेहद घबरा गये। राजा की स्तुति में जो गाना वह गा रहे थे, वह आवाज एकदम धीमी हो गयी। बगुला राजा मेंढक का जलपान करके एक टाँग उठाकर ध्यान की मुद्रा में खड़ा हो गया। इसी तरह सुबह-शाम एक-एक भेंटक बगुला राजा के पेट में जाने लगा। मेंढकों की दुनिया में हाहाकार मच गया। सारे मेंढक सभा करके बोले, “यह बड़े अन्याय की बात है। राजा को समझाकर कहने की जरूरत है।

आखिर वह हमारा राजा है, अगर वही ऐसा करेगा तो हम कहाँ जाएँगे? मगर उसे समझाए कौन?” मेंढक सरदार की पत्नी बोली, “इसके लिए इतना सोचने की क्या जरूरत है? इसमें परेशानी क्या है? में ही जाकर उससे कहे देती हूँ। “सरदार की पत्नी बगुला राजा के पैरों के पास जमकर बैठ गयी, फिर हाथ-मुँह हिलाकर तेज आवाज़ में बोली, “ऐ राजा, तेरा भाग्य अच्छा है कि तू हम लोगों का राजा बना।

तेरी आँखें अच्छी हैं, चेहरा अच्छा है, रंग अच्छा है, तेरी एक टांग भी अच्छी है, दोनों टाँगें भी अच्छी हैं। बस एक ही बात अच्छी नहीं है कि तु हमें खाता क्यों है? सोधें हैं उन्हें खा, कीड़े-मकोड़े, तितलियाँ इन्हें तू भी खा सकता है। राजा होकर हमें ही खाना चाहता है? छिः छिः छिः छिः- राम राम राम राम-अब ऐसा कभी मत करना।

बगुले ने देखा, उसके टाँगों के पास ही एक मोटा-ताजा मेढक बैठा है। कितना मुलायम गोल-गोल चेहरा भी है। यह सोचते ही टप्प से बगुले राजा की लार टपक गयी और खप् से सरदार पत्नी उसके मुँह में जाकर गायब हो गयी। यह देखकर मेंढकों की बोली बन्द हो गयी। सभी एकाएक चुप होकर एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। फिर मेंढक सरदार रूमाल से अपनी आँखें पोंछकर बोला, “पाजी राजा! हतभागा दुष्ट राजा!”

यह सुनकर सभी मेंढक बड़ी जोर से चीखने लगे, “पाजी राजा दुष्ट राजा! नहीं चाहिए, नहीं चाहिए, नहीं चाहिए, ऐसा राजा नहीं चाहिए, राजा नहीं चाहिए।” मेंढक देवता की नींद खुल गयी ये बोले, “अरे नासपीटो, अब क्या हुआ?” 1 मेंढकों ने कहा, “बाप रे बाप बाप रे बाप कितना दुष्ट राजा है।

इसे ले जाओ, ले जाओ, ले जाओ। “तब मेंढक देवता के ‘हुश्श’ कहकर उसे भगाते ही वह पंख फैलाकर उड़ गया। उड़ गया। मेंढक अपने-अपने घरों में जाकर कहने लगे, “बैंक बैंक क-बाप बाप बापछी छीः छी:-अब कभी राजा पाने का नाम भी नहीं लेंगे।

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बुद्धिमान शिष्य | Budhhiman Shishya Story In Hindi

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Budhhiman Shishya Story In Hindi

Budhhiman Shishya Story In Hindi- एक सन्त थे। उनके अनेक शिष्य थे। सन्त ने अपने पिता के श्राद्ध पर विराट यज्ञ का आयोजन किया। पैसा यज्ञ सन्त के आश्रम में पहले नहीं हुआ था। इसीलिए उन्होंने शिष्यों को बुलाकर कहा, “मैं एक यज्ञ का आयोजन कर रहा हूँ। वैसा यज्ञ शायद तुम लोगों को फिर कभी कहीं देखने को नहीं मिले, इसलिए यज्ञ का सारा काम-धाम, विधि-विधान खूब ध्यान से देखना। अपनी आँखों से अच्छी तरह देखे बिना सिर्फ पोथियों के सहारे इस यज्ञ को करना सम्भव नहीं है।

Budhhiman Shishya Story In Hindi

सन्त के आश्रम में बिल्लियों का बड़ा उत्पात रहता था। यज्ञ की तैयारियों के बीच बिल्लियों ने अपनी हरकतों से नाक में दम कर दिया। कभी वे जूठा कर देती थीं, कभी कोई बर्तन उलट देती थीं। उन्हें संभालना मुश्किल हो गया। तब सन्त महाराज ने क्रोधित होकर कहा, “इन बिल्लियों को पकड़कर इस कोने में बाँध दो।” यह सुनते ही सभी नौ बिल्लियों को सभा की एक तरफ़ खूंटियों से बाँध दिया गया।

इसके बाद सही मुहूर्त निकालकर यज्ञ प्रारम्भ हुआ। सभी शिष्य यज्ञ सभा की साज-सज्जा, आयोजन, यज्ञ के विधि-विधान मन्त्रोच्चारण के नियम मन लगाकर देखने और सुनने लगे। बिना किसी बाधा के बहुत सुन्दर ढंग से सन्त महाराज का यज्ञ सम्पन्न हो गया। कुछ समय बाद उन शिष्यों में से एक के पिता का देहान्त हो गया।

