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पगला दासू | Pagla Dasu Story In Hindi

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Pagla Dasu Story In Hindi

Pagla Dasu Story In Hindi- हमारे स्कूल के छात्रों में ऐसा कोई भी नहीं था, जो पगला दासू को नहीं जानता हो। स्कूल में कोई किसी और को भले ही न पहचाने पर पगला दासू को जरूर पहचान लेता था। उस बार एक नया दरबान आया था। एकदम कोरा, देहाती लेकिन पहली बार जब उसने पगला दासू का नाम सुना, सभी उसने सही अन्दाज लगा लिया कि यही पगला दासू है।

क्योंकि उसके चेहरे, बातचीत, -दाल से पता चल जाता कि उसके दिमाग में कुछ गड़बड़ है उसकी आँखों बिलकुल गोल दी, उसके कान अस्वाभाविक रूप से बड़े थे और उसके सिर के बाल घुंघराले थे। उसे देखकर लगता था क्षीण देह, क़द नाटा जिस पर सिर अति भारी कछार की कई मछली-सा मानव शरीरधारी।

Pagla Dasu Story In Hindi

जब वह तेज चलता था अथवा तेजी से बात करता था, तब उसके अंग-संचालन को देखकर न जाने क्यों झींगा मछली याद आने लगती। ऐसा नहीं कि वह बेवकूफ़ था। गणित लगाते समय, विशेषकर काफ़ी बड़े-बड़े गुणा-भाग का हल करते वक्त उसका दिमाग़ आश्चर्यजनक रूप से तेज चलता था। इसके अलावा कभी-कभी वह हम लोगों को मूर्ख बनाने के लिए ऐसी चाल चलता कि हमलोग उसकी अक्ल पर हैरान हो जाते थे।

दासू यानी दासरथी जब पहले-पहल हमारे स्कूल में भर्ती हुआ, तब तक जगबन्धु को अपनी कक्षा का सबसे अच्छा विद्यार्थी समझा जाता था। पढ़ाई में अच्छा होते हुए भी उसके जैसा ईर्ष्यालु ‘मोंगी विल्ली’ हम लोगों ने नहीं देखा था। दासू एक दिन जगबन्धु के पास एक अंग्रेजी शब्द का अर्थ समझने गया था।

जगबन्धु ने उसे नाहक जली-कटी सुनाते हुए कहा, “मुझे क्या कोई और काम नहीं है? आज • किसी को अंग्रेजी समझाऊ, कल किसी का सवाल हल कर दूँ, परसों काई और फ़र्माइश लेकर चला आएगा…बस यही करता रहूँ। दासू ने भी बिगड़कर कहा, “तुम तो बड़े बड़े पाजी, छोटे दिलवाले हो।” जगबन्धु ने पंडित जी से शिकायत की, “यह नया लड़का मुझे गाली दे रहा है।

पंडित जी ने दासू को ऐसा डाँटा कि बेचारा चुप हो गया। हमें अंग्रेज़ी बिट्टू बाबू पढ़ाते थे। जगबन्धु उनका प्रिय छात्र था। पढ़ाते वक़्त जब उन्हें पुस्तक की जरूरत पड़ती थी, वे उसे जगबन्धु से ले लेते थे। एक दिन उन्होंने पढ़ाते समय व्याकरण की किताब मांगी, जगबन्धु ने झटपट अपनी हरे जिल्दवाली अंग्रेजी व्याकरण की किताब उन्हें दे दी।

मास्टर साहब ने किताब खोलते ही अचानक गम्भीर होकर पूछा, “यह किताब किसकी है? जगबन्धु ने सीना तानकर कहा, “मेरी है। मास्टर साहब बोले, “हूँ, शायद नया संस्करण है? पूरी किताब ही एकदम बदल गई है। यह कहकर वे पढ़ने लगे, “यशवन्त दरोगा … सनसनीखेज जासूसी नाटक।” जगबन्धु समझ न पाने के कारण बेवकूफों की तरह ताकने लगा।

मास्टर साहब बहुत नाराज होकर बोले, “अब यही सब फ़ालतू चीजें तुम पढ़ रहे हो? जगबन्धु ने घबराकर कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन मास्टर साहब ने डाँटते हुए कहा, “अब रहने दो, सफ़ाई देने की जरूरत नहीं। बहुत हो गया।” शर्म और अपमान से जगबन्धु के कान लाल हो गए। हम लोग बहुत खुश हुए। बाद में पता चला कि यह दासू भैया की शरारत थी। उसने मजा लेने के लिए उपक्रमणिका की जगह ठीक ऐसी ही जिल्दवाली किताब रख दी थी।

दासू को लेकर हम लोग हमेशा ही हँसी मजाक करते थे और उसके सामने ही उसकी वृद्धि और चेहरे के बारे में कटु आलोचना करते थे। मगर उसे कभी भी बुरा मानते नहीं देखा। कभी-कभी तो वह खुद ही हमारी टीका-टिप्पणियों पर और भी मज़े लेकर अपने बारे में तरह-तरह के किस्से सुनाता।

उसने एक दिन कहा, “भाई मेरे मुहल्ले में जब भी किसी को अमावट बनानी होती है, उसे मेरी ज़रूरत पड़ती है। पता है क्यों?” हम लोगों ने पूछा, “शायद तुझे अमावट खूब पसन्द होगी ?” उसने कहा, “नहीं।” वे जब अमावट सुखाने लगते हैं, तब मैं यहाँ छत पर एकाधिक बार अपना चेहरा दिखा आता हूँ। इतने से ही आसपास के सारे कीए घबड़ाकर भाग जाते हैं। फिर किसी को अमावट की रखवाली नहीं करनी पड़ती।

वह एक दिन अचानक पतलून पहनकर स्कूल में आ गया। ढीले-ढाले पाजामे जैसी पतलून और ग़िलाफ़ की तरह का कोट पहनकर वह बड़ा अजीब-सा लग रहा था। इसे वह खुद भी महसूस कर रहा था। इसे वह बड़े मज़े की बात भी समझ रहा था। हम लोगों ने उससे पूछा, “आज पतलून पहनकर क्यों आया है?

दासू हँसता हुआ बोला, “अच्छी तरह अंग्रेज़ी सीख सकूँ इसलिए। एक बार वह अपने सिर के बाल मुड़वाकर माथे पर पट्टी बाँधकर कक्षा में आने लगा। इस बात को लेकर मज़ाक़ करते ही वह खुश हो गया। दासू को गाना बिलकुल ही नहीं आता था। उसे सुर-ताल का ज्ञान नहीं था, इसे भी वह बेहतर जानता था।

इसके बावजूद जब उस बार इन्स्पेक्टर साहब जाँच के लिए स्कूल में आए, तब वह हमें खुश करने के लिए ज़ोर-ज़ोर से गाने लगा था। 56 / सुकुमार राय : चुनिन्दा कहानियाँ अगर हममें से कोई उस दिन वैसा करता तो हमें कड़ा दंड मिलता, मगर दासू को पगला समझने के कारण उसे कोई सजा नहीं मिली।

एक बार छुट्टी के बाद दासू एक विचित्र बक्सा बग़ल में दबाकर कक्षा में हाज़िर हुआ। मास्टर साहब ने पूछा, “क्यों दासू, इस बक्से में क्या लाए हो? दासू बोला, “जी, मेरा सामान है।” वह सामान क्या हो सकता है, इसे लेकर हममें आपस में बहस छिड़ गई। दासू के पास किताब कापी, छुरी-पेंसिल सभी तो थीं, तब उसमें और क्या हो सकता था?

दासू से पूछने पर उसने सीधे-सीधे कोई जवाब न देकर उस बक्सा को कसकर पकड़ लिया। फिर बोला, “खबरदार मेरा बक्सा मत खंगालना।” इसके बाद चावी से बक्सा को थोड़ा खोलकर उसके भीतर रखी चीज देखकर इतमीनान से सिर हिलाकर बुदबुदाते हुए वह हिसाद लगाने लगा। मैंने कौतूहलवश झाँकने की कोशिश की थी कि तभी उस पगले ने हड़बड़ाकर चावी उल्टी घुमाकर बक्से को बन्द कर दिया।

फिर तो हमारे बीच आपस में ही बहस शुरू हो गई। किसी ने कहा, “वह उसका टिफिन का बक्सा है, उसमें खाना रखा होगा। लेकिन उसे टिफिन के वक्त कभी खोलकर उसमें से खाना निकालते किसी ने नहीं देखा। किसी ने कहा, “शायद यह उसका मनीबैग होगा, उसमें उसके रुपये-पैसे रखे होंगे, इसीलिए वह उसे हमेशा अपने साथ लिए रहता है।

तभी किसी ने पूछा, “रुपये-पैसों के लिए इतने बड़े बक्से की क्या जरूरत? यह क्या स्कूल में महाजनी कारोवार करेगा?” एक दिन टिफ़िन में दासू अचानक हड़बड़ाकर बक्से की चाबी मुझे देकर जाते हुए बोला, “इसे अभी अपने पास रखो। देखो कहीं खो न जाए। मुझे आने में अगर देर हो जाए तो तुम लोग कक्षा में जाने से पहले इसे दरबान को दे देना।” यह कहकर दरबान के ज़िम्मे उस बक्से को रखकर वह चला गया।

तब हम लोगों का उत्साह देखने लायक था। इतने दिनों बाद जाकर अब मौका मिला था। अब दरबान के वहाँ से हटने का इन्तज़ार था। थोड़ी देर बाद दरवान रोटी पकानेवाला अपना लोहे का चूल्हा सुलगाकर, थोड़े बर्तन लेकर नल के पास चला गया। हम लोग इसी मौके की तलाश में थे।

