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देखना है, ऊंट किस करवट बैठता है | Dekhna Hai, Unt Kis Karvat Baithta Hai Story In Hindi

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Dekhna Hai, Unt Kis Karvat Baithta Hai Story In Hindi

Dekhna Hai, Unt Kis Karvat Baithta Hai Story In Hindi- एक गांव में सात दिन बाद हाट लगती थी सब्जी, दाल, अनाज, कपड़े आदि घर-गृहस्थी का सभी सामान बिकने आता था। आस-पास के गांवों के लोग भी सामान लेने आते थे। हाट में दुकानदार अपना सामान बैलगाड़ियों, खच्चरों, ऊंटों आदि से लाते थे। आस-पास के दुकानदार छोटा-मोटा सामान अपने सिर पर ही रखकर लाते थे।

Dekhna Hai, Unt Kis Karvat Baithta Hai Story In Hindi

एक ही गांव से एक कुंजड़ा और कुम्हार भी अपना सामान हाट में ले जाते थे। कुंजड़ा फल-सब्जिया आदि ले जाता था और कुम्हार अपने मिट्टी के बरतन इनको सामान का भाड़ा इतना देना पड़ता था कि मुनाफा बहुत कम रह जाता था उसी गांव में एक ऊंटवाला भी था जो हाट में दुकानदारों का सामान लाता ले जाता था।

कुंजड़ा और कुम्हार ने तय किया कि हम अपना सामान ऊंट से ले चलते हैं। जो किराया आएगा, उसको आधा-आधा करके दे देंगे। चचत देखकर दोनों तैयार हो गए। उन्होंने अपने गांव का ही ऊंट तय कर लिया और हाट के दिन एक ओर कुम्हार ने अपने बरतन लादे और दूसरी ओर कुंजड़े ने अपनी सब्जियां लादीं। दोनों हाट को चल दिए। ऊंटवाला रस्सी पकड़े आगे-आगे जा रहा था और ये दोनों साथ-साथ चल रहे थे।

ऊंट ने एक बार अपनी गरदन पीछे की ओर घुमाई, तो उसे सब्जी के पत्ते लटकते दिखाई दिए। ऊंट भूखा था। ऊंट की डोरी लंबी थी, इसलिए ऊंट ने पीछे गरदन करके सब्जी के कुछ पत्ते मुंह में ले लिया और खा गया। यह देखकर कुंजड़ा मन-ही-मन दुखी हुआ जब ऊंट ने दोबारा सब्जियों के पत्तों में मुंह मारा तो ऊंटवाले से कुंजड़े ने कहा, “ऊंटवाले भैया, डोरी जरा खींचकर रखो। ऊंट सब्जियों में मुंह मार रहा है।

“ऊंटवाला बोला, “अच्छा भैया, ध्यान रखूंगा।” लेकिन ऊंटवाले के ध्यान रखने के बाद भी ऊंट सब्जियों में से कुछ-न-कुछ खींच लेता था कुम्हार कुंजड़े का नुकसान देखकर मजाक उड़ाने लगा। शुरू में तो दोनों ओर बराबर वजन के सामान थे, बल्कि घोड़ा सब्जियों का ही भार अधिक था। कुंजड़े को अब लगने लगा था कि हाट पहुंचते-पहुंचते सब्जियां कम हो जाएंगी।

ऊंट ने एक बार फिर सब्जियों में मुंह मारा, तो कुम्हार हंस दिया। कुम्हार के हंसने पर कुंजड़े ने कहा, “देखना हैं, ऊंट किस करवट बैठता है? “कुंजड़े की बात सुनकर कुम्हार हंस दिया, और कुंजड़े की ही बात को दोहरा दिया, “देखते हैं, ऊंट किस करवट बैठता है ऊंट के बार-बार सब्जियों में मुंह मारते रहने के कारण इस ओर का वजन कम होता जा रहा था।

धीरे-धीरे बरतनों का झुकाव नीचे की ओर बढ़ने लगा। यह देखकर कुम्हार का मजाक करना बंद हो गया। अब कुम्हार मन-ही-मन चिंतित होने लगा और सोचने लगा कि ऊंट किस करवट बैठता है। जब ऊंट हाट में पहुंचा, तो उन्होंने सामान लगाने की जगह पर ऊंट को बैठाया। चूंकि बरतनों का वजन भारी था, इसलिए ऊंट उसी करवट बैठा। कुम्हार के तमाम बरतन टूट गए। कुंजड़ा व्यंग्य भरी नजरों से कुम्हार को देखकर कहता है-‘देखना है, ऊंट किस करवट बैठता है?”