उस शिष्य के मन में विचार आया कि वह भी अपने पिता के श्राद्ध में ठीक ऐसे ही यज्ञ का आयोजन करे। उसने अपने गुरु से निवेदन किया। वे बोले, “ठीक है, तुम सारा आयोजन करो, मैं यज्ञ का पुरोहित बनने आ जाऊँगा।” शिष्य बेहद सन्तुष्ट होकर यज्ञ की तैयारियों में जुट गये।

फिर यज्ञ का दिन भी आ गया। सन्त महाराज अपने शिष्यों के साथ श्राद्ध सभा में उपस्थित हो गये। लेकिन उस शिष्य को उस वक्त भी यज्ञ स्थल में बैठने की फुर्सत नहीं थी। यह बड़ी व्यस्तता से इधर-उधर घूम रहा था। इधर यज्ञ का समय बिलकुल सिर पर आ गया। सन्त महाराज चिन्तित होने लगे।

उन्होंने उस शिष्य को बुलाकर पूछा, “अब देर किस बात की है? सारी चीजें तैयार हैं, यज्ञ का समय भी हो चला है, अब तुम आकर इस सभा में बैठो।” शिष्य ने कहा, “एक आयोजन अभी रह गया है, उसी के कारण बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूँ। सन्त ने पूछा, “कहाँ, किसी चीज की कमी तो मैं देख नहीं रहा हूँ।” शिष्य बोला, “जी, अभी चार विल्लियों का जुगाड़ नहीं हो पाया है।

“सन्त ने कहा, “में समझा नहीं।” शिष्य ने घबराई हुई आवाज़ में कहा, “मैंने आपके यज्ञ में ईशान कोण में नौ बिल्लियाँ बँधी देखी थीं। हमारे इस गाँव में काफी ढूँढने पर भी पाँच से ज़्यादा बिल्लियाँ नहीं मिलीं। इसलिए बाकी चार बिल्लियों की तलाश में पास के गाँव में लोग गये हैं। वे अभी आते ही होंगे।

शिष्य की इस बात पर सन्त महाराज बड़े चकित हुए। उन्होंने कहा, “हे बुद्धिमान शिष्य, कौन-सी वस्तु यज्ञ के लिए जरूरी है और कौन-सी नहीं, इसे भी विचार करना नहीं सीखा? आश्रम में बिल्लियों के उत्पात के कारण मैंने उन्हें बाँध रखा था। तुम्हारे यहाँ तो कोई उत्पात नहीं है तो फिर जानबूझकर आफ़त क्यों मोल ले रहे हो? अब झटपट यहाँ बैठ जाओ। यहाँ बिल्लियों की कोई ज़रूरत नहीं है। अब यज्ञ-कार्य बिना किसी बाधा के सम्पन्न हो जाए।” शिष्य अपनी मूर्खता पर लज्जित होकर सिर झुकाकर सभा में बैठ गया।

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मुर्ख बुढ़िया | Murkh Budhiya Story In Hindi

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Murkh Budhiya Story In Hindi

Murkh Budhiya Story In Hindi- एक बूढ़ा था और एक बुढ़िया थी। ये बेहद ग़रीब थे। बुढ़िया बहुत मूर्ख थी। मगर बातें बहुत करती थी। वह कहीं भी किसी से बात करने लगती थी। उसके पेट में कोई बात नहीं पचती थी। बूढ़े को एक दिन खेत जोतते वक्त जमीन के नीचे एक गगरी मिली, जो रुपयों और मोहरों से भरी थीं।

यह देखकर उसे बेहद चिन्ता हुई कि अगर वह इसे यहीं रख जाएगा तो कोई चुरा ले जाएगा और अगर घर ले जाए तो बुढ़िया को पता चल जाएगा और वह सबको बता आएगी। फिर यह बात फैल जाने के बाद राजा का कोतवाल आकर सब कुछ छीन लेगा। सोचते-सोचते उसकी समझ में एक तरीक़ा आया। उसने तय किया कि वह बुढ़िया से सच बात कहेगा। मगर कुछ इस तरह से कि लोग उसकी बातों पर यकीन न करें।

Murkh Budhiya Story In Hindi

वह एक मछली खरीद लाया ओर उसे खेत के किनारे पर पेड़ के ऊपर बाँध दिया और एक खरगोश लाकर नदी के किनारे एक गड्ढे में जाल से लपेट दिया। इसके बाद उसने जाकर अपनी पत्नी से कहा, “एक बड़े आश्चर्य की ख़बर मैंने सुनी कि पेड़ की डाल पर मछलियाँ उड़ती हैं और खरगोश पानी में तैरते हैं।

हमारे ज्योतिषी महाराज कहते हैं मछली बैठी पेड़ पर नाचे खरहा पानी में। छिपा खजाना चाहो पाना खोदो उसके पास में ॥ “बुढ़िया बोली, “तुम भी कैसी बातें करते हो ? चूहे ने कहा, “वाकई ऐसा देखने में आया है।” यह कहकर बूढ़ा काम पर निकल गया।

आधा घण्टा बीतते-बीतते ही चूड़े ने दुबारा लौटकर हड़बड़ाते हुए बुढ़िया से धन प्राप्त होने की बात कही। ये दोनों मिलकर उसे लाने के लिए निकले। रास्ते में चलते-चलते बूढ़े ने उस पेड़ के नीचे आकर कहा, “ज़रा देखो तो पेड़ पर वह क्या चीज चमक रही है?” यह कहकर उसने जैसे ही एक ढेला फेंककर मारा वह मछली ज़मीन पर गिर पड़ी।

बुढ़िया हैरान रह गयी। तब बड़े ने कहा, “मैंने नदी में जाल फेंका था, जरा देख आऊँ उसमें कोई मछली फँसी या नहीं।” फिर वहाँ जाकर जात खींचते-खींचते वह बोला, “अरे बाप रे, इसमें तो खरगोश फँसा है।” बुड़े ने आगे पूछा, “क्यों अब भी तुम्हें ज्योतिषी महाराज की बात पर विश्वास नहीं हुआ?