दरबान के ओझल होते ही हम पाँच-छह लड़के उसके कमरे के पास उस बक्से के चारों ओर सिमट गए। मैंने चाबी से बक्से को खोलकर देखा। उसमें काग़ज़ का भारी गट्ठर कपड़े के टुकड़े से अच्छी तरह लपेटा हुआ था। फटाफट लपेटे हुए कपड़े को खोलकर देखा उसमें एक काग़ज़ का बक्सा था, उसमें एक और छोटी पोटली थी। उसे खोलने पर एक कार्ड मिला, जिस पर लिखा था-ले अंगूठा’ काई के उल्टी तरफ़ लिखा था, “ज़रूरत से ज़्यादा कौतूहल ठीक नहीं।

इसे देखकर हम एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। आखिर में किसी ने कहा, “वह भले ही जो 1 हो, उसने हमें खूब उल्लू बनाया एक और ने कहा, “जिस तरह यह बंधा हुआ था, ठीक उसी तरह रख दो, जिससे पता न चले कि हमने इसे खोला था। इससे वह खुद ही धोखा खा जाएगा। मैंने कहा, “ठीक है। उसके लौटने के बाद तुम सभी भले लड़कों की तरह इस बक्से को दिखाने के लिए कहना और उसमें क्या है इस बारे में पूछना। इसके बाद हम सभी जल्दी-जल्दी काराजों को बाँधकर पहले की तरह गहर में लपेटकर, उसे बक्सा में रखकर ताला लगाने लगे।

बक्से में ताला लगाने जा ही रहा था कि तभी खी खी करके हँसने की आवाज़ आई। हमने देखा कि चारदीवारी पर पगला दासू बैठकर हँसते-हँसते लोटपोट हो रहा था। बदमाश अभी तक चुपचाप बैठा तमाशा देख रहा था। तब मैं समझ गया कि मुझे चाबी देना, दरवान के पास बक्सा रखना, टिफ़िन के वक़्त बाहर जाने का नाटक करना, यह सब उसकी शैतानी थी। हमें नाहक मूर्ख बनाने के लिए वह यूँ ही कई दिनों से इस बक्से को ढोता फिर रहा था। हमलोग भला यूँ ही उसे ‘पगला दासू’ कहते हैं।

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सर्वज्ञ | Sarvdnya Story In Hindi

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Sarvdnya Story In Hindi

Sarvdnya Story In Hindi- हम लोगों के सर्वज्ञ यानी दुलीराम के पिता किसी अखबार के सम्पादक थे। इसीलिए हममें से कइयों को उसकी कही बातों पर अगाध विश्वास रहता था। विषय चाहे जो भी हो, चाहे जर्मनी की लड़ाई हो या मोहन बागान के फुटबॉल के बारे में या फिर अपने देश के बड़े लोगों की घरेलू बातें हों, चाहे विभिन्न विचित्र रोगों का वर्णन, वह हर विषय पर अपनी राय जाहिर करता था। काफ़ी छात्र मुग्ध होकर उसकी बातें सुनते थे।

मास्टरों में से भी कुछ लोगों की उसके बारे में अच्छी राय थी। दुनिया की सभी ख़बरों में उसका दखल होने के कारण अध्यापक उसे ‘सर्वज्ञ’ कहते थे। मगर मुझे हमेशा यही लगता कि सर्वज्ञ जितना ज्ञान बधारता रहता था, उसमें से ज़्यादातर उड़नझाई होती थीं। दो-चार बड़ी-बड़ी सुनी हुई बातें और अख़बारों की पढ़ी थोड़ी-बहुत ख़बरें ही उसकी जमा पूँजी थी, उसी को पॉलिश करके उसमें तरह-तरह की बकवास मिलाकर वह अपना ज्ञान वधारता रहता था।

Sarvdnya Story In Hindi

एक दिन हमारी कक्षा में पंडित जी से वह नियागरा जलप्रपात के बारे में बात कर रहा था। बातों-बातों में उसने कहा, “नियागरा जलप्रपात दस मील ऊँचा है और सौ मील चौड़ा है। किसी छात्र ने पूछा, “यह कैसे सम्भव है? एवरेस्ट सबसे ऊँचा पहाड़ है। उसकी ऊँचाई पाँच मील है।” सर्वज्ञ ने उसे टोकते हुए कहा, “तुम लोग तो ताज़ा ख़बर रखते ही नहीं।” जब भी उसकी किसी बात पर हमलोग सन्देह या आपत्ति करते थे, वह किसी का नाम लेकर हमें डाँटते हुए कहता, “तुम लोग क्या अमुक से ज़्यादा जानते हो?

हमलोग बाहरी तौर पर सब कुछ सह जाते, मगर कभी-कभी भीतर-ही-भीतर आग लग जाती। सर्वज्ञ हमारे मन की बात नहीं समझता था ऐसा नहीं। वह बिलकुल समझ जाता, मगर हमेशा ऐसा भाव जताए रहता, जैसे कि हम उसकी बात पर यकीन करें या न करें, उससे उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला तरह-तरह की ख़बरें और बातें करते समय वह बीच-बीच में हमें सुनाकर कहता, “हालाँकि ऐसे भी कुछ लोग हैं, जो इन बातों पर यकीन नहीं करेंगे।

या फिर “जो लोग बिना पढ़े ही बड़े बुद्धिमान हैं, वे इन बातों को ज़रूर फ़ालतू कहेंगे” इत्यादि। चूँकि उसे काफी ख़बरों की जानकारी रहती थी, साथ ही उसके कहने का ढंग भी प्रभावशाली होता था। इसीलिए हमलोग उससे ज्यादा उलझने की हिम्मत नहीं कर पाते थे।

इसके बाद एक दिन न जाने किस कुबड़ी में उसके एक मामाजी डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, वे हमारे स्कूल के पास ही रहने लगे। तब फिर सर्वज्ञ का कहना क्या! तब वह ऐसी ग़ज़ब की बातें करने लगा, जिससे लगता था कि उससे सलाह लिये बिना मजिस्ट्रेट से लेकर प्यादे तक का काम नहीं चलता। स्कूल के छात्रों के बीच उसका प्रभाव और उसकी ख़ातिर इतनी बढ़ गई कि हम कई बेचारे जो हमेशा उसका मजाक उड़ाते आए थे, कहीं के नहीं रहे। यहाँ तक कि हमारे ऐसे साथियों में से दो-एक लोग इसके साथ हो गए।

हमारी हालत आखिरकार ऐसी हो गई कि हमारा स्कूल में रहना मुश्किल हो गया। हमलोग दस बजने पर गर्दन झुकाकर कक्षा में जाते थे और छुट्टी होते ही दूसरों के तानों से बचने के लिए भागकर घर चले आते थे। टिफ़िन के समय भी हम लोग हेडमास्टर साहब के कमरे के आगे एक बेंच पर बैठकर अच्छे लड़कों की तरह पढ़ते रहते थे।

इसी तरह से कब तक चलता पता नहीं, लेकिन एक दिन की घटना में अचानक सर्वज्ञ महाशय के कारनामे की ऐसी पोल खुली कि उसकी बहुत दिनों की ख्याति मिट्टी में मिल गई और हमलोग भी उस दिन से सिर उठाकर चलने की स्थिति में आ गए। उसी घटना के बारे में बताता हूँ।

एक दिन सुना गया कि लोहारपुर के जमींदार रामलाल बाबू ने हमारे स्कूल के फुटबाल T मैदान और खेल के सामानों के लिए तीन हज़ार रुपये दिए हैं। यह भी सुना कि रामलाल बाबू चाहते थे कि इस उपलक्ष्य में हम लोगों को एक दिन की छुट्टी मिले और एक दिन जमकर दावत हो।

कई दिनों से यह खबर ही हमारी बातों का विषय बन गया। कब छुट्टी होगी, कब दायत होगी और उसमें क्या-क्या होगा आदि बातों की हम कल्पना करने लगे। सर्वज्ञ दुलीराम ने कहा कि उस बार जब वह दार्जिलिंग गया था, तब वहाँ उसकी रामलाल वायू से न केवल भेंट हुई थी, बल्कि अच्छी जान-पहचान भी हो गई थी।

रामलाल बाबू ने यहाँ उसकी कैसी खातिरदारी की, उसका कविता पाठ सुनकर प्रशंसा में क्या कहा, इस बारे में वह स्कूल शुरू होने के पहले और बाद में, टिफिन के समय और मौका पाने पर कक्षा में पढ़ाई के दौरान भी तरह-तरह की असम्भव वातें बताता। हालाँकि असम्भव शब्द का प्रयोग में कर रहा हूँ, मगर उसके चेलों के समूह को इन सभी बातों पर आँख मूंदकर यकीन करने में जरा भी दिक्कत नहीं होती थी।

एक दिन टिफ़िन के समय आँगन की बड़ी सीढ़ी पर सर्वज्ञ ने अपने चेलों के साथ महफ़िल जमा रखी थी। वह कह रहा था…एक दिन में दार्जिलिंग में लाट साहब के घर के पास की सड़क पर घूम रहा था, कि तभी मैंने रामलाल बाबू को मुस्कुराते हुए मेरी तरफ़ आते हुए देखा। उनके साथ एक साहब भी थे। रामलाल बाबू ने कहा, “दुलीराम, तुम अपनी वह अंग्रेजी कविता एक बार इन्हें भी सुना दो।

मैंने इनसे तुम्हारी प्रशंसा की थी, इसीलिए वे तभी से इसे सुनने के लिए उतावले हैं।” जब वे खुद कह रहे थे तो मैं क्या करता? मैंने ‘कैसाबियांका’ से एक कविता उन्हें सुना दी। देखते-देखते वहाँ भीड़ इकट्ठा हो गई। सभी मेरी कविता सुनना चाहते थे। सभी कह रहे थे, “एक बार और।” मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया। चूँकि रामलाल बाबू का आग्रह था, इसलिए मैंने एक बार और सुनाई। तभी, किसी ने पीछे से पुछा, “रामलाल बाबू कौन हैं?” सबने गर्दन घुमाकर देखा, सीढ़ी पर एक दुबले-पतले निरीह से एक देहाती सज्जन खड़े थे।