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बोले सो कुंडी खोले | Bole So Kundi Khole Story In Hindi

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Bole So Kundi Khole Story In Hindi

Bole So Kundi Khole Story In Hindi- एक दो मंजिले मकान में कई किराएदार थे। मुख्य दरवाजा रात के लगभग ग्यारह बजे तक खुला रहता या इस समय तक कुछ लोग जागते रहते और कुछ लोग सो जाते थे। सर्दियों का समय था। जोर की सर्दी पड़ रही थी। रात के करीब डेढ़ बजे थे। हरभजन दरवाजे पर आवाज लगाने लगा। कुछ देर बाद जब दरवाजा नहीं खुला, तो कुंडी खटखटाने लगा। दो परिवार नीचे रहते थे और तीन परिवार ऊपर पांचों परिवार के लोग जाग गए थे, लेकिन कोई दरवाजा खोलने को तैयार नहीं था।

Bole So Kundi Khole Story In Hindi

कृष्णकांत नीचे रहता था। उससे अधिक देर तक खट-खट की आवाज सुनी नहीं गई। उसने लेटे-लेटे ही आवाज दी, “कौन है हरभजन ने आवाज दी, “में हूं। दरवाजा खोल” हरभजन का परिवार पहली मंजिल पर था। उसक सड़का और लड़के की बहु, दोनों जाग रहे थे। लड़के को बुरा लग रहा था कि मेरा बाप खड़ा खड़ा चिल्ला रहा है।

वह किवाड़ खोलने के लिए जैसे ही उठा, उसकी औरत ने रोक लिया और कहा, कहां जा रहे हो। कोई-न-कोई खोल ही देगा।” फिर वे दोनों बातें करने लगे। पहली मंजिल पर दूसरा परिवार कायस्थ परिवार । उसका भी पूरा परिवार जाग गया था। उसकी पत्नी ने कहा, “दरवाजा खोल आओ कैसे जोर-जोर से कोई कुंडी बजा रहा है।

मुन्ना जाग गया, तो उसे “उसके परिवार वाले खोलेंगे में क्यों खोलू” इतना कहकर कायस्थ लेट गया। इसी मंजिल पर तीसरे कमरे में चार लड़के रहते थे। वे भी जाग रहे थे। उनमें से एक बोला, “साले को ऊपर से पानी डालकर भिगोता हूं। “दूसरा बोला, “यार चुप-चाप सो जा क्यों लड़ाई करवाना चाहता है? साले को चिल्लाने दो।

“तीसरा बोला, “कृष्णकांत ने आवाज लगाई थी। साला वही खोलेगा ।” अब वह कृष्णकांत का नाम ले-लेकर आवाजें लगाने लगा था। कृष्णकांत के बगल के कमरे में एक लाला रहता था। वह थका-हारा आया था और ऐसे सो रहा था, जैसे वह घोड़े बेचकर सो रहा हो।

जब देर तक वह कृष्णकांत का नाम लेकर आवाजें लगाता रहा, तो आस-पड़ोस के लोग भी जाग गए। पड़ोसियों ने भी कृष्णकांत का नाम लेकर आवाजें लगाना शुरू कर दिया। अब तो उसे उठना ही पड़ा। अब कृष्णकांत सोचता रहा कि मैंने बेकार में आवाज लगा दी। उसके परिवार के लोगों में से कोई नहीं बोला। इस मकान में से कोई भी तो नहीं बोला।

मुझे बोलने की क्या जरूरत थी? जब बाहर लोग मेरा नाम लेकर पुकार रहे हैं। मुझे ही उठना पड़ा। अब में कभी आवाज नहीं दूंगा। यह सोचते हुए कृष्णकांत ने कुंडी खोली। हरभजन अंदर आया और ऊपर चला गया। कृष्णकांत कुंडी लगाकर बड़बड़ाता हुआ आया और बिस्तर पर लेटते हुए बोला, अच्छा जमाना आ गया-‘बोले सो कुंडी खोले’ ।

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चोर की दाढ़ी में तिनका | Chor Ki Dadhi Me Tinka Story In Hindi

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Chor Ki Dadhi Me Tinka Story In Hindi

Chor Ki Dadhi Me Tinka Story In Hindi- एक काजी का फैसला सुनाने के मामले में दूर-दूर तक नाम था। यह कोशिश यही करता था कि किसी बेगुनाह को सजा न हो। कोई-कोई मुकदमा ऐसा आता था, जिसमें वह अपनी बुद्धि का बहुत अच्छा परिचय देता था।

Chor Ki Dadhi Me Tinka Story In Hindi

इसी प्रकार का एक मुकदमा उसके यहां आया। चोरी के शक में चार आदमियों को इजलास में हाजिर किया गया था। गवाहों के बयान सुनने के बाद और सबूतों को देखने-समझने के बाद असली चोर का निर्णय नहीं कर पा रहा था। फिर भी वह असली चोर को जानने के लिए लगातार सोचे जा रहा था। चोर की कमजोरियों और आदतों के बारे में सोचने लगा।

वह जानता था कि चोर डरपोक होता है और उसे हमेशा इस बात का डर बना रहता है कि उसको पहचान न लिया जाए। काजी ने ये सारी बातें सोचकर शक में लाए गए मुजरिमों को गौर से देखा। एक-एक चेहरे पर नजर गड़ाकर देखते रहे। अचानक एक उपाय उनके दिमाग में काँध गया। काजी ने देखा कि सब ही मुजरिमों की दाढ़ियां हैं। उसने एक तीर में तुक्का छोड़ा। मुजरिमों की ओर इशारा करते हुए काजी बोला, “चोर की दाढ़ी में तिनको।