इसके बाद वे लोग धन से भरी उस गगरी को घर ले आये। धन पाते ही बुढ़िया बोली, “मैं इससे मकान बनवाऊँगी, गहने गढ़वाऊँगी, कपड़े खरीदूंगी। “बूढ़े ने कहा, “उतावली मत हो। कुछ दिन इन्तजार करो। फिर एक-एक करके सभी कुछ हो जाएगा। अचानक सब कुछ एक साथ करने पर लोगों की सन्देह होगा।

लेकिन बुढ़िया चुप कहाँ बैठनेवाली थी। वह हर मिलनेवाले को यही बात बताने लगी। किसी ने कोतवाल तक यह सूचना पहुँचा दी। कोतवाल के आदेश से बड़े को हथकड़ी लगाकर उसके सामने पेश किया गया। बूढ़े ने सब कुछ सुनकर कहा, “यह क्या कह रहे हैं हुजूर मेरी औरत का दिमाग ठीक नहीं रहता। वह ऐसी न जाने क्या- क्या बकवास करती रहती है।

यह सुनकर कोतवाल ने डाँटते हुए कहा, “झूठे कहीं के, तूने धन पाकर उसे छिपा दिया है और अपनी औरत की शिकायत करता है?” बूढ़े ने कहा, “कैसा धन? मुझे मिला कब? कहाँ से मिला? मुझे तो कुछ भी नहीं पता।” बुढ़िया बोली, “अच्छा, तो क्या तुम्हें कुछ भी नहीं पता? अरे उस दिन, जब पेड़ की डाल पर मछली बैठी थी, नदी में जाल डालकर तुमने खरगोश पकड़ा था, क्या उस दिन की बात तुम्हे याद नहीं? वाह रे नादान !

उसकी बात सुनकर सभी हँस पड़े। कोतवाल बिगड़कर बुढ़िया से बोला, “जा पगली, घर जा! अगर फिर कभी ऐसी बेहूदी बातें कीं तो तुझे मैं क़ैद में डाल दूँगा।” बुढ़िया चुपचाप घर लौट आयी। कोतवाल के डर से उसने फिर कभी किसी को धन की बात नहीं बताई।

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गुड़िया की दावत | Gudiya Ki Dawat Story In Hindi

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Gudiya Ki Dawat Story In Hindi a

Gudiya Ki Dawat Story In Hindi- गुड़िया की माँ खुकी आज बेहद व्यस्त थी। आज छोटी गुड़िया का जन्मदिन था, इसलिए दावत की धूमधाम थी। छोटी-सी मेज़ पर छोटी-छोटे थालियाँ और कटोरियाँ सजाकर, उसमें बड़े सुन्दर ढंग से भोजन तैयार करके रखा हुआ था। चारों तरफ़ सचमुच की छोटी-छोटी कुर्सियाँ गुड़ियों के खाने के लिए सजाकर रखी हुई थीं।

खुकी के छोटे भैया की उम्र साढ़े चार साल की थी, इसीलिए उसका कहना था, “भला खिलौने की गुड़िया खा सकती है? उसका जन्मदिन क्या मनाना मगर खुकी भला कैसे मानती ! वह बोली, “खिलौने सब कुछ कर सकते हैं। यह किसने कह दिया कि वे कुछ नहीं कर सकते? यह भी किसने कहा कि वे कभी बात नहीं करते?

Gudiya Ki Dawat Story In Hindi a

कभी भी नहीं खाते, जब छोटा गुड्स बीमार पड़ा था, तब क्या वह ‘माँ-माँ’ करके नहीं रोता था? जरूर रोता था ऐसा न होता तो मुझे कैसे पता चलता कि वह बीमार थी?” खुकी के छोटे भैया से इन सवालों का जवाब देते नहीं बना। इसलिए वह ‘बेवकूफ़ लड़की’ कहकर मुंह चिढ़ाकर चला गया।

खुकी अपनी माँ से शिकायत करने गई। माँ सुनकर बोली, “हर समय क्या सभी के सामने खिलीने जिन्दा होते हैं? जिस दिन खिलौने की गुड़िया तुझे सचमुच खाते हुए दिखाई दे, उस दिन तू अपने छोटे भैया को बुलाकर दिखा देना। खुकी ने कहा, “अगर आज वे जागकर खाना खा लें तो कितना मजा आएगा।

मुझे लगता है, जब रात में हम लोग सो जाते हैं, तब उनका दिन शुरू होता है। अगर ऐसा न होता तो हम लोगों की अब तक नज़र आ गया होता। उस दिन वह टीन का शैतान गुड्डा जब खाट से गिर गया था तब, वह ज़रूर रात में उठकर मारपीट कर रहा होगा। ऐसा न होता तो वह खाट से कैसे गिरता? आज से मैं सोते समय पूरी तरह से चौकन्नी रहूंगी।