सर्वज्ञ ने कहा, “रामलाल बाबू को आप नहीं जानते? लोहारपुर के जमींदार रामलाल राय।” वे सज्जन कुछ असहज होकर बोले, “हाँ, उनके बारे में सुना है। वे तुम्हारे कुछ लगते हैं क्या?” “ऐसा नहीं, मगर उनसे मेरी खूब जान-पहचान है। अक्सर पत्र-व्यवहार होता रहता है।

उस सज्जन ने फिर पूछा, “रामलाल बाबू कैसे आदमी हैं?” सर्वज्ञ ने बड़े उत्साह से बताया, “बहुत बढ़िया आदमी हैं जैसे वे देखने में हैं, वैसी ही बातें भी करते हैं। वैसे ही वे चुस्त-दुरुस्त भी हैं। आपसे क़रीब आधा हाथ लम्बे होंगे और वैसे ही प्रतापी हैं। उन्होंने मुझे कुश्ती सिखाने के लिए कहा था, कुछ दिन और रहने पर उसे पूरी तरह से सीख लेता।

उन सज्जन ने कहा, “ये क्या कह रहे हो? तुम्हारी उम्र क्या है?” “जी, इस बार तेरह साल का हो गया।” “मगर अपनी उम्र के हिसाब से तुम बहुत चालाक हो। बातों में भी बड़े माहिर हो। तुम्हारा नाम क्या है?” सर्वज्ञ ने बताया, “दुलीराम घोष! रमदा बाबू डिप्टी मजिस्ट्रेट मेरे मामा हैं।” यह सुनकर वे सज्जन प्रसन्न होकर हेडमास्टर साहब के कमरे की ओर चले गए।

छुट्टी के बाद हम सभी बाहर आए। स्कूल के सामने ही डिप्टी साहब का घर था, उनके बाहर के बरामदे में देखा, वे ही सज्जन दुलीराम के डिप्टी मामा के साथ बैठे बात कर रहे थे। दुलीराम को देखते ही मामा ने उसे बुलाकर कहा, “दुली इधर आ, इन्हें प्रणाम कर… यह मेरा भानजा दुलीराम है।” उन सज्जन ने हँसते हुए कहा, “हाँ, इसका परिचय मुझे पहले ही मिल चुका है।

दुलीराम ने हमें दिखाते हुए बड़े भक्तिभाव से उन्हें प्रणाम किया। उन सज्जन ने पूछा, “क्या तुम मुझे नहीं जानते?” सर्वज्ञ इस बार यह नहीं कह पाया कि जानता हूँ। वह बेवकूफों की तरह सिर खुजलाने लगा। वे सज्जन अब बड़े मजे से मुस्कुराते हुए हमें सुनाते हुए बोले, “मेरा नाम रामलाल बाबू है। लोहारपुर का रामलाल राय।

दुलीराम कुछ देर मुँह बाए खड़ा रहा। इसके बाद अचानक अपनी स्थिति समझकर घर के अन्दर भाग गया। उसकी पोल खुल जाने से सभी लड़के सड़क पर खिलखिलाकर हंसने लगे। उसके अगले दिन हम लोगों ने स्कूल में आकर देखा कि सर्वज्ञ उस दिन स्कूल में नहीं आया था। सुना, उसके सिर में दर्द था। तरह-तरह के बहाने बनाकर वह दो-तीन दिनों तक स्कूल आने से बचता रहा। फिर वह जिस दिन स्कूल में आया, उसे देखकर उसके ही कई चेले उससे पूछने लगे, “क्यों भाई, रामलाल बाबू की चिट्टी मिली।” यह कहते हुए उन्होंने उसे घेर लिया। उसके बाद वह जितने दिनों तक यहाँ रहा, उसे चिढ़ाने के लिए ज़्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ती। थी, बस एक बार रामलाल बाबू के बारे में पूछना ही काफ़ी होता।

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भोलानाथ की सरदारी | Bholanath Ki Sardari Story In Hindi

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Bholanath Ki Sardari Story In Hindi

Bholanath Ki Sardari Story In Hindi- हर बात में टांग अड़ाने की भोलानाथ की बुरी आदत थी जहाँ उसकी जरूरत नहीं होती थी, यह भी वह बड़े जानकार की तरह ज्ञान बघारने लगता था जिस काम को वह जरा भी नहीं समझत था, उस काम में भी बिना सोचे-समझे हाथ लगा देता। इसलिए बुजुर्ग उसे ‘ताऊ’ और हमउम्र उसे ‘टैगड़ी राम’ कहते थे लेकिन इससे उसे कोई दुःख नहीं था और न कोई ख़ास शर्म ही थी उस दिन उससे तीन कक्षा आगे के बड़े लड़के जब अपनी पढ़ाई की चर्चा कर रहे थे, तब भोलानाथ किसी ज्ञानी की तरह गम्भीर होकर बोला, “वेबस्टर से बेहतर कोई शब्दकोश नहीं है।

Bholanath Ki Sardari Story In Hindi

मेरे बड़े भाई ने दो खंडों में जो वेबस्टर शब्दकोश खरीदा है, उसका एक-एक खंड इत्ता बड़ा और इत्ता मोटा है। और उसकी जिल्द लाल चमड़े की है।” उनमें से एक छात्र ने उसका कान कसकर हिलाते हुए कहा, “किस तरह का लाल भैया? तुम्हारे इस कान की तरह?” लेकिन भोलानाथ भी कम बेहया नहीं था। वह उसके दूसरे ही दिन उन्हीं के पास जाकर फुटबाल के बारे में जाने क्या अपनी राय देते वक़्त झापड़ खाकर लौटा था।

विशु के यहाँ एक चूहेदानी थी भोलानाथ ने अचानक एक दिन ‘यह कैसी चीज है भाई? कहकर उसके कल-पुर्जों को ऐसा हिलाया कि वह चूहेदानी ख़राब हो गई। विशु ने कहा, “बिना जाने-बुझे उससे छेड़छाड़ करने की क्या जरूरत थी?” भोलानाथ ने जरा भी शर्मिंदा हुए बिना कहा, “इसमें मेरी क्या गलती है? देख, इसका हत्था बड़ा वाहियात बना है। उसे और मजबूत बनाने की जरूरत थी। इसे बनानेवाले ने हग लिया है।

भोलानाथ पढ़ने-लिखने में अच्छा था, ऐसी बात नहीं, मगर जब मास्टर साहब कठिन कठिन सवाल पूछते थे, तब वह भले ही जाने या न जाने, सबसे पहले जवाब देने के लिए उतावला रहता था। जवाब ज़्यादातर बेवक़ूफ़ी से भरा होता था, जिसे सुनकर मास्टर साहब उसका मज़ाक़ उड़ाते, लड़के हँसते, मगर भोलानाथ का उत्साह इससे जरा भी नहीं कम होता था।

उस बार जब स्कूल में किताबें चोरी होने का हंगामा हुआ, तब भी उसे ऐसी ही सरदारी करते वक़्त खूब भुगतना पड़ा था। हेडमास्टर साहब लगातार किताबें चोरी होने की शिकायतों से तंग आकर, एक दिन हर कक्षा में जाकर पूछने लगे, “इस चोरी के बारे में तुममें से कोई जानता है?” भोलानाथ की कक्षा में जाकर यह सवाल करते ही भोलानाथ ने लपक कर कहा, “जी, मुझे लगता है कि हरिदास का ही इस चोरी में हाथ है।

यह सुनकर हम सभी हैरान हो गए। हेडमास्टर साहब ने पूछा, “तुम्हें कैसे पता कि हरिदास ने चोरी की है?” भोलानाथ ने बड़ी सहजता से कहा, “मुझे पता नहीं, पर मुझे ऐसा लगता है। हेडमास्टर साहब ने उसे डाँटते हुए कहा, “अगर नहीं जानते हो तो फिर ऐसा क्यों कहते हो?

इस तरह महसूस होने का ऐसा क्या कारण है?” भोलानाथ ने फिर कहा, “मुझे ऐसा लगता था कि शायद वही चुराता होगा, इसीलिए ऐसा कहा और तो मैंने कुछ नहीं कहा।” हेडमास्टर साहब ने गम्भीर होकर कहा, “जाओ, हरिदास से माफ़ी माँगो।” उसे उसी वक्त अपना कान पकड़कर हरिदास से माफ़ी माँगनी पड़ी। मगर इससे उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ा।

भोलानाथ को तैरना नहीं आता था। इसके बावजूद वह बड़ी बहादुरी से हरीश के भाई को तैरना सिखाने लगा। अचानक रामबाबू उस वक़्त घाट में पहुँच गए थे, इसीलिए जान बच गई, वरना दोनों ही उस दिन घोष पोखर में डूब जाते कोलकाता में मामा के मना करने के बावजूद 1 चलती ट्राम से कूदने की कोशिश करते वक्त कीचड़ में ऐसा गिरा कि तीन महीने तक उसकी नाक पर चोट का निशान बना रहा और उस बार जब बनजारों ने सियार पकड़ने के लिए जाल बिछाया था, उससे छेड़छाड़ करने के चक्कर में भोलानाथ उसमें ऐसा फँसा कि उसे याद करने पर आज भी हँसी आती है।