“सबकी निगाहें उनकी दाड़ियों पर जा पहुंची। दरोगा की निगाहें भी उधर ही थीं। असली चोर ने सोचा कि कहीं मेरी दाढ़ी में तो तिनका नहीं है। यही सोचकर उसने दाढ़ी पर हाथ फेरा। दाढ़ी पर हाथ फेरते ही काजी ने कहा, “चोर यही है। इसे गिरफ्त में ले लो और बाकी सबको बाइज्जत छोड़ा जाता है।

“दरोगा उसे ले जाते हुए रास्ते में सोचता रहा कि किस तरह अंधेरे में तीर मारा और सीधा निशाने पर लगा चोर की दाढ़ी में तिनका’।

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जैसे को तैसा | Jaise Ko Taisa Story In Hindi

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Jaise Ko Taisa Story In Hindi

Jaise Ko Taisa Story In Hindi- पहले विवाह के संबंधों में लड़के-लड़कियों की पूरी छानवीन पड़ितों और नाइयों पर छोड़ दी जाती थी। लड़के को पक्का करने के लिए ‘पीली चिट्ठी’ और ‘लगन’ ले जाने का काम नाई ही करता था। एक व्यक्ति की लड़की तुतलाती थी। उसने अपनी लड़की के रिश्ते के लिए एक नाई से कह रखा था। उसी नाई के प्रयास से रिश्ते के लिए बात चली।

Jaise Ko Taisa Story In Hindi

पहले लड़की वाले लड़के को देखने गए। लड़का एक जरूरी काम से जा रहा था, इसलिए वह एक मिनट उनके बीच बैठा, नमस्ते की और चला गया। लड़का सुंदर था और कारोबार अच्छा था लड़के से संबंधित शेष जानकारी उस पक्ष के नाई और परिवार वालों से मिल गई।

जब लड़की को देखने वाले पहुंचे, तो लड़की पक्ष के नाई ने एक कमरे में बैठा दिया। बैठे लोगों को लड़की नाश्ते और चाय रखकर चली गई। शेष बातें लड़की के घर वालों तथा नाई से ज्ञात हुई। लड़की भी सुंदर और घरेलू कामों में होशियार थी। लड़के वाले का नाई स्थिति को समझ गया, लेकिन बोला नहीं। यह संबंध तय हो गया और वह समय भी आ गया जिस दिन वारात आनी थी।

वारातियों की खाना आदि खिलाने के बाद लड़का और लड़की विवाह मंडप में आए दोनों को देखकर लड़की और लड़के वाले खुश थे कि दोनों की जोड़ी बहुत सुंदर मिली है। भांवरे पड़ने के बाद दोनों बैठे ही थे कि लड़की की नजर सामने थोड़ी दूर पर जाती हुई दुमुंही पर पड़ी और वह घबराकर बोल पड़ी “तीला! तीला !!

“इतना सुनते ही लड़के ने अपने आस-पास देखा और उसके मुंह से निकला “तायं! तायं !!! सब लोगों की नजर जब दुमुंही पर पड़ी, तो पहले सब लोग भौंचक्के रह गए। फिर दोनों की तरफ के लोग ठहाका मारकर हंस पड़े। दूल्हा और दुल्हन, दोनों मुंह लटकाए धरती को देखते रहे।

कभी-कभी कनखियों से एक-दूसरे को देख लेते थे। लड़की वाले ने सोचा था कि मेरी लड़की तोतली है, लेकिन लड़का अच्छा मिला है। इसी प्रकार लड़के वाले ने सोचा था कि मेरा लड़का तोतला है, लेकिन लड़की ठीक मिली है। लेकिन ‘तीला-तीला तायं-तायं ने साबित कर दिया कि ‘जैसे को तैसा मिला।

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चार लट्ठ के चौधरी, पांच लट्ठ के पंच | Char Latth Ke Chaudhari, Panch Latth Ke Panch Story In Hindi

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Char Latth Ke Chaudhari, Panch Latth Ke Panch Story In Hindi

Char Latth Ke Chaudhari, Panch Latth Ke Panch Story In Hindi- एक दिन गांव में फौजदारी हो गई। जो कमजोर थे, वे बेचारे पिटे और गालियां खाई। मामला गांव के >मुखिया के पास गया, तो उन्होंने एक दिन पंचायत बुलाई और उसमें दोनों तरफ के लोगों को बुलाया। पंचायत में गांव के लगभग सभी लोग मौजूद थे। जब एक-एक करके दोनों ओर की बातों को सुना गया, तो उससे यह साफ मालूम पड़ रहा था कि गरीब परिवार के लोगों को बेमतलब पीटा गया है और गालियां दी गई हैं।