गुड़िया के जन्मदिन का खाना बड़ा शानदार बना था। मैदे की मिठाई, मैदे का पीठा, नारियल के छोटे-छोटे लड्डू और गुड़ की छोटी-छोटी टिकलियाँ ऐसी ही सब आश्चर्यजनक चीजें थीं। रात में सोते वक़्त खुकी अपने खिलौनों को झाड़-पोंछकर नहता-धुलाकर उन्हें सुलाने के पहले वोली, “यह देख, यहाँ सारा खाना सजाकर रखा हुआ है, रात में उठकर खा लेना।

कौन खिलौना कहाँ बैठेगा, किसके बाद क्या खाना है, झगड़ा करने पर किसे क्या दंड मिलेगा, यह सब कहने के बाद उस पाजी गुड्डे को डांटकर फिर छोटी गुड़िया को उसके जन्मदिन के कारण काफी प्यार करके वह सोने चली गई। आँखें मूँदते ही उसे नींद आ गई।

जैसे ही खुकी सोई, तभी कमरे में न जाने किनके पैरों की टिप टिप आहट सुनाई पड़ी। उनमें से एक खुकीमणि के जूतों के पास कमरे के कोने में रखी-तस्वीरों की किताबों के पास, खिलौनों की चद्दर से ढँके खाट के पास घूमने-फिरने लगा, कभी वह इसे सूँघ रहा था। तो कभी उसे, फिर कुटुर-कुटुर करके कुछ चीजों को काटने भी लगता। उसने ‘वर्ण परिचय’ पुस्तक थोड़ी-सी खाकर देखी, उसका स्वाद अच्छा नहीं लगा।

जूते का फीता चबाकर देखा, उसमें जरा भी रस नहीं मिला। टीन के गुड्डे को काट कर देखा, अरे बाप रे, कितना सख्त था तभी अंधेरे में अचानक उसकी मेज पर रखी चीजों पर नजर पड़ी, यह सब क्या है भाई। वह दौड़कर कुर्सियों को उलट कर एक छलांग में मेज़ पर चढ़कर उन्हें जरा-सा सूँघते ही चीख पड़ा, “किच-किच की-च, मतलब अरे जरा इधर आकर देखो।” यह सुनते ही टिप-टिप, टुप-टुप, टाप-टाप, थप करके वैसा ही एक और हाजिर हुआ।

ठीक वैसी ही रोपेंदार राख रंग की देह, वैसी ही पतली लम्बी दुम, बेसी ही तीखी और पलकें झपकाती काली काली आँखें उन दोनों का उत्साह देखने लायक था। वे टपाटप टपाटप खाने लगे और अपनी भाषा में कहने लगे, “इसे खाओ, ज़रा उसे खाओ! यह कितना मीठा है, वह कितना बढ़िया है!” यह कहकर वे देखते-देखते सारा खाना चटकर गए।

सुबह खुकी ने उठकर देखा-अरे, यह तो बड़े आश्चर्य की बात थी। सारा खाना खत्म हो गया था। कब वे सारे खिलौने जागे, कब खाए और कब सोए, उसे बिलकुल पता ही नहीं चला। ‘खा लिया, खा लिया, सारा खाना खा लिया’, कहकर वह ऐसा शोर मचाने लगी कि माँ, पिताजी, छोटे भैया, बड़े भैया सभी यहाँ भागे-भागे चले आए।

वहाँ का हाल देखकर और खुकी की बात सुनकर सभी ने कहा, “अरे हाँ! बड़े आश्चर्य की बात है।” सिर्फ छोटे भैया ने कहा, “बहुत खूब खुद खाकर कह रही है कि गुड़ियों ने खा लिया। बड़े अन्याय की बात है। असली बात सिर्फ माँ और पिताजी जानते थे, क्योंकि उन्हें कमरे के कोने में पूरों के पैरों के नन्हें निशान नज़र आ गए थे। मगर यह बात खुकी से कहने पर भला यह यकीन करती?

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छाते का मालिक | Chate Ka Malik Story In Hindi

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Chate Ka Malik Story In Hindi

Chate Ka Malik Story In Hindi- वे सब कुल डेढ़ बित्ते के ही थे वे सब गाँव, खेत-खलिहान आदि से काफी दूर जंगल के किनारे कुकरमुत्ते जिन्हें वे ‘मेंढक का छाता’ कहते थे, की छोह में रहते थे। बचपन में जब उनके दाँत भी नहीं निकले थे तभी से वे लोग बाबा आदम के जमाने के उस मेंढक के छाते को देखते आए थे। वह किस मेढक का छाता था, इसे कोई नहीं जानता था, मगर सभी उसे ‘मेढक का छाता’ कहते थे।

रात में जिन शरारती लड़कों को नींद नहीं आती थी, उन्हें अपनी माताओं से छाते का गाना सुनकर नींद आ जाती थी फूले गाल मोटा मेंढक पालदार लाला छाता मटिहा मेंढक, झाड़ मेंढक, फटा छाता टूटा छाता । हरा रंग है जबरजंग, जरी का छाता सोना मेंढक, पत्ता टोपी पोपला छाता, छोटा सिर कोना मेंढक ॥ …..इत्ते सारे छाते!