लेकिन सबसे ज़्यादा वह जिस बार बुरा फँसा था, वह घटना इस प्रकार है हमारे स्कूल में आने के लिए कालेज की बगल से होकर आना पड़ता था। वहाँ एक कमरा था, जिसे लैबोरेटरी कहते थे। उस कमरे में तरह-तरह के विचित्र यन्त्र लगे थे। भोलानाथ तो हर बात में अति उत्साही रहता था। उसने एक बार कॉलेज के अन्दर जाकर देखा कि एक यन्त्र का चक्का घुमाने पर उसके दूसरी तरफ़ चट्च करके बिजली की चिनगारी निकलती थी।

यह देखकर भोलानाथ को भी उस यन्त्र को चलाकर देखने की इच्छा हुई। लेकिन उस यन्त्र के पास पहुँचते ही किसी ने उसे ऐसा डाटा कि वह यहाँ से भागकर हाँफते हुए स्कूल पहुँचा। मगर उस यन्त्र को चलाने की इच्छा उसके मन में बनी ही रही। एक दिन शाम को जब हम सभी घर लौट रहे थे, उस समय भोलानाथ न जाने कब कॉलेज में घुस गया, हमें पता ही नहीं चला। उसने दबे पाँव कालेज की लेबोरेटरी या यन्त्रशाला में आकर इधर-उधर देखा, वहाँ देखा, वहाँ कोई नहीं था। तभी बड़े इत्मीनान से वह वहाँ घुसकर यन्त्रों को देखने लगा।

उस दिन का वह यन्त्र आलमारी की आड़ में एक ऊँचे आले में रखा हुआ था। वहाँ उसका हाथ नहीं पहुँचा। बड़े कष्ट से वह मेज के पीछे से एक बड़ी चौकी ले आया। इधर कॉलेज का कर्मचारी उस कमरे में ताला लगाकर चला गया। न उसने भोलानाथ को देखा, न भोलानाथ ने उसे चौकी पर खड़े होकर भोलानाथ ने देखा कि उस यन्त्र के पास एक अद्भुत बोतल रखी थी। वह बिजली की बोतल थी, भोलानाथ को यह पता नहीं था वहाँ से हटाने के लिए उसने बोतल को हुआ। तभी बोतल की बिजली अचानक उसके शरीर में प्रवाहित होने लगी। उसे लगा जैसे उसकी हड्डियों के अन्दर तक जाने कैसा धक्का लगा हो। सिर चकरा जाने से वह गिर पड़ा।

बिजली का धक्का खाकर भोलानाथ कुछ देर तक जड़-सा हो गया। इसके बाद घबड़ाकर वहाँ से भागते वक्त उसने पाया दरवाजा बाहर से बन्द था चिटखिनी काफी ऊँचाई पर थीं और वे बाहर से बन्द थीं। चौकी पर चढ़कर भी वहाँ तक नहीं पहुँच सका। वह पसीने-पसीने हो गया। उसने सोचा जोर से चीखे, शायद किसी को सुनाई पड़ जाए। लेकिन उसके गले से जो आवाज निकली और बन्द कमरे में वह ऐसी प्रतिध्वनित हुई कि यह खुद ही डर गया।

इधर साँझ दलने लगी थी। कॉलेज के पीपल के पेड़ पर बैठे एक उल्लू ने अचानक भूत-म-भूत की निकट आवाज़ निकाली। उसे सुनकर वह इस बुरी तरह से डर गया कि एक चीख मारकर वह बेहोश हो गया। कॉलेज के दरबान जो हमारे स्कूल के पांडे जी थे, वे अपने गाँव के दो-चार लोगों के साथ बैठकर बड़े उत्साह से झाँझर ढोल बजाकर ‘हो हो रे कहाँ गए राम गा रहे थे, इसलिए उन्हें किसी तरह की चीख पुकार सुनाई नहीं पड़ी। आधी रात तक उनके कीर्तन का हुल्लड़ चलता रहा।

इसलिए होश में आने के बाद जब भोलानाथ दरवाजे पर धम-धम करते लात मारते हुए चिल्ला रहा था, तब उनकी आवाज उनके कीर्तन के बीच-बीच में सुनाई पड़ने के बावजूद उन लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। पांडेजी ने सिर्फ़ एक बार कहा, “यह कैसा शब्द है, जरा देखा जाए।

तो दूसरों ने बाधा देते हुए कहा, “अरे चिल्लाने दो।” ऐसा करके जब रात के बाहर बजे उनका उत्साह मन्द पड़ा कि तभी भोलानाथ के घरवाले भी हाथों में लालटेन लेकर वहाँ पहुँच गए। वे उसे हर घर में ढूँढ रहे थे, मगर वह कहीं भी नहीं मिला। पहरेदारों से पूछने पर उन्होंने कहा, “स्कूल के बच्चों में से किसी को भी उन्होंने देखा नहीं है। ठीक तभी उसकी धम-धम की आवाज और चीख-पुकार उन्हें सुनाई पड़ी।” उसके बाद भोलानाथ का पता लगाने में उन्हें देर नहीं हुई। लेकिन तब भी उसे बाहर नहीं निकाल पाए, क्योंकि दरवाजे पर ताला लगा हुआ था, जिसकी चावी गोपाल बाबू के पास थी।

वे अपने डेरे में नहीं थे। ये अपनी भतीजी की शादी में चले गए थे और सोमवार को लौटनेवाले थे। लाचार होकर एक सीढ़ी मँगवाकर, खिड़की खोलकर, उसके शीशे तोड़कर काफ़ी हंगामे के बाद अधमरे भोलानाथ को बाहर निकाला गया। वह वहाँ क्या कर रहा था, क्यों आया था, यहाँ कैसे फँस गया जैसी बातें पूछने के लिए भोलानाथ के पिता ने उसे मारने के लिए अपना हाथ उठाया था, मगर भोलानाथ के आतंकित चेहरे को देखकर उन्होंने अपना इरादा बदल दिया।

कई लोगों से पूछने-साउने के बाद जो सारी बात सामने आई, उसे सुनकर ही मैंने उसके यहाँ फँस जाने का वर्णन किया है। लेकिन उसने हमसे यह सब नहीं कहा था। बल्कि उसने तो उल्टा हमें ही यह समझाना चाहा था कि उसने जानबूझकर बहादुरी के लिए कॉलेज में रात बिताने की कोशिश की थी। मगर जब उसने देखा कि उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं कर रहा है, बल्कि असली बात की जानकारी लोगों को होती जा रही है। तब उसका चेहरा ऐसा लटक गया कि कम-से-कम अगले तीन महीने तक वह खुलकर अपनी डींग नहीं हाँक सका।

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व्योमकेश का माँझा | Vyomkesh Ka Manjha Story In Hindi

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Vyomkesh Ka Manjha Story In Hindi

Vyomkesh Ka Manjha Story In Hindi- टोकियो, क्योटो, नागासाकी, योकोहामा बोर्ड पर एक बहुत बड़ा व्योमकेश का ध्यान कहीं और था। कल शाम को डॉक्टर साहब के छोटे बेटे के साथ पेंच लड़ाते वक़्त उसकी दो-दो पतंगें कट गई थीं। व्योमकेश इस सदमे से अभी तक उबर नहीं पाया था इसीलिए वह इस वक़्त कक्षा में बैठा-बैठा पतंग की डोर के लिए एक बढ़िया मांझा बनाने की चिन्ता में डूबा हुआ था।

चाइना सरेस गलाकर उसमें पिसा हुआ शीशा और एमरी पाउडर मिलाकर धागे में लेपने से जबर्दस्त माँझा तैयार हो जाएगा यह बात ध्यान में आते ही यह बेहद खुश हो गया। इस तरह तैयार माँझेवाली डोर से उसकी पतंग ताड़ के पेड़ की फुनगी तक पहुँचकर डॉक्टर साहब के बेटे की पतंग को काटने ही वाली थी कि ठीक ऐसे ही वक़्त एक गम्भीर आवाज उसे सुनाई पड़ी, “इधर आओ व्योमकेश ! जरा देखू तो तुम्हारी खोपड़ी में कितना घुसा है।

Vyomkesh Ka Manjha Story In Hindi

ऐसी उत्तेजना की घड़ी में मांझा, डोर, पतंग का पेंच सब फेंक-फॉककर, व्योमकेश को चीन के मध्य भाग में उतरना पड़ा। एक तो उस देश से उसका ख़ास परिचय नहीं था, उस पर एक-दो नाम जो उसे याद भी थे, अचानक इस तरह पकड़ लिए जाने से सब कुछ गड़बड़ हो गया। पहाड़, नदी, देश, प्रदेश में प्रवेश करते-न-करते बेचारा रास्ता भटक गया। बस उसे केवल यही याद रहा कि चीन के चाइना सरेस से बढ़िया मांशा बनता है।

मास्टर साहब ने एक-दो बार पूछने के बाद जब तीसरी बार डपटकर पूछा, “चीन की प्रमुख नदी के बारे में बताओ।” तब पवराहट में उसके मुँह से निकल गया, ‘शंघाई शंघाई याद रहने का कोई ख़ास कारण नहीं था। शायद उसके मामा के पास टिकट संग्रह करनेवाली जो कॉपी थी, उसमें उसने यह नाम देखा होगा। इस वक्त हड़बड़ी में उसके मुँह से यही नाम निकल गया।

दो करारे थप्पड़ खा लेने के बाद श्रीमान व्योमकेश अपने कान पर मास्टर जी का जबर्दस्त प्रेम अनुभव करके बिना किसी विरोध के बेंच पर खड़े हो गए। कान की जलन जैसे-जैसे कम होती गई, उसका मन फिर उस पतंग के पीछे दौड़ने लगा, और वह पतंग की डोर के लिए फिर से माँझा बनाने में व्यस्त हो गया। वह पूरा दिन व्योमकेश का डाँट खाते हुए ही गुजरा।

शाम को जब सब घर लौट रहे थे, उस वक़्त व्योमकेश ने देखा, डॉक्टर साहब का एक बेटा एक पतंग की दुकान से लाल रंग की बहुत बड़ी पतंग खरीद रहा था। यह देखकर व्योमकेश ने अपने दोस्त पाँचकोड़ी से कहा, “देख रहा हूँ पाँचू, हमें दिखा-दिखाकर पतंग खरीदा जा रहा है। यह तो हद हो गई। माना उसने मेरी दो पतंग काटी हैं, मगर इसके लिए इतना जोश दिखाने की क्या जरूरत है?