Char Latth Ke Chaudhari, Panch Latth Ke Panch Story In Hindi

जब पंचों ने ताकतवर परिवार के लोगों से पूछा, “बोलो, आप लोग क्या कहते हो इस पर उन लोगों ने कहा, “इसमें हम क्या कहते हैं? अदब नहीं करेगा, तो पिटेगा ही।” जब उस गरीब परिवार के लोगों से पूछा, तो उन्होंने कहा, “ऐसे तो कोई गरीब जिंदा ही नहीं रह सकता।

आप पंच लोग जैसा कहेंगे हम करने को तैयार हैं।” पंच लोगों ने बैठकर आपस में तय किया कि जिसने गलती की हो, उसे चेतावनी देना जरूरी है कि आइंदा इस तरह की गलती न करे। बाकी की गई गलती के लिए वह माफी मांगे। अंत में जब पंचों ने फैसला सुनाया, तो गलती करने वालों ने बिल्कुल उलटा किया। माफी मांगने की जगह उन्होंने कहा कि हम कुछ नहीं करेंगे। इतना कहकर वे सब उठकर चले गए और कहा, “जो कुछ हमारा करना चाहो, कर लो।

“पंच तथा मुखिया आदि लोग चिंतित हुए और गाँव के गरीब लोग भी सकते में आ गए। सब एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। पंचायत में एक अस्सी साल के बुजुर्ग बैठे हुए थे। उसने अनुभव किया कि पंच भी उस परिवार के व्यक्तियों से कम ताकतवर हैं। इसीलिए चौधरी भी चुपचाप बैठे हुए हैं।

न्याय दिलाने के लिए कोई भी व्यक्ति या सामूहिक तौर पर लोग उस ताकतवर परिवार से लड़ाई मोल नहीं लेना चाह रहा था। गांव में एक व्यक्ति को एक लाठी के बराबर गिना जाता है। सब स्थितियों को देखते हुए उस बुजुर्ग ने कहा चार लट्ठ के चौधरी, पांच लट्ठ के पंच । जाके घर में छह लठा, ताके अंच न पंच ॥

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अपने किए का क्या इलाज | Apne Kiye Ka Kya Elaj Story In Hindi

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Apne Kiye Ka Kya Elaj Story In Hindi

Apne Kiye Ka Kya Elaj Story In Hindi – गांव के किनारे एक किसान का घर था। घर के सामने ही उसके खेत थे। खेतों में गेहूं की पकी फसल खड़ी हुई थी। खेतों की रखवाली में पूरा परिवार रात-दिन लगा रहता था। कई साल बाद इतनी अच्छी फसल हुई थी। सभी लोग प्रसन्न थे। इस फसल के भरोसे किसान ने कई मनसुबे पूरे करने के विचार बना लिए थे।

Apne Kiye Ka Kya Elaj Story In Hindi

उसने गाय और बकरी के साथ मुर्गियां तथा बतखें भी पाल रखी थीं। मुगियों और बतखों के लिए घर के बाहर ही दरवे बना रखे थे दरवाजे पर ही गाय और बकरी बंधी रहती थीं घर के बाई ओर 1 एक छोटा तालाब था। मुर्गियां और बतखें तालाब तक डोलती रहती थीं। चुगती रहती थीं। बतखे पानी में तैरती भी थी।

पास में एक जंगल था उस जंगल की एक लोमड़ी किसान के घर तक चक्कर लगा जाती थी। एक दिन मौका पाकर किसान की एक मुर्गी को ले गई। किसान को बड़ा दुख हुआ। घर के सभी लोग चौकन्ने रहकर मुर्गियों और बतखों की देख-रेख करने लगे। लोमड़ी अब और जल्दी-जल्दी चक्कर लगाने लगी।

अब वह सुबह-झुटपुटे और दिन डूबे के अंधेरे में चक्कर लगाने लगी। मौका पाते ही कभी बतख को मार जाती और कभी मुर्गी को ले जाती। किसान ने लोमड़ी को पकड़ने और मारने के कई उपाय किए, लेकिन सफल नहीं हो सका। एक दिन उसने जाल फैलाकर लोमड़ी को पकड़ लिया। किसान ने उसे तड़पाकर मारने की सोची।

उसने लोमड़ी की पूंछ में फटे-पुराने कपड़ों को लपेटकर मिट्टी का तेल डाला और आग लगा दी। लोमड़ी के गले में रस्सी बांधकर एक खूंटे से बांध दिया था। पूंछ में आग लगते ही लोमड़ी उछल-कूद करने लगी। बच्चे हो-हो करके हंसने लगे। कभी-कभी लोमड़ी पीछे हटकर गले से फंदा निकालने की कोशिश करती।

उछल-कूद में रस्सी में आग लग गई। रस्सी टूट गई और लोमड़ी निकल भागी । लोमड़ी ने सबसे पहले पूंछ में लगी आग बुझाने की सोची। वह सामने ही किसान के खेत में घुस गई। वह आग बुझाने के लिए खेत में इधर से उधर और उधर से इधर अपनी पूंछ को पौधों से रगड़ती हुई भागती रही। दौड़ती रही।