Chate Ka Malik Story In Hindi

मगर आज तक उन्होंने कभी मेंढक नहीं देखा था। वहाँ पर मैदान में घास में हरे रंग के पागल टिड्डे रह-रहकर भुड़क से उन्हें लाँघकर निकाल जाते थे। यहाँ रंग-बिरंगी तितलियाँ थीं, जो काफ़ी देर बैठकर फिर उड़ जाती थीं। वहाँ गिलहरियाँ दिनभर कभी इस पेड़ का नाप लेती थी, कभी उस पेड़ को नापती थीं।

दिनभर वे पेड़ पर चढ़ती-उतरती रहती थीं, फिर धूप में बैठकर हिसाब करती थीं और मूँछों पर ताव देती थीं मगर उनमें से किसी को भी मेंढक के बारे में कोई जानकारी नहीं थी गाँव के बूढ़े-बूढ़ियाँ, नानी-दादी आदि कहती थीं कि आज भी वह मेंढक जिन्दा है और वह अपने छाते की बात भूला नहीं है।

जब आसमान में बादल उमड़ते-घुमड़ते हैं, वन जंगल में लोग नहीं आते हैं, तब वह मेंढक अपने छाते के नीचे बैठकर बादलों से बहस करता है। जब निस्तब्ध रात में सभी सो जाते हैं, किसी के देखने का डर नहीं रहता, तब मेंढक आकर अपने छाते के नीचे पैर फैलाए बैठकर, सीना फुलाकर संगीत छेड़ता है-‘देख देख देख जरा-सा देख’ लेकिन जिस दिन शरारती लड़के पानी में भींगते हुए उसे देखने गए, उनमें से किसी को भी वह मेंढक नजर नहीं आया और जब उस वार रात के सन्नाटे में वे बड़ी आशा से उसकी तान सुनने के लिए कान लगाए बैठे थे, तब उन्हें किसी के गाने की आवाज सुनाई नहीं पड़ी।

मगर जब छाता मौजूद था, तब मेंढक अगर आएगा नहीं तो जाएगा कहाँ? एक न एक दिन तो उसे आना ही है। जब वह पूछेगा, “मेरा छाता कहाँ है?” तब वे लोग कहेंगे, “यह तुम्हारे बाबा आदम के जमाने का नया छाता रहा-से जाओ हम लोगों ने इसे न तोड़ा है, न फाड़ा है, न बिगाड़ा है, न गन्दा किया है, सिर्फ इसके नीचे बैठकर बातें की हैं।” मगर न मेंढक आता है, न उसका छाता हटता है, न उसकी छाया हिलती है और न बातें ख़त्म होती है।

इसी तरह दिन बीतते रहे, साल बीतता रहा। अचानक एक दिन सुबह पूरे गाँव में शोर मच गया, “मेंढक आ गया, मेंढक आ गया, अपना छाता लेने मेढक आ गया। “मगर यह कहाँ था? उसे किसने देखा? जंगल के किनारे छाते के नीचे लालू ने देखा है, कालू ने देखा है, चाँदा-भोंदा सभी ने देखा है। मेंढक वहाँ क्या कर रहा है? वह देखने में कैसा है? लालू ने कहा, “ईंटों जैसा लाल रंग है जैसे हल्दी में घुली चूने की डली, एक आँख बन्द एक आँख खुली।

कालू ने कहा, “राख जैसा उसका फीका रंग, एक आँख खुली एक आँख बन्द । चाँदा बोला, “चटक हरा-जैसे नई कोमल घास, एक आँख खुली, बन्द एक आँख । “भोंदा बोला, “भूसे जैसा रंग-जैसे पुरानी हो इमली, एक आँख बन्द एक आँख खुली। “गाँव के जितने बूढ़े थे, जितने महा-महापंडित थे, सभी ने कहा, “किसी की बात से किसी का मेल नहीं है।

तुम लोगों ने जो देखा है, उसे फिर से कहो।” लालू, कालू, चाँदा, भोंदा सभी ने कहा, “छाते के नीचे, जिन्दा मेढक, चार हाथों और लम्बी दुमवाला।” यह सुनकर सभी ने सिर हिलाकर कहा, “उँ हूँ, उहूँ, यह मेंढक नहीं हो सकता। लगता है मेंढक का बच्चा है। नहीं तो फिर इसकी दुम क्यों है?

खैर कोई बात नहीं, मेंढक का बच्चा तो है-बेटा न हो, पोता होगा या भतीजा होगा या उसका कोई रिश्तेदार तो होगा ही। सभी ने कहा, “चल चल देखने चल, देखने चल।” सभी उधर ही भागे। खेत-खलिहान के पार, जंगल के किनारे, मेंढक के छाते के नीचे कोई बैठकर धूप सेंक रहा था।

उसका रंग जैसे कोई लगे पेड़ के तने जैसा था, उसकी दुम पास पर पड़ी हुई थी, वह एक आँख मूँदे एक आँख खोले देख रहा था। यह देखकर सभी चिल्लाकर बोले, “तुम कौन हो भाई? कस्त्वम्? हू आर यू?” यह सुनकर न उसने बाई ओर देखा न दाई ओर सिर्फ एक बार अपना रंग बदलकर उसने खुली आँख मूँदी और मूँदी आँख खोली और झट से एक हाथ लम्बी जीभ निकालकर उसे तुरन्त समेट लिया।