फिर व्योमकेश ने पाँचू को माँझा तैयार करने की योजना बता दी। या सुनकर पाँचू बोला, “यह सब करके भी क्या तू उसे हरा पाएगा?” यह डॉक्टर साहब का बेटा है न जाने कितने प्रकार के मसालों की उसे जानकारी होगी। अभी उसी दिन मैंने देखा कि उसके बड़े भाई ने किसी मसालेवाली अर्क जैसी कोई चीज़ उड़ेली कि उससे खूब फेन बहने लगा।

अगर वे लोग माँझा बनाने की ठान लें, तो दूसरा उनसे बेहतर माँझा कैसे बना लेगा? यह सुनकर व्योमकेश के उत्साह पर पानी फिर गया। उसे यकीन हो गया कि डॉक्टर बाबू के बेटे को ख़ास प्रकार का माँझा बनाना आता है। अगर ऐसा न होता तो व्योमकेश से चार साल छोटा होने के बावजूद उसने इतनी आसानी से उसके पतंग की डोर कैसे काट दी?

तभी व्योमकेश ने तय कर लिया कि उसके भीझे को जैसे भी हो हासिल करना ही होगा एक बार वह माँझा मित जाए, वह डॉक्टर साहब के बेटे को अपनी पतंग का कमाल दिखा देगा। घर जाकर फटाफट नाश्ता करके व्योमकेश डॉक्टर साहब के बेटों से परिचय करने दौड़ा।

यहाँ जाकर उसने देखा कि बरामदे के एक कोने में बैठकर वही लड़का एक डॉक्टरी खरल में न जाने कौन-सा मसाला घोंट रहा था। व्योमकेश पर नज़र पड़ते ही वह उसे फटाफट एक चौकी के नीचे छिपाकर यहाँ से चुपचाप खिसक गया। व्योमकेश ने मन-ही-मन कहा, “अब छिपाने से क्या लाभ बच्चू, तुम्हारा भेद तो मैंने जान लिया है।

व्योमकेश ने अपनी चारों तरफ़ देखा। उसे कहीं कोई नजर नहीं आया। उसने सोचा कि कोई दीख जाए तो उससे वह थोड़ा-सा वही मसाला माँग ले। फिर सोचा कि माँगने पर कोई उसे देगा भी या नहीं, क्या पता? ऐसी बेकार-सी चीज के लिए उसे किसी से माँगने की क्या जरूरत जो बखूबी सान चढ़ाई जा सकती है। यह सोचकर उसने चौकी के नीचे रखा मुट्ठी भर मसाला उठा लिया। वहाँ से भागा तो फिर अपने घर ही जाकर रुका।

घर पहुँचते ही वह माँझा बनाने में जुट गया। व्योमकेश को वह माँझा कुछ विचित्र जैसा लगा। उसमें जरा भी कड़क नहीं थी। शायद उसे बहुत महीन चूरे से बनाया गया था। डोर पर मांझा चढ़ाते चढ़ाते पूरी शाम ढल गई। तभी उसके बड़े भैया ने आकर उसे डाँटा, “अब यह सब डोरी पतंग छोड़कर पढ़ने बैठ जाओ।

व्योमकेश को उस रात ठीक से नींद नहीं आई। अचानक उसने सपना देखा कि डॉक्टर साहब के बेटे ने मारे जलन के उसकी डोर पर पानी डालकर पूरा माँझा चौपट कर दिया है। सुबह होते ही व्योमकेश अपना माँझा देखने दौड़ा। वहाँ जाकर उसने देखा कि एक बूढ़े सज्जन उसी बरामदे के सामने बैठकर उसके बड़े भैया के साथ हुक्का पीते हुए बात कर रहे थे। व्योमकेश के लिए मुश्किल खड़ी हो गई।

इनके सामने से वह अपना मांझा कैसे लेगा? कुछ देर संकोच करने के बाद आखिरकार वह झटपट अपनी बँधी हुई डोर खींचने लगा। उसे लपेट कर वह लौट ही रहा था कि अचानक खाँसी आ जाने से उस बूढ़े सज्जन की चिलम से थोड़ी-सी आग जमीन पर गिर पड़ी। उन्होंने इसे उठाने के लिए इधर-उधर देखा। पास ही में उन्हें एक कागज पड़ा नर आया। इसी काग़ज़ में व्योमकेश माँझे का मसाला चुराकर ले आया था। थोड़ा मसाला अभी तक उसमें लगा भी था। वह उसी काग़ज़ से आग उठाकर अपनी चिलम में रखने लगे।

सर्वनाश! उन्होंने जैसे ही उस काग़ज़ को आग से हुआ कि पूरा कागज भक्क से जल उठा। इससे उनकी उँगलियाँ जल गई। बरामदे में भी आग फैल गई। काफ़ी हो-हल्ले, भाग दौड़ और पानी डालने के बाद ही वह आग बुझ पाई। वृद्ध सज्जन की जली हुई उँगलियों में मलहम लगाया गया। इन सबसे निपटकर बड़े भैया ने व्योमकेश का कान पकड़कर पूछा, “बेवकूफ़, तूने उस काग़ज़ में क्या रखा था?

व्योमकेश रुसा होकर बोला, “कुछ भी तो नहीं था। पतंग की डोर में लगाने के लिए थोड़ा-सा माँझा रखा था। बड़े भैया को यकीन नहीं हुआ। उन्होंने डाँटा, ‘झूठ बोलते हो?” गुस्से में उन्होंने व्योमकेश को दो-चार थप्पड़ भी जड़ दिए। बेचारे व्योमकेश को इस अपमान के बावजूद इतनी राहत तो मिली कि चलो जो भी हुआ, कम-से-कम उसकी माँशेवाली डोर तो बच गई।

भाग्य से उसने डोर खोल ली थी, नहीं तो डोर जल जाती और उसकी मेहनत पर पानी फिर जाता। शाम को स्कूल से घर लौटते ही व्योमकेश अपनी पतंग और सटाई लेकर छत पर चत्ता गया। मन-ही-मन उसने कहा, “अगर आज डॉक्टर साहब का बेटा आ जाए तो उसे दिखा दूँगा, पतंग की पेंच कैसे लड़ाई जाती है।

तभी पाँचकौड़ी ने आकर उससे कहा, “तूने कुछ सुना। व्योमकेश ने कहा, “नहीं तो क्या बात है।” पाँचू बोला, “डॉक्टर के बेटे ने खुद अपने हाथों से दियासलाई बनाई है। लाल-नीली ली देनेवाली तीलियाँ भी बनाई हैं।” व्योमकेश को सन्देह हुआ। फिर भी उसने कहा, “अरे, उसने दिवासलाई नहीं, मौशा बनाया है।

यह सुनकर पाँच ने खीझते हुए कहा में अपनी आँखों से देखकर आ रहा हूँ कि यह लाल-नीली लौ वाली सलाइया जला रहा था, और तू अपने माँझे की हाँके जा रहा है। एकदम गोबर गणेश है तू! व्योमकेश का मांझा 71 अब व्योमकेश ने अपने मांझे को गौर से देखा। वाक़ई उसमें दियासलाई का मसाला लगा हुआ था।

वह आँखें फाड़कर उसे ही देखता रहा, तभी डॉक्टर साहब के मकान की छत से एक लाल रंग की पतंग उड़कर जैसे उसका मजाक उड़ाने लगी। व्योमकेश का चेहरा लटक गया। वह उदास होकर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गया। पाँचू ने पूछा, “अरे, तुझे अचानक क्या हो गया? व्योमकेश बोला, “तू घर जा आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है।

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डाकू का भ्रम | Daku Ka Bhram Story In Hindi

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Daku Ka Bhram Story In Hindi

Daku Ka Bhram Story In Hindi- हारान बाबू शाम के समय स्टेशन से घर लौट रहे थे। उनका घर स्टेशन से आधा मील दूर था। शाम करीब-करीब ढल चुकी थी। हारान बाबू की चाल तेज हो गई। उनके एक हाथ में बैग था और दूसरे हाथ में छाता । चलते हुए अचानक उन्हें लगा कि कोई उनके पीछे आ रहा है। उन्होंने तिरछी नज़रों से देखा, वाकई कोई और भी उन्हीं की तरह तेज़ क़दमों से उनके पीछे चला आ रहा था।

हारन बाबू को लगा, जैसे वह उनका पीछा कर रहा है। हारान बाबू घबरा गए कि कहीं वह व्यक्ति चोर-डाकू तो नहीं है। इस सुनसान मैदान को पार करते हुए उन्हें अकेला पाकर कहीं वह उन्हें दो-चार लाठी ही न जमा दे हारान बाबू की बॉस जैसी दुबली-पतली टाँगे काँपने लगीं। जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तो वह किसी तरह लड़खड़ाते हुए दौड़ने लगे। उन्हें दौड़ते देखकर उनके पीछेवाला आदमी भी दौड़ने लगा।

Daku Ka Bhram Story In Hindi

यह देखकर हारान बाबू ने सोचा सुनसान मैदान को इस तरह अकेले पार करना ठीक नहीं, बल्कि बड़ी सड़क से वैद्य टोला होकर, घूमकर जाना ही ठीक है। इस तरह कुछ ज़्यादा चलना जरूर पड़ेगा पर जान तो बचेगी। वह झट से दाहिनी तरफ़ की एक गली में घुसकर बख़्शी बाबू की बाड़ लाँघकर दौड़ते हुए मुख्य सड़क पर जा पहुँचे ।