देखते-ही-देखते सारा खेत धू-धूकर जलने लगा। खेत आग की लपटों से भर गया। एक-दो घंटे में किसान की लहलहाती फसल जलकर राख हो गई। किसान के घर में मातम सा छा गया। रात को सोते समय उसे नींद नहीं आई। वह लेटा लेटा सोचता रहा- ‘अपने किए का क्या इलाज’।

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जैसा करे वैसा पावे, पूत-भतार के आगे आवे | Jaisa Kare Vaise Pave, Put-Bhatar Ke Aage Aave Story In Hindi

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Jaisa Kare Vaise Pave, Put-Bhatar Ke Aage Aave Story In Hindi

Jaisa Kare Vaise Pave, Put-Bhatar Ke Aage Aave Story In Hindi- एक बुढ़िया ने सोचा था कि जब मेरी बहू आएगी तो कुछ काम नहीं करना पड़ेगा। बेटा-बहू, दोनों सेश >करेंगे। पति तो युवावस्था में ही खत्म हो गया था। फिर सोचा, में दादी बनूंगी और घर स्वर्ग बन जाएगा। बुढ़िया के लड़के की शादी हुई, दादी भी बनी, लेकिन उसका सोचा हुआ असली सपना साकार नहीं हुआ।

Jaisa Kare Vaise Pave, Put-Bhatar Ke Aage Aave Story In Hindi

बुढ़िया का लड़का सवेरे-सवेरे काम पर चला जाता था और पोता स्कूल चला जाता था। उसके बाद बहु बुड़िया के साथ मनमाना व्यवहार करती। उससे जूठे बरतन मंजवाती। पूरे घर में पोंछा लगवाली। अब उसे फूटी थाली में भोजन दिया जाता था। जब कुछ दिन बहू ने अपने पति और बच्चे के सामने बुढ़िया को फूटी वाली में भोजन दिया, तो पति ने विरोध किया।

उससे कहा-सुनी हुई। अब वह सबके सामने । अपनी सास को फूटी वाली में भोजन देने लगी और अपने पति के विरोध का सामना करती रही। कुछ दिन बाद बुढ़िया के लड़के ने विरोध करना छोड़ दिया। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता गया, अपनी दादी के प्रति मां के बढ़ते जुल्मों को देखता रहा।

समझदार होने पर जब उसका विरोध करता, तो उसकी भी झिड़की खानी पड़ती, लेकिन वह अपनी दादी के प्रति आदर और सहानुभूति रखता था वह मन से अनुभव करता था कि घर में दादी के साथ सही व्यवहार नहीं हो रहा है। कुछ साल इसी तरह बीतने के बाद दो चार दिन आराम के आए बुढ़िया के पोते की बहू आई।

जब घर में बहू आई, तो खुशी का वातावरण रहा। रिश्तेदारों के जाने के बाद बुढ़िया के फिर वही दिन आ गए। बुढ़िया से बरतन मंजवाना, बात-बात पर डांटती-डपटती और फूटी थाली में भोजन खिलाती। नई बहू यह सब छिप छिपकर देखती रहती। समय-समय पर दादी के बारे में अपने पति से पूछती रही। कभी-कभी पतोहू को ससुर से भी जानकारी मिल जाती थी।

कुछ दिन बाद बुढ़िया की बहू अपनी पतोहू से भी लड़ने लगी। अब पतोहू को भी पूरे दिन काम में लगाए रखती। कभी-कभी पतोहू बुढ़िया के बरतन मंजवाने में सहायता करती, तो बरस पड़ती और कहती, “तेरे लिए ढेरों काम है, अपना काम कर।” कभी-कभी पतोहू अपनी दादी-सास के आंसुओं को देखती, तो पिघल जाती और छिपकर बुढ़िया के पास बैठकर उसके दुख की कहानी सुनती।

एक बार बुढ़िया बीमार हुई, तो फिर उठी ही नहीं। आठ-दस दिन बीमार रहकर इस दुनिया से मुक्ति पा गई। अब वह पतोहू को भी पूरे दिन काम में लगाए रखती। जब पतोहू से मनमाना करने लगती, तो झगड़ा शुरू हो जाता। जब पतोहू ने देखा कि मेरी सास जैसे अपनी सास को खरी-खोटी सुनाती थी, उसी तरह मुझे भी खरी-खोटी सुनाने लगी है, तो उससे रहा न गया।

वह भी लड़ने लगी और उससे उसी तरह का व्यवहार करने लगी, जैसा वह अपनी सास के साथ व्यवहार करती थी। अब पतोहू अपनी सास से झाडू लगवाती और बरतन मंजवाती। उसके बाद पतोहू उसी फूटी हुई थाली में खाना परोसकर देने लगी, जिसमें उसकी सास दादी सास को खाना देती थी।