गाँव के सबसे सम्भ्रान्त बूढ़े ने कहा, “प्रधान भाई, यह तो कोई जवाब ही नहीं देता। बहरा है क्या? “प्रधान बोला, “हो भी सकता है। बूढ़े सरदार ने साहस करके कहा, “चलो भाई, जरा आगे चलें। उसके पास जाकर जोर से “प्रधान बोला, “तुमने ठीक कहा।” शालीन बूढ़े ने कहा, “तुम लोग जाओ! में इस झाड़ी के भाला लेकर छिपकर बैठता हूँ। अगर वह नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगा तो इस माले को भोंक दूँगा।

बूढ़े सरदार ने उस छाते पर चढ़कर उसके कान के पास अचानक बड़ी जोर से पूछा, “कौन है?” अपनी हरकत से वह खुद ही छाते से गिरनेवाला था। उसने अपने को संभाल लिया। उधर उसकी आवाज सुनकर चौंककर वह जानवर थोड़ी देर स्तब्ध रहा। फिर दोनों आँखों खोलकर बोला, “ओफ, इतना चीखते क्यों हैं महाशय जी में क्या बहरा हूँ?” यह सुनकर सरदार ने अपनी आवाज धीरे करके कहा, “तुम क्या मेंढक के कुछ लगते हो।” उस जानवर ने कहा, “ना ना ना ना, कोई नहीं, कोई नहीं।” इसके बाद वह अपनी दोनों आँखें मूँदकर बड़ी जोर से हिलने लगा।

यह देखकर बूढ़े सरदार ने चिल्लाकर पूछा, “मगर तुम तो इस छाते को लेने आए हो।” तभी सभी एक साथ चिल्लाने लगे, “उतर आओ, उतर आओ, वहाँ से झटपट उतरकर चले आओ।” प्रधान सरदार लपककर उसकी दुम पकड़कर जी-जान से खींचने लगा। और शालीन बूढ़े ने झाड़ी में बैठे-बैठे अपना भाला तान लिया। दुमवाले जानवर ने खीझकर कहा, “बड़ी आफ़त है! महाशय जी, मेरी दुम पकड़कर इतना क्यों खींच रहे हैं? उखड़ जाएगी न।

सरदार ने पूछा, “तब तुम छाते पर चढ़कर उसे रौंद क्यों रहे हो?” तब वह जानवर अपनी गोल आँखों से आसमान को कुछ देर तक ताकने के बाद बोला, “क्या कहा? आप कहना क्या चाहते हैं? सरदार ने कहा, “हम तो मेंढक के छाते की बात कर रहे हैं।” जैसे ही उसके कानों में यह बात पड़ी वह खिक् खिक् खिक् कर हँसता हुआ लोट-पोट होने लगा। उसके बदन पर नीला, पीला, हरा, इन्द्रधनुषी जैसे विभिन्न रंग अपनी छटा दिखाने लगे।

सभी घबड़ाकर भागे-भागे आए, “क्या हुआ, क्या हुआ?” किसी ने कहा, “इसे पानी पिलाओ।” किसी ने कहा, “इसे पंखा झलो।” काफ़ी देर बाद उस जानवर ने शान्त होकर, ठीक से बैठते हुए कहा, “मेंढक का छाता क्या होता है? यह क्या मेंढक का छाता है? तुम लोगों की भी कैसी अक्ल है। न यह छाता है, न किसी मेंढक से इसका सम्बन्ध है। वे ही इसे मेढक का छाता कहते हैं।

यह सुनकर किसी से कुछ कहते नहीं बना। सभी एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। आखिरकार छोकरे जैसे किसी ने पूछा, “महाशय, आप कौन है?” दुमवाले उस जानवर ने कहा, “मैं बहुरूपी हूँ। गिरगिट का चचेरा भाई गोशॉप की जा का हूँ। यह चीज़ अब मेरी है। मैं इसे घर ले जाऊँगा।” इतना कहकर वह मेंढक के छाते को बग़ल में दबाकर, बड़ी गम्भीरता से चला गया। सभी मुँह बाए देखते रहे।

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दान का हिसाब | Dan Ka Hisab Story In Hindi

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Dan Ka Hisab Story In Hindi

Dan Ka Hisab Story In Hindi- एक था राजा। राजा जी लकदक कपड़े पहनकर यूँ तो लाखों रुपये खर्च करते रहते थे, पर दार के वक़्त उनकी मुट्ठी बन्द हो जाती थी। राजसभा में एक-से-एक नामी-दानी लोग आते रहते थे, लेकिन गरीब, दुःखी, पंडित, सरन इनमें से कोई भी नहीं आता था क्योंकि वहाँ पर गुणियों का सत्कार नहीं होता था। घेलेभर भीख भी नहीं मिलती थी।

एक बार उस राज में अकाल पड़ गया। पूर्व सीमा के लोग बिना खाए मरने लगे। राजा के पास ख़बर आई। वे बोले, “यह तो भगवान की मार है, इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है। लोगों ने कहा, “राजभंडार से सहायता करने का हुक्म देने की कृपा करें, जिससे हम लोग दूर से भी चावल खरीदकर अपनी जान बचा सकें।

Dan Ka Hisab Story In Hindi

राजा बोले, “आज तुम लोग अकाल से पीड़ित हो, कल पता चलेगा, कहीं भूकंप आया है। परसों सुनूँगा, कहीं के लोग बड़े ग़रीब हैं, दो वक्त की रोटी नहीं जुटती इस तरह सभी की सहायता करते-करते जब राजभंडार खत्म हो जाएगा तब खुद में ही दिवालिया हो जाऊँगा।