बाप रे! उनके पीछेवाला आदमी वाक़ई बदमाश था। वह भी उन्हीं की तरह बाड़ लाँघकर उल्टे रास्ते से मुख्य सड़क पर आ पहुँचा। हारान बाबू ने अपने छाते की सख्ती से पकड़ लिया। उन्होंने सोचा, अब भाग्य में जो लिखा है, देखा जाएगा। उस बदमाश के नजदीक आते ही इसी छाते से वह उसकी पिटाई कर देंगे। हारान बाबू को याद आया कि वह बचपन में व्यायाम किया करते थे।

उन्होंने एक बार अपनी बाँहों की मांसपेशियाँ फुलाकर देख ली कि वे अभी सख्त होती हैं या नहीं। अब वह काली बाड़ी के पास पहुँच चुके थे। मन्दिर के नजदीक पहुँचते ही हारान बाबू अचानक वहाँ उगी झाड़ियों के बीच से होकर जितना तेज दौड़ सकते थे, दौड़ने लगे। पैरों की आवाज़ क़रीब आते सुनकर उन्हें महसूस हुआ कि वह आदमी उनसे भी तेज दौड़ रहा था।

अब तो उन्हें उसके डाकू होने के बारे में कोई सन्देह नहीं रहा। हारान बाबू का दिल बड़ी तेजी से धड़कने लगा। उनके माथे पर पसीने की बूँदें उभर आईं। अचानक उन्हें सामनेवाले घाट पर कुछ लोग बैठे बातें करते हुए नज़र आए। उन्हें देखकर हारान बाबू के मन में साहस लौट आया।

उनके कुछ और पास पहुँचकर अपने को और सुरक्षित समझकर उन्होंने पलटकर अपना छाता तानते हुए सीना फुलाकर जोर से कहा, “अब मेरे पास आ, मैं तुझसे निपटता हूँ। क्या मुझे तेरी हरकतों का पता नहीं? अपना भला समझता है तो…। मगर जब वह आदमी पास आया तो उसे देखकर उनका जोश ठण्डा पड़ गया। यह भी हारान बाबू जैसा ही दुबला-पतला निरीह आदमी था। वह डाकू तो लगता ही नहीं था।

हारान बाबू ने अपनी आवाज धीमी करके उसे डाँटा, “जरा बता तो, तू मेरा पीछा क्यों कर रहा है? हारान बाबू को नाराज़ देखकर वह आदमी घबरा गया था। उसने किसी तरह अपना गला झाड़कर कहा, “स्टेशन के बाबू ने ही मुझसे कहा था कि आप बलराम बाबू के घर की बगल में रहते हैं। मुझे वहीं जाना है। मैंने सोचा कि मैं आपके पीछे-पीछे चलता रहूँ तो बलराम बाबू के यहाँ पहुँच जाऊँगा ।

मगर बाबूजी, एक बात मेरी समझ में नहीं आई। आप क्या रोज इसी तरह उल्टे-सीधे रास्ते से कूदते-ते-दौड़ते हुए अपने घर जाते हैं? हारान बाबू की समझ में नहीं आया कि वह क्या कहें। सच बात कहने में उन्हें शर्म आ रही थी। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उसे साथ लेकर वह घर की ओर चल पड़े।

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राजा की बीमारी | Raja Ki Bimari Story In Hindi

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Raja Ki Bimari Story In Hindi

Raja Ki Bimari Story In Hindi- एक था राजा। वह बेहद बीमार था। डॉक्टर, वैद्य, हकीम जाने कितने आए, पर सब निराश होकर लौट गए। न वे राजा की बीमारी पकड़ पा रहे थे, न इलाज कर पा रहे थे। इलाज करते भी कैसे बीमारी तो थी ही नहीं। बस राजा को लगता कि वे बेहद बीमार हैं। मगर वह बीमारी है कहाँ, इसे कोई समझ नहीं पाता था।

राजा ने न जाने कितनी तरह की दवाओं का सेवन किया, मगर उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। उनके सिर पर बर्फ रखी गई। पेट सेंका गया पर बीमारी वैसी की वैसी ही रही। अब राजा को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, “भगा दो, इन नालायक्रों को इनके पोथी-पत्रों को छीनकर उनमें आग लगा दो।” इलाज करनेवाले मुँह लटकाकर लौट आए।

Raja Ki Bimari Story In Hindi

लोगों ने डर के मारे राजा के महल की ओर जाना छोड़ दिया। राजमहल के लोग चिन्ता में पड़ गए कि राजा कहीं बिना दवा के ही न मर जाएँ। ऐसे समय न जाने कहाँ से एक संन्यासी का आगमन हुआ। उन्होंने कहा, “राजा को स्वस्थ करने का उपाय में जानता हूँ। लेकिन यह बहुत कठिन है। क्या तुम लोग वैसा कर पाओगे ?” मन्त्री, कोतवाल, सेनापति, राजा के निकट के सभी लोगों ने कहा, “क्यों नहीं कर पाएँगे?

अगर इसमें जान भी जाए तो मंजूर है।” यह सुनकर संन्यासी ने कहा, “पहले एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करो, जिसके मन में कोई चिन्ता न हो, जो हर हाल में खुश रहता हो।” लोगों ने पूछा, “उसके बाद? “संन्यासी बोले, “उसके बाद उस व्यक्ति के कपड़े अगर एक दिन के लिए राजा पहन लें और उस व्यक्ति के गद्दे पर रात भर सो लें, तब देखना उनकी बीमारी दूर हो जाएगी। यह एकदम ठीक हो जाएँगे।

यह सुनकर सभी ने कहा, “यह तो बड़ी अच्छी बात है।” फटाफट यह ख़बर राजा तक पहुँच गई। उन्होंने कहा, “अरे इतना आसान उपाय रहते ये सारे लोग अब तक क्या कर रहे थे? इतनी-सी बात किसी के दिमाग में क्यों नहीं आई? जाओ, उस हँसनेवाले आदमी को तुरन्त ढूंढकर उसका कुर्ता और गद्दा ले आओ।” लोग उस आदमी की तलाश में निकल पड़े। पूरे राज्य में ‘ढूँढो ढूँढो’ का शोर मच गया। लेकिन उस आदमी का पता नहीं चला।

हर आदमी निराश लौटकर कहता, “ऐसा आदमी तो कहीं मिला ही नहीं, जिसे कोई दुःख नहीं है, चिन्ता नहीं है। जो हमेशा हँसता रहता है, खुश रहता है, ऐसा आदमी तो कहीं मिला ही नहीं। तलाश में निकले सभी लोग लौटकर यही कहते। मन्त्री नाराज होकर बोले, “ये किसी काम लायक़ नहीं हैं। इन मूर्खो को पता नहीं कि तलाश कैसे की जाती है?” अब मन्त्री खुद ही कमर कस के निकल पड़े।

बाजार पहुंचकर उन्होंने देखा, एक बड़े-से आँगन में काफ़ी भीड़ थी एक बूढ़ा सेठ बड़ी खुशी से लोगों को चावल, दाल और पैसा दान कर रहा था। मन्त्री ने सोचा, वाह यह आदमी तो बड़ा खुश नजर आ रहा है। इसके पास लगता है, रुपये-पैसे भी काफ़ी हैं। तब फिर इसे कोई कष्ट नहीं होगा, न कोई चिन्ता इसी का एक कुर्ता और गद्दा माँग लिया जाए। तभी उसी समय एक भिखारी सेठ से भीख लेकर बिना उन्हें प्रणाम किए वहाँ से जाने लगा। बस, सेठ को गुस्सा आ गया। उसने उसे थप्पड़ मार दिया।

फिर उसे दी गई दान सामग्री उससे छीनकर उसे जूते से पीटकर भगा दिया। यह तमाशा देखकर मन्त्री मुँह बनाकर आगे बढ़ गए। फिर नदी किनारे एक जगह उन्होंने देखा कि एक आदमी मजाक्रिया गाने गाकर लोगों को हँसा रहा है। कोई आदमी ऐसी अदाओं से हँसा भी सकता है, मन्त्री को यह पता ही नहीं था। वे भी उसके हाव-भाव से ठठाकर हँसने लगे।

उन्होंने सोचा, ऐसे हंसोड़ आदमी के रहते हमारे लोग खाली हाथ क्यों लौट आए। उन्होंने अपने क़रीब खड़े एक व्यक्ति से पूछा, “यह आदमी कौन है?” उसने कहा, “यह अपना गोवरा नशेड़ी है। अभी आप इसे देख रहे हैं कि यह कितना खुशमिजाज है मगर शाम को शराब पीने के बाद इसका हुल्लड़ और उत्पात शुरू हो जाता है।

इसकी हरकतों से मुहल्लेवालों का जीना मुहाल हो गया है।” यह सुनकर मन्त्री बहुत निराश हुए। वे फिर से हर तरह से योग्य व्यक्ति की खोज में चल पड़े। दिनभर की तलाश के बाद मन्त्री थककर घर लौट आए। वह प्रतिदिन उस व्यक्ति को ढूँढ़ने निकलते और शाम को निराश होकर घर लौट आते। वे लगभग निराश हो चुके थे।

अचानक अगले दिन उन्होंने एक पेड़ के नीचे एक बूढ़े को ठहाके लगाते देखा। उस आदमी के बाल बढ़ गए थे। चेहरे की दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी। उसका पूरा शरीर सूखकर रस्सी की तरह ऐंठ गया था। मन्त्री ने पूछा, “तुम इस तरह हँस क्यों रहे हो? उसने कहा, “क्यों नहीं हैं? यह दुनिया लगातार घूम रही है, पेड़ के पत्ते झड़ते जा रहे हैं, मैदान छास से भरते जा रहे हैं, धूप निकल रही है, पानी भी बरसने लगता है, चिड़िया आकर पेड़ों पर बसेरा लेती हैं, फिर सब उड़ भी जाती हैं।