शुरू में जब पतोहू ने सास को फूटी थाली में खाना दिया, तो पतोहू के ससुर और पति ने विरोध किया। पतोहू ने जवाब देते हुए कहा, “जब वह अपनी सास को इस फूटी थाली में भोजन कराती थी, तब तो आप दोनों के मुंह सिल गए थे। कोई कुछ नहीं बोलता था। कितनी सीधी मेरी दादी-सास थी, उसके साथ इसने कैसा व्यवहार किया। उसके आगे तो यह कुछ भी नहीं है।

अब क्यों आप लोग इसकी पैरवी कर रहे हैं? कोई भी कुछ नहीं बोला। अब सास भी जानती थी कि यदि कुछ पतोहू से कहा, तो मार-पीट भी कर देगी। अब पतोहू से कोई कुछ नहीं कहता था। ससुर का बुढ़ापा था। वह अपनी बूढ़ी पत्नी के साथ इस प्रकार का व्यवहार होते देख नहीं पाता था। उसे गुस्सा आ जाता, तो कुछ-का-कुछ बक देता था।

जब पतोहू जवाब दे देती थी, तो चुप हो जाता था जब ससुर भी ज्यादा बोलने लगा, तो उनके साथ भी सास जैसा व्यवहार होने लगा। कभी-कभी एकांत में बैठकर सास-ससुर अपने सुख-दुख की कहानियां याद कर लेते थे और दोनों ही सोचते थे ‘जैसा करे वैसा पावे, पूत-भतार के आगे आवे।’

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सीख ताको दीजिए, जाको सीख सुहाय | Sikh Tako Dijiye, Jako Sikh Suhay Story In Hindi

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Sikh Tako Dijiye, Jako Sikh Suhay Story In Hindi

Sikh Tako Dijiye, Jako Sikh Suhay Story In Hindi- जंगल में खार के किनारे एक बबूल का पेड़ था। उसमें लगे पीले फूल महक रहे थे। आसमान में चारों और बादल छाए हुए थे। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। मोसम बड़ा सुहावना था। इसी बबूल की एक पतली डाल खार में लटकी हुई थी। इसी डाल पर बिल्कुल आखिर में बया पक्षी का एक घोंसला था। इसी घोंसले पर बया और बयी दोनों झूल रहे थे और मौसम का आनंद ले रहे थे।

Sikh Tako Dijiye, Jako Sikh Suhay Story In Hindi

बबूल के पास ही सहिजन का पेड़ था, जो हवा के झोंकों में झूम रहा था। बादल तो छाए थे ही, देखते-ही-देखते विजली चमकने लगी। बादल गरजने लगे और मोर-मोरनियों के नृत्य ‘पीकां-पीका’ की आवाज से सारा जंगल भर गया। टिटहरियां भी आकाश में आवाज करती हुई उड़ने लगी। बड़ी-बड़ी बूँदें भी गिरने लगीं और थोड़ी देर में मूसलाधार बरसात होने लगी।

इसी बीच एक बंदर सहिजन के पेड़ पर आकर बैठ गया। उसने पेड़ के पत्तों से छिपकर बचने की बहुत कोशिश की, लेकिन बच नहीं सका। पेड़ पर बैठा-बैठा भीगता रहा। बंदर सोच रहा था कि जल्दी से जल्दी वर्षा रुके, लेकिन ठीक उलटा हुआ ओले गिरने शुरू हो गए। हवा और तेज चलने लगी सदी हो गई।

बंदर ठंड से कांपने लगा और जोर-जोर से किकियाने लगा। वातावरण अजीब-सा गंभीर हो गया बंदर की इस हालत को देखकर क्या पक्षी से रहा न गया और बोला पाकर मानुस जैसी काया, ढूंढ़त घूमो छाया। चार महीने वर्षा आवै, पर न एक बनाया ॥

बंदर ने बया पर तिरछी नजर डाली पर बया पर घूरने का कोई असर नहीं पड़ा क्या सोचता था कि बंदर मेरा क्या बिगाड़ेगा घोंसला इतनी पतली टहनी पर है कि मुझ तक आ पाना उसकी ताकत के 1 बाहर की बात है। बया ने बंदर को फिर समझाया, “हम तो छोटे जीव हैं, फिर भी घोसला बनाकर रहते हैं। तुम तो मनुष्य के पूर्वज हो।

तुम्हारे वंशज जब घर बनाकर रहते हैं, तो तुम्हें भी कम-से-कम चौमासे के लिए तो कुछ-न-कुछ बनाकर रहना ही चाहिए। कहीं उप्पर ही डाल लेते। क्या की इतनी बात सुनते ही बंदर बुरी तरह बिगड़ गया। उसने आव देखा न ताव, उछाल मारकर बबूल के पेड़ पर आ गया। कांटों को बचाते हुए उसने उस पतली टहनी को जोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया, जिस पर क्या पक्षी का घोंसला था।

घोलला उलटा-सीधा होते देखकर वे उड़कर सहजन के पेड़ पर बैठ गए। बंदर ने टहनी तोड़कर ऊपर खींच ली घोंसला हाथ में आते ही बंदर ने नोच-नोच कर तोड़ दिया और टहनी सहित घोंसले को नीचे फेंक दिया नीचे खार में वर्षा का पानी तेजी से वह रहा था घोंसला और टहनी उसी में बहे चले गए।