यह सुनकर सभी निराश होकर लौट गए। इधर अकाल का प्रकोप फैलता ही जा रहा था। न जाने रोज कितने ही लोग भूख से मरने लगे। दूत फिर राजा के पास हाजिर हुआ। उसने राजसभा में गुहार लगाई, “दुहाई महाराज! आपसे ज़्यादा नहीं चाहते, सिर्फ दस हजार रुपये उन्हें दे दें तो वे आधा पेट खाकर भी जिन्दा रह जाएँगे।

राजा बोले, “उतने कष्ट से जीवित रहकर क्या लाभ? और दस हज़ार रुपये भी क्या तुम्ह बहुत सहज लग रहे हैं?” दूत बोला, “भगवान की कृपा से करोड़ों रुपये राजकोष में मौजूद हैं। जैसे धन का लागर हो उसमें से एक-आध लोटा ले लेने से महाराज का क्या नुकसान हो जाएगा!” राजा बोले, “पर्याप्त धन रहने पर क्या उसे दोनों हाथों से लुटा देना चाहिए? दूत ने कहा, “प्रतिदिन के इन सुगन्धित यस्त्रों, मनोरंजन और महल की सजावट में खर्च होनेवाले रुपयों में से थोड़ा-सा मिल जाने पर उन अभागों की जान बच जाएगी। यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया।

बोले, “खुद भिखारी होकर मुझे उपदेश दे रहे हो? मेरा रुपया है, मैं चाहे उबालकर खाऊँ सारी तकलीफ़ सहकर मेरी ख़ुशी तुम अगर इसी तरह बकवास करोगे तो मुश्किल में पड़ जाओगे। इसलिए इस वक़्त तुम चुपचाप खिसक जाओ।” राजा का मिजाज देखकर दूत यहाँ से चला गया।

राजा हँसते हुए बोले, “छोटे मुँह बड़ी बात अगर दो सौ, पाँच सौ रुपये होते तो एक बार सोच भी सकता था, पहरेदारों की खुराक से दो-चार दिन काटने पर यह रक्रम पूरी भी हो सकती थी। मगर इतने से उनका पेट नहीं भरेगा, एकदम दस हज़ार हाँक बैठा। छोटे लोगों के मारे नाक में दम है।

यह सुनकर यहाँ उपस्थित लोग हाँ-हूँ कहकर रह गए। मगर मन-ही-मन उन्होंने भी सोचा “छिः छिः राजा ने यह ठीक नहीं किया।” दो दिन बाद न जाने कहाँ से एक बूढ़ा संन्यासी आकर राजसभा में हाज़िर हुआ। उसने राजा को आशीर्वाद देते हुए कहा, “दाता कर्ण महाराज! फ़क़ीर की भिक्षा पूर्ण कर दें।

राजा बोले, “जरा पता तो चले तुम्हें क्या चाहिए? थोड़ा कम मांगने पर शायद मिल भी जाए। संन्यासी बोले, “मैं फकीर आदमी हूँ, मुझे ज्यादा देकर होगा क्या? में राजकोष से महीने भर तक बहुत मामूली भिक्षा प्रतिदिन लेना चाहता हूँ।” मेरा भिक्षा लेने का नियम इस प्रकार है, “मैं पहले दिन जो लेता हूँ, दूसरे दिन उसका दुगुना, फिर तीसरे दिन उसका दुगुना, फिर चौथे दिन तीसरे दिन का दुगुना। इसी तरह से प्रतिदिन दुगुना लेता जाता हूँ।

भिक्षा लेने का मेरा यही तरीक़ा है। राजा बोले, “यह तो समझ गया। मगर पहले दिन कितना लेंगे, यही असली बात है। दो-चार रुपयों से पेट भर जाए तो अच्छी बात है, मगर एकदम से बीस-पचास हाँकने लगें, तब तो काफ़ी बड़ी रक़म हो जाएगी। संन्यासी हँसते हुए बोले, “महाराज फ़क़ीर भला लोभी होता है? मैं तो बीस-पचास की कौन कहे, दो-चार रुपये भी नहीं माँगता आज मुझे एक पैसा दीजिए, फिर उनतीस दिन तक दुगुने करके देते रहने का हुक्म दीजिए।

यह सुनकर राजा, मन्त्री, मुसाहिब सभी की जान में जान आई। तुरन्त हुक्म दे दिया कि संन्यासी ठाकुर के हिसाब के अनुसार एक महीने तक राजकोष से उन्हें भिक्षा दी जाती रहे। संन्यासी महाराज की जय-जयकार करते हुए घर लौटे। तरह दो दिन बीते दस दिन बीते दो सप्ताह तक भिक्षा देने के बाद भंडारी ने हिसाब करके देखा राजा के आदेशानुसार राज भंडारी प्रतिदिन हिसाव करके संन्यासी को मिक्षा देने लगे।

इस कि भीख में काफ़ी दान निकला जा रहा है। यह देखकर उन्हें उलझन महसूस होने लगी। महाराज तो कभी किसी को इतना दान नहीं देते थे। उसने यह बात मन्त्री को बताई। मन्त्री बोले, “वाकई, यह बात तो पहले ध्यान में ही नहीं आई थी। मगर अब कोई उपाय भी नहीं है। महाराज का हुक्म बदला नहीं जा सकता।” इसके बाद फिर कुछ दिन बीते भंडारी फिर हड़बड़ाता हुआ मन्त्री के पास पूरा हिसाब | लेकर आ गया। हिसाब देखकर मन्त्री का चेहरा उतर गया।