यह सब आँखों के सामने दीखता रहता है, इसलिए हंसी भी आ जाती है। मन्त्री ने कहा, “खैर, यह सब तो समझ गया, लेकिन सिर्फ इस तरह बैठकर हँसते रहने से तो काम नहीं चलता। तुम क्या कोई काम-धाम नहीं करते फ़क़ीर बोला, “क्यों नहीं करता? सुबह नदी की ओर जाता हूँ, वहाँ नहा-धोकर लोगों को आते-जाते देखता हूँ, उनकी बातें सुनता हूँ, यह सब तमाशा देखकर फिर अपने इस पेड़ के नीचे आकर बैठ जाता हूँ।

इसके बाद जिस दिन खाना मिल जाता है, खा लेता हूँ। जिस दिन नहीं मिलता, भूखा रह जाता हूँ। जब घूमने की इच्छा करती है, घूमने चल पड़ता हूँ, जब सोने की इच्छा होती है, सो जाता हूँ कोई चिन्ता-भावना, उठा पटक, किसी से कोई मतलब नहीं बड़ा मजा है।

मन्त्री सिर खुजलाते हुए बोले, “जिस दिन खाने को नहीं मिलता, उस दिन क्या करते हो?” फ़क्क़ीर बोला, “उस दिन तो कोई झंझट ही नहीं। चुपचाप बैठा-बैठा दुनिया का तमाशा देखता रहता हूँ। बल्कि जिस दिन खाने को मिल जाता है उस दिन ज़्यादा झमेला करना पड़ता है। भात सानो, उसका कौर बनाओ, उसे मुँह में डालो, चवाओ, निगलो…इसके बाद पानी पियो, कुल्ला करो, हाथ-मुँह पोंछो, कितना कुछ करना पड़ता है।” मन्त्री ने देखा कि इतने दिनों बाद जाकर अब सही व्यक्ति मिला है।

उन्होंने कहा, “अपने पहनने का एक आघ कपड़ा दे सकते हो? इसके लिए तुम जितने पैसे चाहो में दे सकता हूँ।” 1 यह सुनकर वह व्यक्ति थड़े जोर से हंसा बोला, “कपड़े ?… अभी उस दिन एक आदमी ने मुझे एक चादर दी थी, उसे एक भिखारी को दे दिया। कपड़े- वपड़े के चक्कर में मैं कभी पड़ता नहीं।” मन्त्री ने कहा, “तुमने तो मुझे मुश्किल में डाल दिया।

किसी तरह एक आदमी मिला भी तो उसके बदन पर कपड़ा नहीं। खैर, कोई बात नहीं। तुम अपना गद्दा ही मुझे दे दो। इसके लिए जितने पैसे तुम चाहो मुझसे ले लो। फकीर हँसते-हँसते लोटपोट हो गया। काफ़ी देर तक हंसने के बाद वह बोला, “चालीस साल से मैंने बिस्तर के बारे में जाना ही नहीं, और तुम मुझसे गद्दा माँगते हो?” मन्त्री बड़े आश्चर्य से बोले, “तुम भी खूब हो।

न कपड़ा पहनते हो, न रजाई, कम्बल, विस्तार रखते हो। तुम बीमार वीर नहीं पड़ते।” फ़क़ीर बोला, “बीमारी क्या चीज होती है? जो लोग बीमारी के बारे में सोचते रहते हैं, ये ही बीमार पड़ते हैं। बीमारी उन्हें ही दबोचती है।” यह कहकर उसने पेड़ से टेक लगाई और पैर फैलाकर फिर से हँसने लगा। मन्त्री हताश होकर वापस लौट आए। उनके आने की खबर राजा तक पहुँची। राजा ने मन्त्री को बुला भेजा। मन्त्री ने पास जाकर सारी कहानी सुना दी। सब सुनकर राजा ने मन्त्री से कहा, “ठीक है, अब आप घर जाएँ।

राजमहल में लोग फिर से चिन्ता में डूब गए। अब क्या किया जाए? इलाज से कोई फ़ायदा हुआ नहीं। बड़ी मुश्किल से जो एक उपाय हाथ लगा, वह भी निकल गया।। सभी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे, फिर गहरी साँस लेकर बोले, “अब राजा को बचाने की कोई सूरत नजर नहीं आती।

उधर राजा भी बैठे-बैठे सोच रहे थे, “मैं राजा हूँ। कितने सुख से रहता हूँ। अच्छा से अच्छा खाना खाता हूँ। किसी चीज़ की कमी नहीं। लोग हर समय मेरा खयाल रखते हैं। इस पर भी मुझे बीमारी लग गई। और इस फ़क़ीर को देखो, जिसका न कोई आगे है न पीछे, जिसके बदन पर कपड़े नहीं, सोने के लिए बिस्तर नहीं, सिर्फ़ पेड़ के नीचे पड़ा रहता है, जो मिल जाता है, खा लेता है-ऐसा आदमी कहता है कि भला बीमारी क्या चीज है?

यह फ़क़ीर होकर बीमारी की परवाह नहीं करता और मैं राजा होकर बीमारी से डरता हूँ। छिः दूसरे ही दिन राजा ने सुबह उठने के बाद अपने खास दरबारियों को बुलाकर कहा, “तुम सब के सब बेवकूफ़ और निकम्मे हो। तुम लोगों से कुछ करते नहीं बना। लेकिन देखो, अपनी बीमारी मैंने खुद ही ठीक कर ली है। आज से मैं फिर से पहले की तरह दरबार में बैठूंगा, और जो जरा भी बेअदबी करेगा, उसकी गर्दन उड़ा दूँगा।

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जल्दी बुलाकर लाओ | Jaldi Bulakar Lao Story In Hindi

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Jaldi Bulakar Lao Story In Hindi

Jaldi Bulakar Lao Story In Hindi- बादशाह अकबर एक सुबह उठते ही अपनी दाढ़ी खुजलाते हुए बोले, “अरे, कोई है? तुरन्त एक सेवक हाजिर हुआ। उसे देखते ही बादशाह बोले, “जाओ, जल्दी बुलाकर लाओ, फौरन हाजिर करो। सेवक की समझ में कुछ नहीं आया कि किसे बुलाकर लाए, किसे हाजिर करे? बादशाह से पलटकर सवाल करने की तो उसकी हिम्मत ही नहीं थी।

Jaldi Bulakar Lao Story In Hindi

उस सेवक ने यह बात दूसरे सेवक को बताई। दूसरे तीसरे को और तीसरे ने चौथे को। इस तरह सभी सेवक यह बात जान गए और सभी उलझन में पड़ गए कि किसे बुलाकर लाएँ, किसे हाजिर करें। बीरबल सुबह घूमने निकले थे। उन्होंने बादशाह के निजी सेवकों को भाग-दौड़ करते देखा तो समझ गए कि जरूर बादशाह ने कोई अनोखा काम बता दिया होगा, जो इनकी समझ से बाहर है।

उन्होंने एक सेवक को बुलाकर पूछा, “क्या बात है? यह भाग-दौड़ किसलिए हो रही है? “सेवक ने बीरबल को सारी बात बताई, ‘बीरबलजी! हमारी रक्षा करें। हम समझ नहीं पा रहे हैं कि किसे बुलाना है। अगर जल्दी बुलाकर नहीं ले गए, जाएगी।” तो हम पर आफत आ बीरबल ने पूछा, “यह बताओ कि हुक्म देते समय बादशाह क्या कर रहे थे?

बादशाह का निजी सेवक, जिसे हुक्म मिला था, उसे बीरबल के सामने हाजिर किया तो उसने बताया, “जिस समय मुझे तलब किया, उस समय तो बिस्तर पर बैठे अपनी दाढ़ी खुजला रहे थे। बीरबल तुरन्त सारी बात समझ गए और उनके होंठों पर मुस्कान उभर आई। फिर उन्होंने उस सेवक से कहा, “तुम हज्जाम को ले जाओ।

सेवक हज्जाम को बुला लाया और उसे बादशाह के सामने हाजिर कर दिया। बादशाह सोचने लगे, “मैंने इसे यह तो बताया ही नहीं था कि किसे बुलाकर लाना है। फिर यह हज्जाम को लेकर कैसे… हाजिर हो गया? ‘बादशाह ने सेवक से पूछा, “सच बताओ। हज्जाम को तुम अपने मन से लाए हो या किसी ने उसे ले आने का सुझाव दिया था?