नर बया और मादा बयी, दोनों पूरे दुख के साथ पानी में भीगते रहे। उन्हें बड़ा ही खेद हो रहा था। सामने हरे-भरे और लहलहाते टीले पर एक छोटी-सी कुटिया थी। उसके बाहर बैठा एक संत स्वभाव का व्यक्ति माला फेर रहा था। यह सब नाटक वह बड़े ध्यान से देख रहा था। बया और बयी पर उसे तरस जाने लगा और उसके मुंह से अचानक निकल पड़ा ‘सीख ताको दीजिए, जाको सीख सुहाय। सीख न दीजे बांदरे, बया का भी पर जाय ॥”

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न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी | Na Rahega Bans Na Bajegi Bansuri Story In Hindi

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Na Rahega Bans Na Bajegi Bansuri Story In Hindi

Na Rahega Bans Na Bajegi Bansuri Story In Hindi- कृष्ण बचपन में बहुत नटखट थे। इनको बचपन से ही बांसुरी बजाने की लगन थी। ग्वाले रोजाना गायें चराने जाते थे। श्रीकृष्ण इनके बीच बांसुरी बजाते रहते थे। उनकी बांसुरी की आवाज सुरीली और मधुर होती थी कि जो भी सुनता था, वह मुग्ध हो जाता था। श्रीकृष्ण के युवावस्था क पहुंचते-पहुंचते बांसुरी की आवाज जादू का काम करने लगी थी। जो भी आवाज सुनता था, वह बांसुरी की ओर इस तरह खिंचता चला आता था जैसे कोई वस्तु चुंबक की ओर खिंची चली आती है।

Na Rahega Bans Na Bajegi Bansuri Story In Hindi

ग्वालों की तरह ग्यातिनें भी बांसुरी सुनने के लिए श्रीकृष्ण के पास पहुंचती थीं। शुरू-शुरू में याति घंटे-दो घंटे बांसुरी सुनकर पी जाती थीं। धीरे-धीरे ग्वालिने बांसुरी सुनने में अधिक-से-अधिक समय बिताने लगीं और घर के काम काज के लिए समय कम रहने लगा।

कुछ ग्वालिनें ऐसी भी होती थीं, जो पर के अपने छोटे बच्चों को छोड़कर बांसुरी सुनने श्रीकृष्ण के पास चली जाती थीं। श्रीकृष्ण पागल की तरह अपनी बांसुरी बजाने में डूबे रहते। तमाम लड़कियां और ग्वालिने उनसे प्रेम करने लगी थीं, लेकिन श्रीकृष्ण थे कि अपनी बांसुरी बजाने में इये रहते।

लोग उन्हें पागल भी कहने लगे थे। कभी-कभी बांसुरी की आवाज रात के सन्नाटे को चीरती हुई दूर-दूर गांवों तक जा पहुंचती थी। ग्वालों और ग्वालिनों पर बांसुरी का एक जादू-सा प्रभाव होता और वे बांसुरी सुनने के लिए अपने-अपने पर से निकल पड़ते थे।

गांवों में बड़ी अव्यवस्था फैल गई जब घर का काम-काज छोड़कर ग्वालिने श्रीकृष्ण के पास चली जातीं, तो घर का बचा हुआ काम घर के वृद्ध लोगों को करना पड़ता। उनके छोटे-छोटे शिशुओं की भी देखभाल करनी पड़ती। फिर लोक-लाज का सवाल भी उठ खड़ा हुआ था।

गांवों की युवा लड़कियां और बहुएं लोक-लाज त्यागकर श्रीकृष्ण की बांसुरी सुनने पहुंच जाती थीं। जब श्रीकृष्ण से कहा गया, तो उन्होंने कहा, “मैं तो अपनी बांसुरी बजाने में डूबा रहता हूं। मैं किसी को बुलाने तो जाता नहीं। आप अपने अपने परिवार वालों को समझाइए कि वे मेरे घर न आएं।

बहू-बेटियां न तो घर वालों की बात मानती थीं और न किसी बाहर वालों का उन्हें डर था। अब तो एक ही रास्ता रह गया था कि श्रीकृष्ण बांसुरी बजाना बंद करें। गांवों के मुखिया, जमींदार आदि सभी परेशान थे। उन्होंने नंदबाबा को समझाया, इसके बाद भी कोई हल नहीं निकला।

गांवों के खास-खास लोग उस क्षेत्र के राजा के पास गए और उनके सामने यह समस्या रखी। सबकी बातें सुनकर राजा ने अपने कारिंदों को आज्ञा दी कि मेरे राज्य में जितने भी बांस के पेड़ हैं, झुरमुट हैं, उनको काट दिया जाए और उनमें आग लगा दी जाए। दूसरे दिन सब बांसों के झुरमुट काटकर उनमें आग लगा दी गई। उसी दिन रात के समय श्रीकृष्ण की बांसुरी उठवाकर नष्ट कर दी गई। तब लोगों ने कहा “न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।”