ये अपना पसीना पोंछकर, सिर खुजलाकर, दाढ़ी में हाथ फेरते हुए बोले, “यह क्या कह रहे हो अभी इतना? तो फिर महीने के अन्त में कितने रुपये होंगे? भंडारी बोला, “जी, पूरा हिसाब तो नहीं किया है।” मन्त्री बोले, “भागकर जाओ, अभी खताची से पूरा हिसाब निकलवाकर से आओ।” भंडारी हाँफता हुआ भागा, “मन्त्री महाशय अपने माथे पर बर्फ की पट्टी लगाकर तेजी से पंखा झलवाने लगे।

आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि भंडारी काँपते हुए पूरा हिसाब लेकर आ गया। मन्त्री ने पूछा, “कुल मिलाकर कितना हुआ। भंडारी ने हाथ जोड़कर कहा, “जी, एक करोड़ सड़सठ लाख, सतहत्तर हजार दो सौ पन्द्रह रुपये, पन्द्रह आने और तीन पैसे।” मन्त्री गुस्से में बोले, “मजाक कर रहे हो? भंडारी ने कहा, “मजान क्यों करूंगा? आप ही हिसाब देख लीजिए।” यह कहकर उसने हिसाब का कागज मन्त्री जी को दे दिया। मन्त्री महाशय हिसाब देखकर ऑंखें उलटकर मूर्च्छित होने को हुए। सभी उन्हें संभालकर बड़ी मुश्किलों से राजा के पास ले आए।

राजा ने पूछा, “बात क्या है?” मन्त्री बोले, “महाराज, राजकोष से करीब दो करोड़ रुपयों का नुकसान होने जा रहा है। राजा ने पूछा, “यह कैसे?” मन्त्री बोले, “महाराज, संन्यासी ठाकुर को आपने भिक्षा देने का हुक्म दिया है। मगर अब देख रहा हूँ उन्होंने इस तरह राजकोष से करीब दो करोड़ रुपये झटकने का उपाय कर लिया है।” राजा बोले, “इतने रुपये देने का हुक्म तो नहीं हुआ था। तब इस तरह का हुक्म का क्यों किया? भंडारी को बुलाओ।

मन्त्री ने कहा, “जी सब कुछ आपके हुक्म के अनुसार ही हुआ है। आप खुद ही दान का हिसाब देख लीजिए।” राजा ने उसे एक बार देखा, दो वार देखा, इसके बाद वे तड़पते हुए बेहोश हो गए। काफी कोशिशों के बाद उनके होश में आ जाने पर लोग संन्यासी ठाकुर को बुलाने दौड़े। सारा हिसाब इस प्रकार था

पहला दिन1 पैसा16वाँ दिन512 रुपये
दूसरा दिन2 पैसे17वाँ दिन1024 रुपये
तीसरा दिन1 आना18वाँ दिन2048 रुपये
चौथा दिन2 आने19वाँ दिन4096 रुपये
पाँचवाँ दिन4 आने20वाँ दिन8192 रुपये
छठा दिन8 आने21वाँ दिन16384 रुपये
सातवाँ दिन1 रूपया22वाँ दिन32768 रुपये
आठवाँ दिन2 रुपये23वाँ दिन65536 रुपये
नवाँ दिन4 रुपये24वाँ दिन131072 रुपये
दसवाँ दिन8 रुपये25वाँ दिन262144 रुपये
11 वाँ दिन18 रुपये26वाँ दिन524288 रुपये
12वाँ दिन32 रुपये27वाँ दिन1048576 रुपये
13वाँ दिन64 रुपये28वाँ दिन2097152 रुपये
14वाँ दिन128 रुपये29वाँ दिन4194304 रुपये
15वाँ दिन256 रुपये30वाँ दिन8388608 रुपये 1,67,77,215 रुप
15 आने, 3 पैसे

संन्यासी के आते ही राजा रोते हुए उनके पैरों पर गिर पड़े। बोले, “दुहाई है ठाकुर, मुझे इस तरह जान-माल से मत मारिए। जैसे भी हो एक समझौता करके मुझे वचन से मुक्त कर दीजिए।” संन्यासी ठाकुर गम्भीर होकर बोले, “इस राज्य में लोग अकाल से मर रहे हैं, उनके लिए पचास हजार रुपये चाहिए।

वह रुपया नकद मिलते ही मैं समझँगा मुझे मेरी भिक्षा मिल गई है। ” राजा ने कहा, “उस दिन एक आदमी ने मुझसे कहा था कि दस हज़ार रुपये ही बहुत होंगे।” संन्यासी बोले, “मगर आज मैं कहता हूँ कि पचास हजार से एक पैसा कम नहीं लूंगा।”

राजा गिड़गिड़ाए, मन्त्री गिड़गिड़ाए, वजीर नाजिर सभी गिड़गिड़ाए। आँसुओं की वहाँ बाढ़ आ गई, मगर संन्यासी अपने वचन से जरा भी नहीं डिगे। आखिरकार लाचार होकर राजकोष से नकद पचास हज़ार रुपये संन्यासी को गिनकर देने के बाद ही राजा की जान बची।

पूरे देश में ख़बर फैल गई कि अकाल के कारण राजकोष से पचास हजार रुपये राहत में दिए गए हैं। सभी ने कहा, “हमारे महाराज कर्ण जैसे ही दानी हैं।

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