सेवक घबरा गया, लेकिन बताए बिना भी तो छुटकारा नहीं था। बोला, “बीरबल ने सुझाव दिया था, जहाँपनाह! “बादशाह बीरबल की बुद्धि पर खुश हो गए।

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सबसे बड़ी चीज | Sabse Badi Chij Story In Hindi

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Sabse Badi Chij Story In Hindi

Sabse Badi Chij Story In Hindi- एक दिन बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं थे। ऐसे में बीरबल से जलने वाले सभी सभासद बीरबल के खिलाफ अकबर के कान भर रहे थे। अकसर ऐसा ही होता था, जब भी बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं होते थे, दरबारियों को मौका मिल जाता था। आज भी ऐसा ही अवसर था।

Sabse Badi Chij Story In Hindi

बादशाह के साले मुल्ला दो प्याजा की शह पाए कुछ सभासदों ने कहा, “जहाँपनाह! आप वास्तव में बीरबल को आवश्यकता से अधिक मान देते हैं, हम लोगों से ज्यादा उन्हें चाहते हैं। आपने उन्हें बहुत सिर चढ़ा रखा है। जबकि जो काम वे करते हैं, वह काम हम भी कर सकते हैं। मगर आप हमें मौका ही नहीं देते।

बादशाह को बीरबल की बुराई अच्छी नहीं लगती थी, उन्होंने उन चारों की परीक्षा लेने हेतु कहा, “देखो, आज बीरबल तो यहाँ हैं नहीं और मुझे अपने एक सवाल का जवाब, चाहिए। यदि तुम लोगों ने मेरे प्रश्न का सही-सही जवाब नहीं दिया तो मैं तुम चारों को फाँसी पर चढ़वा दूँगा।

बादशाह की बात सुनकर वे चारों घबरा गए। उनमें से एक ने हिम्मत करके कहा, “प्रश्न बताइए बादशाह सलामत ? “संसार में सबसे बड़ी चीज़ क्या है? और अच्छी तरह सोच-समझकर जवाब देना, वरना मैं कह चुका हूँ कि तुम लोगों को फाँसी पर चढ़वा दिया जाएगा।” बादशाह अकबर ने कहा, “अटपटे जवाब हरगिज नहीं चलेंगे। जवाब एक हो और बिल्कुल सही हो।

“बादशाह सलामत ! हमें कुछ दिनों की मोहलत दी ।” उन्होंने सलाह करके कहा।”ठीक है, तुम लोगों को एक सप्ताह का समय देता हूँ।” बादशाह ने कहा। चारों दरबारी चले गए और दरबार से बाहर आकर सोचने लगे कि सबसे बड़ी चीज क्या हो सकती है?

एक दरबारी बोला, “मेरी राय में तो अल्लाह से बड़ा कोई नहीं। ‘अल्लाह कोई चीज़ नहीं है। कोई forty four उत्तर सोचो। दूसरा “सबसे बड़ी चीज़ है भूख, जो आदमी से कुछ भी करवा देती है।” तीसरे ने कहा। “नहीं…नहीं, भूख भी बरदाश्त की जा सकती है। ” “फिर क्या है सबसे बड़ी चीज़?

छः दिन बीत गए, लेकिन उन्हें कोई उत्तर नहीं सूझा। हार कर वे चारों बीरबल के पास पहुँचे और उसे पूरी घटना कह सुनाई, साथ ही हाथ जोड़कर विनती की कि प्रश्न का उत्तर बता दें। बीरबल ने मुस्कराकर कहा, दूँगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। “मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर

“हमें आपकी हजार शर्तें मंजूर हैं।” चारों ने एक स्वर में कहा, “बस आप हमें प्रश्न का उत्तर बताकर हमारी जान बख्शी करवाएँ। बताइए आपकी क्या शर्त है? तुम में से दो अपने कन्धे पर मेरी चारपाई रखकर दरबार तक ले चलोगे। एक मेरा हुक्का पकड़ेगा, एक मेरे जूते लेकर चलेगा।” बीरबल ने अपनी शर्त बताते हुए कहा ।

यह सुनते ही चारों सन्नाटे में आ गए। उन्हें लगा बीरबल ने उनके गाल पर कसकर तमाचा मार दिया हो। मगर वे कुछ बोले नहीं। अगर मौत का खौफ़ न होता तो वे बीरबल को मुँहतोड़ जवाब देते, मगर इस समय मजबूर थे, अतः तुरन्त राजी हो गए।

दो ने अपने कन्धों पर बीरबल की चारपाई उठाई, तीसरे ने उनका हुक्का और चौथा जूते लेकर चल दिया। रास्ते में लोग आश्चर्य से उन्हें | देख रहे थे। दरबार में बादशाह ने भी वह मंजर देखा और मौजूद दरबारियों ने भी। कोई कुछ न समझ सका। तभी बीरबल बोले, “महाराज! दुनिया में सबसे बड़ी चीज़ है गरज। अपनी गरज से ये पालकी यहाँ तक उठाकर लाए हैं। ‘बादशाह मुस्कराकर रह गए। वे चारों सिर झुकाकर एक ओर खड़े हो गए।

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दाढ़ी पकड़ने की सजा | Dadhi Pakdne Ki Saja Story In Hindi

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Dadhi Pakdne Ki Saja Story In Hindi

Dadhi Pakdne Ki Saja Story In Hindi- बादशाह अकबर एक दिन दरबार में पधारे और सिंहासन पर विराजमान होते ही उन्होंने दरबारियों से कहा, “आज एक शख्स ने मेरी दाढ़ी खींची है। कहिए, मैं उसे क्या सज़ा दूँ? यह सुनकर सभी दरबारी हैरान हुए और सोचने लगे कि किसने ऐसी गुस्ताख़ी की? आखिर किसकी मौत आई है, जो ऐसी जुर्रत कर बैठा। वे परस्पर कानाफूसी करने लगे।

Dadhi Pakdne Ki Saja Story In Hindi

थोड़ी देर बाद एक दरबारी बोला, “जहाँपनाह! जिसने ऐसा दुस्साहस किया है, उसका सिर धड़ से उड़ा दिया जाए।” दूसरे दरबारी ने कहा, “मेरी राय है जहाँपनाह कि ऐसी गुस्ताख़ी करने वाले को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया “जाए।” किसी ने कहा उस पर कोड़े बरसाए जाएँ, किसी ने कहा कि उसे जिन्दा दीवार में चिनवा दिया जाए। जितने दरबारी, उतनी तरह की बातें। तरह-तरह की सज़ाएँ सुझाई गईं।

उनकी बातें सुनकर बादशाह ऊब गए। अन्त में उन्होंने बीरबल से कहा, “बीरबल, तुम क्या कहते हो? हमारी दाढ़ी खींचने वाले को हमें क्या सजा देनी चाहिए ? “बीरबल मंद-मंद मुस्कराए और बोले, “जहाँपनाह! आप उसे प्यार से मिठाई खिलाइए। इस अपराध की यही सज़ा है।” बीरबल का उत्तर सुनकर सारे दरबारी चौंके और उस अंदाज में बीरबल का चेहरा देखने लगे, मानो वे पगला गए हों।

जबकि वीरबल के उत्तर से खुश होकर बादशाह ने कहा, “वाह वाह! बीरबल, तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। लेकिन यह तो बताओ कि मेरी दाढ़ी किसने खींची होगी? “बीरबल ने कहा, “जहाँपनाह! छोटे शहज़ादे के अलावा ऐसी हिम्मत कौन कर सकता है? उसने तो प्यार से ही ऐसा किया होगा! इसलिए उसे सज़ा में मिठाई खिलानी चाहिए।

बीरबल की बात सही थी। आज सुबह शहज़ादा बादशाह की गोद में बैठा था। खेलते-खेलते उसने बादशाह की दाढ़ी खींची थी। चतुर बीरबल के जवाब से बादशाह खुश हुए। अन्य सभी दरबारियों के सिर शर्म से झुक गए, जो इतना भी नहीं सोच पाए कि बाहर का कोई शख्स भला बादशाह की दाढ़ी कैसे खींच सकता है।

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खाने के बाद लेटना | Khane Ke Bad Letna Story In Hindi

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Khane Ke Bad Letna Story In Hindi

Khane Ke Bad Letna Story In Hindi- किसी समय बीरबल ने अकबर को यह कहावत सुनाई थी कि ‘खाकर लेट जा और मारकर भाग जा’ यह संयाने लोगों की पहचान है। जो लोग ऐसा करते हैं, ज़िन्दगी में उन्हें किसी भी प्रकार का दुःख नहीं उठाना पड़ता। एक दिन अकबर को अचानक ही बीरबल की यह कहावत याद आ गई।

Khane Ke Bad Letna Story In Hindi

दोपहर का समय था। उन्होंने सोचा, बीरबल अवश्य ही खाना खाने के बाद लेटता होगा। आज हम उसकी इस बात को गलत सिद्ध कर देंगे। उन्होंने एक नौकर को अपने पास बुलाकर पूरी बात समझाई और बीरबल के पास भेज दिया। नौकर ने अकबर का आदेश बीरबल को सुना दिया।

वीरबल बुद्धिमान तो थे ही, उन्होंने समझ लिया कि बादशाह ने उसे क्यों तुरंत आने के लिए कहा है। इसलिए बीरबल ने भोजन करके नौकर से कहा, “ठहरो, मैं कपड़े बदलकर तुम्हारे साथ ही चल रहा हूँ। “उस दिन बीरबल ने पहनने के लिए चुस्त पाजामा चुना। पाजामे को पहनने के लिए वह कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेट गए।

पाजामा पहनने के बहाने वे काफी देर बिस्तर पर लेटे रहे। फिर नौकर के साथ चल दिए। जब बीरबल दरबार में पहुँचे तो अकबर ने कहा, “कहो बीरबल, खाना खाने के बाद आज भी लेटे या नहीं?” “बिल्कुल लेटा था जहाँपनाह ।

बीरबल की बात सुनकर अकबर ने क्रोधित स्वर में कहा, 44 ‘इसका मतलब, तुमने हमारे हुक्म की अवहेलना की है। हम तुम्हें हुक्म उदूली करने की सज़ा देंगे। जब हमने खाना खाकर तुरन्त बुलाया था, तो फिर तुम लेटे क्यों?”

44 ‘बादशाह सलामत! मैंने आपके हुक्म की अवहेलना कहाँ की है? मैं तो खाना खाने के बाद कपड़े पहनकर सीधा आपके पास ही आ रहा हूँ। आप चाहें तो पैगाम ले जाने वाले से पूछ सकते हैं। अब ये अलग बात है कि ये चुस्त पाजामा पहनने के लिए ही मुझे लेटना पड़ा था।” बीरबल ने सहज भाव से उत्तर दिया।

अकबर बादशाह बीरबल की चतुरता को समझ गए और मुस्कुरा पड़े।

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