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जब रखोगे, तभी तो उठाओगे | Jab Rakhoge, Tabhi To Uthaoge Story In Hindi

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Jab Rakhoge, Tabhi To Uthaoge Story In Hindi

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Jab Rakhoge, Tabhi To Uthaoge Story In Hindi- धनीराम नाम का एक व्यक्ति था। वह मेहनत करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। व धीरे-धीरे कामचोर बनता गया और एक दिन नाकारा हो गया। बैठे-ठाले ठगी का काम शुरू कर दिया। उसने पहले जान-पहचान वालों से उधार लेना शुरू कर दिया। जब लोग पैसे वापस मांगते, तो तरह-तरह के बहाने बना देता।

Jab Rakhoge, Tabhi To Uthaoge Story In Hindi

जैसे-जैसे उसके जान-पहचान के लोग आपस में मिलते गए, उसकी पोल-पट्टी खुलती गई। सब यही बात करते कि जबसे उसने पैसे लिए हैं, तब से मिलना ही बंद कर दिया। जब जान-पहचान के लोगों ने पैसे देने बंद कर दिए, तो वह अपने रिश्तेदारों से उधार के नाम पर पैसे ऐंठने लगा। पहले सगे रिश्तेदारों से पैसे लेने शुरू किए। इसके बाद दूर के रिश्तेदारों से पैसे मांगना शुरू कर दिया।

एक दिन वह एक साधु प्रवृत्ति के व्यक्ति के पास गया। उसने बैठाकर पानी पिलाया। फिर उससे पूछा, “तुम धनीराम ही हो न?” उसने हां में सिर हिलाया। फिर पूछा, “कहो, कैसे आना हुआ इतने वर्षों बाद। सब ठीक-ठाक तो है।” धनीराम ने उत्तर देते हुए कहा, “सब ठीक तो है, लेकिन, 1 काम नहीं मिल पा रहा है।

घर में तंगी आ गई है। यदि कुछ रुपए उधार दे दें, तो हालत संभल जाएगी।” वह व्यक्ति बात करते हुए उठा और सामने आले में पचास रुपए रख आया जब धनीराम चलने के लिए खड़ा हुआ, तो उस व्यक्ति ने आले की ओर इशारा करते हुए कहा, “सामने आले में पचास रुपए रखे हुए हैं, ले जाओ। जब हो जाएं, इसी में रख जाना।” उसने आले में से रुपए उठाए और चला गया।

इसी प्रकार ठगी से वह अपनी नेया खेता रहा। किसी ने दोबारा दे दिए, किसी ने नहीं दिए। अब वह बैठा-बैठा गणित लगाता रहता कि कोई छूट तो नहीं गया, जिससे पैसे मांगे जा सकते हैं या किस-किस के पास जाएं। कितना-कितना समय बीत गया जिनके पास दोबारा जाया जा सके। ऐसे लोगों की उसने सूची बनाई, जिनसे पैसे लिए हुए तीन साल हो गए थे।

इस सूची के लोगों के पास जाना शुरू कर दिया, लेकिन बहुत कम लोगों ने पैसे दिए। अचानक उसे साधु प्रवृत्ति वाले व्यक्ति की याद आई। सोचा, अब तो वह भूल गया होगा। उसी के पास चलते हैं। जब धनीराम वहां पहुंचा तो उसे बैठाया। पानी पिलाया और नाश्ता कराया।

उस व्यक्ति ने पूछा, “सब ठीक-ठाक तो है।” धनीराम ने उत्तर देते हुए कहा, “सब ठीक तो है, लेकिन…. ।” उसने फिर पूछा, “लेकिन क्या ? (Valium) ” धनीराम बोला, “बच्चे भूखे हैं। काम भी नहीं मिल रहा है। कुछ पैसे उधार दे देते, तो काम चल जाता।” “ले जाओ उसमें से।” आले की ओर इशारा करते हुए उस व्यक्ति ने कहा वह खुश होता हुआ उठा कि यह वास्तव में पिछले पैसे भूल गया है। इसने न पिछले पैसों की चर्चा की और न मांगे ही सोचते-सोचते यह आने तक आ गया। उसने आले में हाथ डाला तो कुछ नहीं मिला।

धनीराम ने उस व्यक्ति की ओर देखते हुए कहा, “इसमें तो कुछ नहीं है? “इतना सुनकर वह बोला, “जो तुम पहले पैसे ले गए थे, क्या रखकर नहीं गए थे?” उसके मुंह से कोई उत्तर नहीं निकला। उसने न में सिर हिलाते हुए उत्तर दिया। उस साधु प्रवृत्ति वाले व्यक्ति ने सहज रूप से कहा, तब फिर कहां से मिलेंगे? ‘जब रखोगे, तभी तो उठाओगे’। वह चुपचाप बाहर आया और अपना सा मुँह लिए चला गया।

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